मैंने मंडप में अपनी शादी क्यों तोड़ी?

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    • Author, वंदना
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

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बनारस की एक छोटी सी बस्ती में है धनलक्ष्मी का बसेरा. इस साल उनकी शादी सिंगापुर में काम कर रहे एक लड़के से तय हुई थी.

शादी की तैयारियाँ हो चुकी थीं. दुल्हन के लिबास में धनलक्ष्मी सज-संवरकर मंडप में आईं तो सही लेकिन भरे मंडप में शादी तोड़ दी.

हालांकि धनलक्ष्मी के लिए इस बारे में बात करना आसान नहीं था लेकिन वह बताती हैं, "मेरे पिता ने दहेज में पैसे दिए थे लेकिन शादी के दिन लड़के वालों ने और पैसे मांगे और तमाशा किया. मैने शादी से मना कर दिया."

अब धनलक्ष्मी जीवन में आगे बढ़ना चाहती हैं, नौकरी करना चाहती हैं पर शादी में अभी उन्हें दिक़्क़त आ रही है.

धनलक्ष्मी कहती हैं, "रिश्ते के लिए जो भी आता है यही सोचता है कि उनके साथ भी मैं यही करूँगी. पर मुझे अपने फ़ैसले पर अफ़सोस नहीं."

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इस तरह शादी तोड़ने वाली धनलक्ष्मी अकेली नहीं हैं. पिछले कुछ समय से बदलाव की एक धीमी बयार चल रही है, जहाँ कई महिलाओं ने सामाजिक ऊँच-नीच की परवाह किए बग़ैर शादी तोड़ने का फ़ैसला किया.

उत्तर प्रदेश में अमेठी के जगदीशपुर गाँव की रहने वाली रूपा आठवीं पास हैं.

किताबी पढ़ाई भले उन्होंने कम की हो पर जब ज़िंदगी की पाठशाला में सही-ग़लत का फ़ैसला करने की बारी आई तो रूपा ने इस कमी को आड़े नहीं आने दिया.

इस साल जून में रूपा की शादी पास के गाँव के लड़के से तय हुई. तैयारियाँ पूरी थीं पर ऐन मौक़े पर रूपा ने शादी से इनकार कर दिया.

रूपा बताती हैं, "शादी के दिन मैंने देखा कि वह बुरी तरह झूल रहा था, उसने शराब पी रखी थी. बारातियों ने भी शराब पी रखी थी."

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कुछ हिचकिचाहट लेकिन आत्मविश्वास भरे स्वर में रूपा बताती हैं, "मैने सोचा कि इस इंसान के साथ मैं ज़िंदगी कैसे बिता सकती हूँ. मेरे घर के लोगों ने मेरा साथ दिया. मैं चाहती हूँ मेरा जीवनसाथी ऐसा हो जो पढ़ा-लिखा हो, संस्कारी हो और समझदार हो."

शादी-ब्याह के मामले में आज भी भारतीय समाज काफ़ी हद तक परंपरावादी माना जाता है, जहाँ तय होने के बाद शादी तोड़ने का विकल्प औरतों के पास कम ही होता है.

चैताली की शर्त थी कि माँ-बाप शौचालय देंगे तभी करेंगी शादी

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अब धनलक्ष्मी और रूपा जैसी महिलाएँ अलग-अलग वजहों से आवाज़ बुलंद कर रही हैं.

महाराष्ट्र निवासी 25 साल की चैताली को शादी से पहले ही पता चल गया था कि ससुराल में शौचालय नहीं है.

बीबीसी को उन्होंने बताया, "मैं बहुत डर गई थी कि क्या मुझे खुले में शौच के लिए जाना होगा. मैने माँ-बाप से साफ़-साफ़ कह दिया कि शादी में गहने, फ्रिज, टीवी न दें, एक शौचालय गिफ़्ट कर दें वरना शादी नहीं करूँगी."

गर्व भरे अंदाज़ में चैताली में बताती हैं, "शादी के मंडप में प्रीफ़ैब्रिकेटिड टॉयलेट रखा गया था, जो हर किसी के लिए एक अनोखी चीज़ थी."

कुछ इसी तरह उत्तर प्रदेश के रामपुर की रहने वाली एक महिला ने इसलिए शादी तोड़ दी थी क्योंकि ठीक जयमाला के वक़्त दूल्हा मिर्गी का दौरा पड़ने पर बेहोश होकर गिर गया था.

दुल्हन का तर्क यही था कि उसे शादी से पहले बीमारी के बारे में क्यों नहीं बताया गया.

दिल्ली में रहने वाली श्रीमोई पियू कुंडु 'द सिताज़ कर्स' जैसी बेस्टसेलर किताब लिख चुकी हैं.

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श्रीमोई कहती हैं, "मैंने सगाई तोड़ने का फ़ैसला किया था. वह मुझे प्रताड़ित करता था. मुझे धीरे-धीरे अहसास हुआ कि उसे सिर्फ़ मेरे जिस्म से मतलब था. वह चाहता था कि मैं अपना करियर भी छोड़ दूँ."

वह मानती हैं कि बदलाव ज़रूर आया है लेकिन रास्ता अभी बहुत लंबा है.

वह कहती हैं, "मेरे लिए रिश्ता तोड़ना आसान नहीं था. पता नहीं क्यों औरतें प्रताड़ना को मौन होकर सह लेती हैं, जैसे यह कोई शर्म की बात हो. यह सच है कि महिलाएँ भावनात्मक तौर पर अपने प्रति पहले से ज़्यादा आश्वस्त हैं, आर्थिक रूप से आज़ाद होने लगी हैं लेकिन फिर भी मैं कहूँगी कि कितनी महिलाएँ शादी तोड़ने का फ़ैसला कर पा रही हैं. भारत में पुरुष और महिलाएँ कभी बराबरी पर नहीं तोले जाएँगे. हाँ, अपनी बात मनवानी है तो लड़ते रहना होगा."

समाजशास्त्री और महिला अधिकारों से जुड़े मसलों पर काम करने वाले इसे औरतों की नई उड़ान के रूप में देखते हैं.

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सामाजिक कार्यकर्ता जगमती सांगवान कहती हैं, "महिलाएँ अब अपनी इच्छाएँ और आकांक्षाएँ न सिर्फ़ जताने लगी हैं बल्कि मनवाने भी लगी हैं. एक इंसान को जो हक़ मिलने चाहिए उसकी आकांक्षा अब महिलाओं में जन्म ले चुकी है. वे एक सीमा से ज़्यादा बंदिशें स्वीकार नहीं करतीं. उन्हें समाज का पलटवार भी झेलना पड़ता है लेकिन समाज में एक बदलाव ज़रूर आ रहा है."

मसलन हाल ही में हुई एक घटना में शादी के दिन दूल्हा गणित का एक साधारण सा सवाल हल नहीं कर पाया जो दुल्हन लवली ने दिया था. इसी बात पर शादी तोड़ दी गई.

ज़ाहिर है लवली जैसी महिलाएँ अब ज़िंदगी के गणित में नुक़सान उठाने को तैयार नहीं हैं.

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