साबरमती से शुरू हुई उम्मीद दे गई दिल्ली

- Author, इंदु पांडेय
- पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
साहित्य ,कला, संगीत प्रस्तुति, बातचीत, व्यंजन, वर्कशॉप ये सब एक साथ मिले दिल्ली के हैबिटैट सेंटर में जहाँ गेट नंबर दो के पास गांधी की ये तस्वीर सबके सामने एक सवाल बन कर खड़ी थी.

पांचवें भारतीय भाषा महोत्सव ‘समन्वय 2015’ में पांच भाषाओं मिज़ो, तमिल, बांग्ला, मराठी और डोगरी पर विस्तृत चर्चा हुई, इसका उद्देश्य लेखक के रचना संसार और भाषाई साहित्यिक परंपराओं का पता लगाना है.

रविवार को संपन्न हुए इस महोत्सव में लेखिका अनु सिंह चौधरी ने कहा, "हर लिखने वाले, बोलने वाले की इच्छा होती है कि उसकी बात कोई सुने. आज के दौर में सोशल मीडिया बहुत आसानी से इन चाहतों को पूरा करता हुआ नजर आ रहा है."

महोत्सव के निदेशक राकेश कक्कड़ ने 'समन्वय’ के भारतीय भाषाओं-बोलियों को बढ़ावा देने वाले मंच के रूप में उभरने पर खुशी व्यक्त की.

इस मौके पर लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी जो ट्रांसजेंडर मामलों पर काम करती है अपनी आत्मकथा ‘मी हिजड़ा, मी लक्ष्मी’ पुस्तक का विमोचन इस मेले में किया. यहाँ उनकी बहन रुक्मणी मिश्रा भी मौजूद रही उनका कहना था "लक्ष्मी आज भी मेरे लिए मेरा भाई है."

सत्र की शुरुआत करते हुए ज्योति नरूला रंजन ने इंटरनेट पर चलने वाले अपने ऑडियो टॉक शो सिनटॉक की बात की.
उन्होंने कहा, "हम टेक्नोलॉजी से कुछ भी कर सकते हैं, लेकिन एक चीज़ जो टेक्नोलॉजी से भी नहीं मिलती वह है भविष्य नहीं बता सकती, भविष्य में क्या होगा कोई नहीं जानता."
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