बीजेपी के चहेते स्वामी वाजपेयी को पसंद नहीं थे

सुब्रमण्यम स्वामी

इमेज स्रोत, PTI

    • Author, राधिका रामाशेषन
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार

आज की नरेंद्र मोदी सरकार डॉक्टर सुब्रमण्यम स्वामी के निर्णायक क़दमों को ही आगे बढ़ाते हुए लुटियंस दिल्ली की सत्ता का हिस्सा बनी है.

बंद हो चुके अख़बार 'नेशनल हेरल्ड' में धोखाधड़ी के मामले में सोनिया गांधी और राहुल गांधी के निचली अदालत में पेश होने के घंटों पहले ही इस मामले के मुख्य शिकायकर्ता और गांधी परिवार की ताज़ा मुश्किलें बढ़ाने वाले सुब्रमण्यम स्वामी को राष्ट्रीय राजधानी के सबसे बेशक़ीमती इलाक़े लुटियंस ज़ोन में बंगला अलॉट किया गया है.

सरकारी सूत्रों ने गृह मंत्रालय के ताज़ा आकलन के हवाले से बताया है कि सुब्रमण्यम स्वामी पर बढ़ते ख़तरे को देखते हुए उन्हें ये बंगला दिया गया है. स्वामी अब तक एक निजी घर में रहते थे जिसमें ज़ेड श्रेणी की सुरक्षा वाले राजनेता की सुरक्षा में तैनात पुलिसकर्मियों के ठहरने लायक जगह नहीं थी.

राहुल और सोनिया

इमेज स्रोत, Reuters

इमेज कैप्शन, नेशनल हेरल्ड में सोनिया और राहुल गांधी के फंसने पर कांग्रेस हंगामा कर रही है.

लेकिन स्वामी ख़ुद को सिर्फ़ एक राजनेता नहीं मानते हैं. वो ख़ुद को वंशवादी राजनीति (यहां नेहरू गांधी परिवार पढ़ा जाए) को ख़त्म करने और प्रणालीगत सत्यनिष्ठा और न्याय के लिए लड़ने वाला योद्धा कहलाना ज़्यादा पसंद करेंगे. सवाल ये है कि स्वामी भारतीय जनता पार्टी की राजनीति में कहां फ़िट बैठते हैं?

स्वामी का भारतीय जनता पार्टी के साथ रिश्ता उतार-चढ़ाव वाला रहा है. पार्टी के पहले प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने स्वामी के प्रति अपनी नापसंदी को कभी नहीं छुपाया.

स्वामी ने 1998 में जयललिता की एआईडीएमके के सहयोग वाले एनडीए गठबंधन की सरकार को ख़तरे में ही डाल दिया था. जयललिता इस गठबंधन की बेहद अहम सहयोगी थीं और वो सुब्रमण्यम स्वामी को वित्त मंत्री बनाने पर अड़ गईं थीं. यहां तक की गठबंधन छोड़ने की धमकी तक दे डाली थी. वाजपेयी समीकरणों की मुश्किलें भांप गए थे.

सुब्रमण्यम स्वामी

इमेज स्रोत, BBC World Service

हालांकि स्वामी हार्वर्ड विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्री हैं, लेकिन वाजपेयी राजनीतिक परिणामों की चिंता किए बिना नए ढांचागत सुधार लागू करने के अपने एजेंडे में उनके फ़िट होने को लेकर संशय में थे.

स्वामी के अर्थशास्त्र पर उनकी अपनी सामाजिक भलमनसाहत का रंग चढ़ा था. वे विदेशी बैंकों में रखे गए काले धन को वापस लाने के अपने विचार में भी फंसे भी थे. उनकी सुधारों की संकल्पना का आधार 'स्वदेशी' था जो वाजपेयी और उनके आर्थिक सलाहकारों के लिए अभिशाप जैसी स्थिति थी. इसलिए स्वामी वित्त मंत्री का पद हासिल नहीं कर पाए.

लेकिन उन्होंने वाजपेयी के लिए मुश्किले खड़ी कर दीं. जयललिता और उस वक़्त राजनीतिक शुरुआत करने वाली सोनिया गांधी में उन्हें ऐसे दो भरोसेमंद सहयोगी दिखे जो वाजपेयी की सरकार गिराने की उनकी योजना को आगे बढ़ाने और लागू करने में अहम भूमिका निभा सकते थे.

अटल बिहारी वाजपेयी

इमेज स्रोत, AP

इमेज कैप्शन, जब तक भाजपा पर अटल की पकड़ मज़बूत रही स्वामी के लिए रास्ते बंद रहे.

जयललिता तब तक सोनिया के क़रीब नहीं थीं. मार्च 1999 में स्वामी ने अपनी चर्चित चाय-पार्टी आयोजित की जिसमें उन्होंने सोनिया और जयललिता को आमने-सामने बिठा दिया और दोनों नेता क़रीब आ गईं.

स्वामी मुलायम सिंह यादव जैसे समाजवादी नेता को सोनिया गांधी की मदद से अगली सरकार का मुखिया बनाना चाहते थे. निश्चित रूप से सोनिया प्रधानमंत्री पद के लिए उनकी पसंद नहीं थीं.

लेकिन स्वामी ने जितना सोचा था सोनिया उससे कहीं ज़्यादा समझदार निकली और ख़ुद को कांग्रेस के नेतृत्व वाले संभावित गठबंधन के नेता के रूप में पेश कर दिया. चंद्रशेखर और जॉर्ज फ़र्नांडीस के समर्थन से स्वामी जल्द ही सोनिया के मंसूबों को नाकाम करने के लिए मुलायम को आगे ले आए. मुलायम के हाथ खींचने से सोनिया का 272 सांसदों की बहुमत संख्या हासिल करने का मंसूबा धरा रह गया.

सुब्रमण्यम स्वामी

इमेज स्रोत, PTI

जब तक भाजपा पर अटल बिहारी बाजपेयी की पकड़ रही स्वामी पार्टी में अपने पैर नहीं जमा पाए. लेकिन आरएसएस और विश्व हिंदू परिषद में ऐसे कुछ लोग थे जो इस पूर्व अर्थशास्त्री के लिए जगह रखते थे. वे स्वामी में सहज बुद्धि, पांडित्य, छल का आदर्श मिश्रण देखते थे.

लाल कृष्ण आडवाणी हमेशा से स्वामी को पार्टी में वापस चाहते थे. चेन्नई के चार्टर्ड अकाउंटेंट एस गुरुमूर्ती और संघ के विचारक और पूर्व राज्यसभा सांसद बलबीर पुंज भी इनके समर्थन में थे.

वाजपेयी और आडवाणी के बाद के युग के नेताओं में कुछ ही स्वामी को पसंद करते थे और उन्हें विद्रोही स्वभाव का समझते थे. लेकिन मोदी इसके अपवाद थे. कांग्रेस और गांधी परिवार को कमज़ोर करने का उत्साह जो 'कांग्रेस मुक्त' नारे में बदल गया से लबरेज मोदी को स्वामी में अपने एजेंडा आगे बढ़ाने वाला सहयोगी दिखा.

2014 के चुनावों से ठीक पहले मोदी स्वामी को वापस पार्टी में ले आए.

नरेंद्र मोदी

स्वामी पहले भी सोनिया गांधी पर पुरातत्व की चीज़ों की तस्करी का मामला दर्ज करा चुके हैं. वे उनकी शैक्षणिक योग्यता को भी चुनौती दे चुके हैं. अब स्वामी फिर से काम पर लग चुके थे और उन्हें हरी झंडी भी मिल चुकी थी.

ऐसे में संसद के मौजूदा शीत सत्र से पहले स्वामी ने बीजेपी के संसदीय रणनीतिकारों के विधायी कार्य को आगे बढ़ाने के लिए कांग्रेस का सहयोग हासिल करने की योजना में पलीता लगा दिया. वे अदालत गए और राहुल की कथित दोहरी नागरिकता के मामले में सुनवाई की मांग की. ये मंसूबा नाकाम हो गया लेकिन कांग्रेस को भाजपा के सामान्य रिश्ते रखने के इरादों पर संदेह हो गया.

'नेशनल हेरल्ड' मामला सरकार की ताबूत में आख़िरी कील साबित हुआ. स्वामी ने गांधी परिवार के ख़िलाफ़ अपनी शिकायत को आगे बढ़ाया और सरकार का जीएसटी और अन्य विधेयक पास करने की कोशिशें हवा हो गईं.

हालांकि मज़े की बात ये है कि मोदी ने स्वामी के इरादों का समर्थन किया है. हेरल्ड मामले को प्रतीक बनाकर अपने 'भ्रष्टाचार मुक्त भारत' के एजेंडे में फिर से जान फूंकने के लिए समूची भारतीय जनता पार्टी कांग्रेस पर आक्रामक हो गई. भाजपा ने इसे हाल के दिनों का बोफ़ोर्स जैसा मामला बना लिया है.

सुब्रमण्यम स्वामी

इमेज स्रोत, Other

इमेज कैप्शन, सुब्रमण्यम स्वामी को जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्याल का कुलपति बनाए जाने के कयास भी लगाए गए थे.

दरअसल, स्वामी एक अप्रत्याशित शख़्स हैं. भाजपा सांसद कीर्ति आजाद के वित्त मंत्री अरुण जेटली पर दिल्ली और डिस्ट्रिक्ट क्रिकेट एसोसिएशन (डीडीसीए) का 2013 तक अध्यक्ष रहते कथित भ्रष्टाचार के आरोपों से तिलमिलाई भाजपा ने स्वामी की प्रतिक्रिया का इंतज़ार किया.

भाजपा को राहत देते हुए स्वामी ने कहा कि कीर्ति आज़ाद के आरोपों से जेटली के भाजपा का वरिष्ठ नेता और मंत्री होने से कोई संबंध नहीं है क्योंकि ये एक ऐसे पद से जुड़े हैं जिस पर वो अपनी निजी हैसियत से थे.

स्वामी ने एक बार 'सही तरीक़े' से काला धन वापस न लाने के मुद्दे पर अरुण जेटली की आलोचना की थी. लगता है अब स्वामी मन और विचार से बदल गए हैं.

(बीबीसी संवाददाता अविनाश दत्त गर्ग के साथ बातचीत पर आधारित)

<bold>(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए <link type="page"><caption> यहां क्लिक करें</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/multimedia/2013/03/130311_bbc_hindi_android_app_pn.shtml" platform="highweb"/></link>. आप हमें <link type="page"><caption> फ़ेसबुक </caption><url href="https://www.facebook.com/bbchindi" platform="highweb"/></link>और <link type="page"><caption> ट्विटर</caption><url href="https://twitter.com/BBCHindi" platform="highweb"/></link> पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)</bold>