नरेंद्र मोदी के लिए कैसा रहा 2015

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    • Author, नितिन श्रीवास्तव
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

साल 2015 में नरेन्द्र मोदी एक के बाद एक विदेश यात्राओं पर रहे. विदेशी धरती पर 'मोदी.. मोदी..' के नारे तो ख़ूब लगे लेकिन इसका भारत को कितना फ़ायदा मिला?

भारत में दिल्ली और फिर बिहार में उन्हें चुनावी हार का सामना करना पड़ा.

वहीं असहिष्णुता का मुद्दा भी ख़ूब चर्चा में रहा. नरेन्द्र मोदी के लिए कैसा रहा साल 2015, यह जानने के लिए हमने भारत के कुछ वरिष्ठ पत्रकारों से बात की.

फ़र्स्ट पोस्ट के संपादक अजय सिंह ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि दूसरे देशों के नेताओं के साथ नरेन्द्र मोदी की मुलाक़ात एक अच्छी बात है.

उनका कहना है कि प्रधानमंत्री को देश में रहना चाहिए, ऐसा मैं नहीं मानता, लेकिन इन विदेश दौरों का कितना लाभ मिला है फ़िलहाल इस पर कुछ कहना थोड़ी जल्दबाज़ी होगी.

दिल्ली और बिहार के विधानसभा चुनावों में बीजेपी की हार पर अजय सिंह कहते हैं कि विपक्षी दलों की स्थिति नरेन्द्र मोदी को एक उम्मीद दे रही थी.

लेकिन पिछले डेढ़ साल में लोगों के मन में एक शक पैदा हुआ है कि जो उम्मीदें उन्होंने नरेन्द्र मोदी से की थीं वो ठीक नहीं थी. इसलिए नरेन्द्र मोदी की जो छवि लोगों के बीच बनी थी वह धूमिल होती दिख रही है.

अजय सिंह मानते हैं कि डेढ़ साल में ज़मीनी हक़ीकत में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया है जिससे लोगों को लगे कि पिछली सरकार के बाद बीजेपी की सरकार में उनके जीवन में कोई बड़ा बदलाव आया हो.

बीजेपी की सरकार के दौरान जो विवाद चल रहे हैं अजय सिंह उसमें बीजेपी की चूक कम और प्रचार ज़्यादा देखते हैं.

उनके मुताबिक़ नेशनल हेराल्ड केस में संपत्ति का अधिग्रहण करने का जो तरीका अपनाया गया वह सवालों के घेरे में है, लेकिन उसे बीजेपी पर लाद दिया गया. गोमांस खाने की बात करें तो भारत में हिन्दीभाषी राज्यों में इस पर प्रतिबंध लगा हुआ है, लेकिन उससे जुड़ा एक मामला हुआ तो उसे असहिष्णुता से जोड़ दिया गया.

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अजय सिंह का कहना है कि मोदी की जगह कोई और भी होता तो इस तरह के मुद्दे पर बहस होती, लेकिन मोदी की हिन्दूवादी छवि के कारण यह बहस ज़्यादा हुई.

अजय सिंह का मानना है कि मोदी को समय पर सामने आकर कहना था कि 'आप जिस मुद्दे से हमें जोड़ रहे हैं उससे हमारा कोई लेना-देना नहीं है'.

हालांकि वो मानते हैं कि इस दौरान कुछ अच्छे काम भी हुए हैं जो लंबे समय से अटके हुए थे. जैसे बैंक खाता खोलना, यूआईडी से लिंक करना और बीमा योजना.

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दैनिक जागरण के संपादक प्रशांत मिश्रा ने बीबीसी से बातचीत में बताया कि भारत को आर्थिक, राजनयिक और कूटनीतिक स्तर पर जो स्थान मिल रहा है वह पहले नहीं मिलता था.

प्रशांत मिश्रा मानते हैं कि इस संबंध में भारत की स्थिति मज़बूत हुई है और अंतरराष्ट्रीय शक्तियां अब भारत को ज़्यादा महत्व दे रही हैं. उनके मुताबिक़ भारत को सामरिक क्षेत्र में भी अच्छी सफलता मिली है.

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नरेन्द्र मोदी की विदेश नीति पर वरिष्ठ पत्रकार भारत भूषण ने बीबीसी को बताया कि भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण देश मॉरिशस है जहां से प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के रूप में भारत में काला धन आता है, लेकिन नरेन्द्र मोदी इसे रोकने के लिए मॉरिशस से कोई समझौता नहीं कर पाए.

वहीं भारत भूषण मानते हैं कि नेपाल का मसला भारत की विदेश नीति की सबसे बड़ी त्रासदी बन गई. नरेन्द्र मोदी ने दो बार वहां का दौरा किया. पशुपतिनाथ मंदिर में पूजा की, 400 किलो देशी घी दिया, 40 टन चंदन की लकड़ी दान की. लेकिन उसी नेपाल में भारतीय प्रधानमंत्री का पुतला जलाया गया.

भारत भूषण मानते हैं कि नरेन्द्र मोदी चीन से भी अच्छे रिश्ते बनाकर नहीं रख पा रहे हैं और पाकिस्तान के साथ संबंधों में भी खींचतान बरकरार है.

भारत भूषण के मुताबिक़ मोदी कभी कहते हैं कि रिश्ते सुधारेंगे, कभी कहते हैं कि बात नहीं करेंगे और फिर बातचीत शुरू कर देते हैं.

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भारत भूषण के मुताबिक़ कांग्रेस और बीजेपी एक तरह की पार्टी हो गई है जहां कोई नया नेता बड़ा नहीं बन सकता है.

"हमने पहले राजनाथ सिंह के बेटे पर लगे आरोप के बाद राजनाथ सिंह का क़द छोटा होते देखा. उसके बाद ललित मोदी के मुद्दे पर सुषमा स्वराज को कमज़ोर करने की कोशिश की गई और अब अरुण जेटली की बारी है."

भारत भूषण का कहना है कि जेटली इस सरकार में वित्त मंत्री के साथ-साथ नंबर दो की कुर्सी पर बैठे हैं, लेकिन उनका बचाव करने में नरेन्द्र मोदी ने बहुत वक़्त लगा दिया. इससे लगता है कि वो किसी को ऊपर नहीं उठने देना चाहते हैं.

भारत भूषण मानते हैं कि भारतीय समाज में असहिष्णुता बढ़ी है. लोग दूसरे के घर घुसकर फ़्रीज़ खोलकर देखते हैं कि वो क्या खा रहे हैं? अयोध्या में ईंटें पहुंच रही हैं और फिर कहा जाता है कि मंदिर नहीं बनेगा.

वो कहते हैं कि अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ बयान देने में बीजेपी के मंत्री ही एक-दूसरे से आगे निकलने की कोशिश में हैं. उदार लोगों से कहा जाता है कि वो पाकिस्तान चले जाएं, तो कभी शाहरुख़ खान की फ़िल्में न देखने को कहा जाता है.

भारत भूषण के मुताबिक़, "नरेन्द्र मोदी भारतीय समाज में कितना समन्वय बना पाएंगे यह देखना होगा".

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वहीं कई साल से बीजेपी को कवर कर रही वरिष्ठ पत्रकार सबा नक़वी मानती हैं कि नरेन्द्र मोदी ख़ुद अपनी प्रदर्शनी के लिए विदेश दौरे पर जाते हैं.

वो कहती हैं, "मोदी 'मन की बात' करते हैं, जिससे लोग अब ऊब चुके हैं. वो तरह-तरह के कपड़े पहनते हैं और बहुत कुछ ऐसा करते हैं जो अटपटा होता है लेकिन ये आडंबर उन्हें शुरू से ही बहुत पसंद है."

सबा नक़वी ने बीबीसी को बताया, "2012 के गुजरात विधानसभा चुनाव भी पूरी तरह से एक प्रदर्शनी थी. उस समय चुनाव प्रचार में सबसे पहले बहुत सारे मोटरसाइकिल आते थे जिन पर सवार व्यक्ति विवेकानंद की तरह कपड़े पहना होता था. स्टेज पर डांडिया नाच होता था जिस पर लड़के-लड़कियां जमकर नाचते रहते थे. उसके बाद अचानक ही ड्रम की ज़ोरदार आवाज़ आती थी और फिर मोदी जी आते थे. वहां बैठे लोग भी मोदी मास्क पहनकर बैठते थे. मोदी ने अपनी जो छवि बनाई है वो सालों से गुजरात से ही चली आ रही है."

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सबा नक़वी मानती हैं कि बीजेपी में भी कई लोग हैं जो सामान्य तरीक़े से सरकार चलाना चाहते हैं.

आरक्षण के मुद्दे पर मोहन भागवत के बयान पर सबा नक़वी ने बताया, "उस बयान के बाद में लालू यादव से मिली तो लालू यादव ने बताया कि जैसे ही उन्हें इसकी जानकारी मिली वो उछल पड़े और कूदने लगे, लालू ने गोलवरकर की किताब 'बंच ऑफ़ थॉट्स' निकलवाकर हर जगह उसका प्रचार किया."

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सबा नक़वी की राय है कि नरेन्द्र मोदी की सरकार के मुक़ाबले अटल बिहारी वाजपयी की सरकार ज़्यादा क़ाबिल थी. उस गठबंधन में नीतीश कुमार और ममता बनर्जी जैसे नेता थे.

सबा नक़वी के मुताबिक़ अटल की सरकार आम सहमति के आधार पर चलती थी जबकि उन्हें नरेन्द्र मोदी की सरकार लकवाग्रस्त सरकार दिखती है.

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