2016 के लिए वाम दलों का एजेंडा क्या हो?

सीपीएम झंडा

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    • Author, अजित पिल्लई
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए

नए साल के संकल्प राजनीतिक दलों के लिए नहीं होते. कम से कम उन दलों के लिए तो नहीं जो मिलकर वाममोर्चा बनाते हैं और ख़ुद को इतना गंभीर मानते हैं कि इस तरह के फ़ालतू काम में पड़ ही नहीं सकते.

हालांकि कॉमरेडों को बॉलीवुड स्टार्स और पेज-3 की सेलिब्रिटी की तरह हर साल किए जाने वाले और न करने वाले कामों की सूची बनाने पर विचार करना चाहिए.

फिर भी, वह मानेंगे कि 2016 भारत के कैलेंडर का बहुत महत्वपूर्ण साल है. इस साल पश्चिम बंगाल, केरल, असम और तमिलनाडु में विधानसभा चुनाव हैं. इनमें से पहले दो राज्यों में वाममोर्चे का काफ़ी कुछ दांव पर है और वह चाहेगा कि अगले दो राज्यों में भी वह उल्लेखनीय उपस्थिति दर्ज करवाए.

फिर अक्तूबर-नवंबर में वाम मोर्चे में बड़े भाई की भूमिका निभाने वाली मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम) 52 साल की हो जाएगी. तब एक बार फिर ये सवाल पूछे जाएंगे कि क्या यह अब भी जवान हो रही है या ख़ुद को फिर गढ़कर तेज़ी से बदलती दुनिया में सार्थक होने की कोशिश कर रही है?

2016 के क्रिसमस में कम्यूनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया (सीपीआई), जो 1964 में टूट गई थी, 91 साल की हो जाएगी. तब उसे भी इसी तरह के सवालों का सामना करना पड़ेगा.

वाम मोर्चा समर्थक

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अब यहां से वाम मोर्चा किस दिशा में बढ़ेगा? साल 2016 में इसकी रणनीति क्या होनी चाहिए और क्या नहीं?

यह सही है कि ऐसे में विभिन्न राजनीतिक दल क्या क़दम उठा सकते हैं या उठाने चाहिए, यह कहना थोड़ी धृष्टता हो सकती है. फिर भी वाम मोर्चे के समर्थकों के उठाए कुछ बिंदु एक बार विचार करने योग्य तो हैं ही.

पुराने को बाहर करो: 90 साल से भी पहले अंतरराष्ट्रीय कम्यूनिस्टों से विरासत में मिले सूत्रों और ढांचे को बाहर फेंक देना चाहिए. ये किसी और दौर के हैं.

पुराने सोवियत और चीनी मॉडल्स को मृत घोषित कर अगले साल विधानसभा चुनावों से पहले नए आदर्शों को प्राथमिकता देने का ऐलान कर देना चाहिए. ऐसा कर पाने में नाकामी से वाम मोर्चा गतिहीन हो जाएगा, और भी गहरे गर्त में गिर जाएगा.

वाम को व्यवसाय के प्रतिकूल और मध्यवर्ग-विरोधी दिखाना बंद करें: आर्थिक उदारीकरण के समय में प्रबल व्यवसाय-विरोधी दिखना मूर्खता ही है.

इसके बजाय वामदलों को ऐसे सही व्यापारिक संगठनों के समर्थक के रूप में देखा जाना चाहिए जो और प्रगतिशील हों और आम लोगों की भलाई, पर्यावरण संरक्षण के प्रति समर्पित हों और सिर्फ़ लाभ से संचालित न होते हों.

वाम मोर्चा समर्थक

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निजी क्षेत्र के पूरी तरह ख़िलाफ़ होने की छवि को रोज़गार और लोगों के विरोधी के रूप में दर्शाया जा सकता है.

कॉमरेडों को व्यावहारिक सामूहिक व्यवसायिक ढांचे के प्रस्तावों, जैसे को-ऑपरेटिव्ज़ के साथ आगे आना चाहिए जिनमें सरकार और निजी क्षेत्र दोनों की भागीदारी हो. लोगों की अच्छी नौकरी और ऊंचे जीवनस्तर की इच्छा का सम्मान किया जाना चाहिए.

पश्चिम बंगाल और केरल तात्कालिक प्राथमिकताएं: पश्चिम बंगाल में इज़्ज़त बचाना और 2011 के विधानसभा चुनावों के समय खोई ज़मीन हासिल करने पर ध्यान देना चाहिए.

इसके साथ ही पार्टी में बड़े पैमाने पर मौजूद सड़ांध को दूर करना दीर्घकालिक लक्ष्य होना चाहिए.

केरल में स्थिति तुलनात्मक रूप से काफ़ी बेहतर है लेकिन वहां वाम को मात्र कांग्रेस के विकल्प से कुछ ज़्यादा होना चाहिए. इसे दोनों राज्यों में भाजपा के उभार का मुक़ाबला करना होगा.

भगवा ब्रिगेड को हल्के में न लें: दक्षिणपंथी ताक़तों ने लोगों के ख़ासे तबक़े का ध्यान अपनी ओर खींचा है, जिसमें सिविल सोसायटी का एक धड़ा भी शामिल है. वे भाजपा को भविष्य की पार्टी के रूप में देखते हैं.

मोदी समर्थक

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वाममोर्चा अभी तक भाजपा की चुनौती का सामना करने में नाकाम रहा है. भाजपा ने ख़ुद को अपने मूल आधार आरएसएस और उसके सहयोगी संगठनों के कार्यकर्ताओं की ताक़त के बल पर मज़बूत किया है.

भाजपा का मुक़ाबला धर्मनिरपेक्षता पर औपचारिक बयान जारी करके नहीं किया जा सकता बल्कि ज़मीन पर सक्रिय होकर ही किया जा सकता है.

ज़मीनी स्तर पर पुनर्जीवित होना ही असली ज़रूरत: वामदलों के कार्यकर्ता इस समय भ्रमित अवस्था में हैं. संगठन को बढ़ाने के लिए उनमें आशावादिता का संचार करना महत्वपूर्ण है जो अंततः चुनावी फ़ायदों में बदलेगी.

ज़मीनी स्तर पर कॉमरेडों का हौसला बढ़ाने के लिए वामदलों को अपने काम करने के तरीक़े को लोकतांत्रिक करना होगा. एक सलाह तो यह है कि बड़े पैमाने पर भागीदारी के लिए सांगठनिक स्तर पर आरक्षण शुरू करें.

शुरुआत में महिलाओं, दलितों और आदिवासियों को निर्णय प्रक्रिया के हर स्तर पर शामिल किया जाना चाहिए. बहुतों को लगता है कि इससे वामदलों को फिर स्थापित होने में मदद मिलेगी और वो ज़्यादा लोगों को आकर्षित कर सकेंगे.

वाम समर्थक

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युवाओं को प्रोत्साहित करें: सकारात्मक प्रोत्साहनों के ज़रिए युवा शक्ति को आकर्षित किया जाना चाहिए.

लेकिन इसका अर्थ यह हुआ कि पुराने स्टालिनवादी समूह को बाहर का रास्ता दिखाना होगा और नए विचारों के लिए राह बनानी होगी.

वाम को ऐसी राजनीतिक योजना खड़ी करनी होगी, जो जाति-लिंग-आदिवासी-जातीय पहचानों जैसे विशिष्ट भारतीय संदर्भों के अनुरूप हों. इसे एक उदारवादी अर्थव्यवस्था में नए शासक वर्ग और भारतीय पूंजीवाद की हक़ीक़तों के प्रति बेहतर ढंग से प्रतिक्रिया करने का तरीक़ा विकसित करना होगा.

जनांदोलनों में भागीदारी करेः कम्यूनिस्टों को लोकप्रिय और सकारात्मक आंदोलनों पर हावी होने की कोशिश किए बिना उन्हें स्वेच्छा से समर्थन देना चाहिए.

यह कहकर कि 'यह हमारे आंदोलन नहीं हैं' पहले बहुत से संघर्षों से अलग रहे हैं. अगर वाम को आगे बढ़ना है तो इस नज़रिये को छोड़ना होगा.

सीपीआई-सीपीएम के विलय की कोशिश करें: 20 साल पहले जब यह विचार पहली बार रखा गया था अगर तभी समान विचारधारा वाली दोनों पार्टियां साथ आ गई होतीं, तो उसका बहुत प्रभाव होता. लेकिन अब भी बहुत देर नहीं हुई है और 2016 में दोनों शक्तियों को मिलाया जा सकता है.

वाम मोर्चा रैली

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उत्तर-दक्षिण के अंतर को पाटो: केरल और पश्चिम बंगाल के सीपीआई और सीपीएम कॉमरेडों को शांति से रहना चाहिए और एक-दूसरे पर हावी होने की आदत से बचना चाहिए.

राज्य इकाइयों के लिए फ़ैसलों को समझना चाहिए और आमने-सामने के राजनीतिक दलों के साथ विकसित समझ का आदर और समायोजित करना चाहिए. राजनीति को पश्चिम बंगाल बनाम केरल के बीच फ़ुटबॉल मैच नहीं बनने देना चाहिए.

केरल और बंगाल से बाहर देखें: वामदलों को अपना आधार महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, उड़ीसा और तमिलनाडु जैसे राज्यों में बनाना चाहिए, जहां ये पहले एक जानी-मानी ताक़त थे और आज हाशिए पर हैं. इन राज्यों में पार्टी को पुनर्जीवित करने से इसका दायरा बढ़ेगा और यह तरक़्क़ी करेगी.

बदलाव के प्रस्तावों को सार्वजनिक करें: 2016 के शुरुआती महीनों में वामदलों के लिए एक साझा घोषणापत्र का ऐलान और उस पर काम किया जाना चाहिए. अगर यह विचार औपचारिक रूप से शुरू हो जाता है तो यह वाममोर्चे में रुचि जगाएगा और युवा शक्ति को आकर्षित करेगा.

सीपीआई रैली

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दूसरी ओर अगर यथास्थिति क़ायम रखी जाती है तो 2016 भी किसी दूसरे साल की तरह निकल जाएगा.

उम्मीद की जा सकती है कि पश्चिम बंगाल में वाममोर्चा तृणमूल कांग्रेस के बाद दूसरे स्थान पर रहेगा और केरल में जीत जाएगा, लेकिन भारत दो राज्यों के बाहर बहुत कुछ है.

आगे बढ़ने के लिए जो बचा है, उसे संजोए रखने से बहुत अधिक की ज़रूरत पड़ेगी.

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