बेरंग लालू की लाली कैसे लौट आई?

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    • Author, उत्तम सेनगुप्ता
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिन्दी डॉटकॉम के लिए

पिछला साल लालू यादव के लिए एक डरावने सपने की तरह था. उन्हें चारा घोटाले में दोषी क़रार दिया गया. वे चुनाव नहीं लड़ सकते थे.

लोकसभा चुनाव में भी लालू यादव की पार्टी राष्ट्रीय जनता दल बुरी तरह हारी थी. कांग्रेस, और खासकर राहुल गांधी के साथ उनके रिश्ते पूरी तरह से बिगड़ चुके थे. वाकई लालू यादव पूरी तरह ख़त्म हो चुके थे.

लेकिन हालिया बिहार विधानसभा चुनाव से उन्होंने वापसी की है.

बिहार विधानसभा चुनाव में राजद अकेली सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी है. भाजपा के जो नेता 'किंग मेकर' कहकर उनका मखौल उड़ाया करते थे वे अपनी क़रारी हार के बाद अब ख़ामोश हो गए हैं.

अपनी हार से भाजपा दुखी है. वो चाहती है कि लालू यादव नीतीश कुमार के लिए मुश्किलें खड़ी करें.

भाजपा ये सोच कर ख़ुश हो रही है कि आने वाले दिनों में लालू यादव के हाथ में रिमोट कंट्रोल रहेगा और बिहार की नई सरकार जल्दी ही गिर जाएगी.

वो बल्कि राजद नेताओं को ये याद कराने में व्यस्त हो गई है कि लालू को उपमुख्यमंत्री पद की मांग करनी चाहिए. और भाजपा बेशक़ ये चाहती है कि राजद के विधायक उसी अराजकता का परिचय दें जिसके लिए लालू यादव बदनाम रहे हैं.

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यदि ऐसा हुआ तो बिहार की जीत की ख़ुशी जल्द ही ग़ायब हो जाएगी. और महागठबंधन तुरंत बिखर जाएगा.

लेकिन लालू प्रसाद यादव ने संकेत दिए हैं कि ऐसा कुछ नहीं होगा.

पटना में रविवार को हुए एक संयुक्त प्रेस कांफ्रेंस में संकेत दिए कि वे और नीतीश छिपी हुई दिक्कतों को लेकर पहले से सजग थे. उन्होंने वो बात भी कही जो जीत की धूमधाम में दब गई थी.

वे बोले, "हम इतने बेवकूफ़ नहीं कि आने वाले ख़तरों को भांप न सकें... अगर हमने अब ग़लती की तो जनता कभी माफ़ नहीं करेगी."

लालू यादव ने अपने संकल्प को जाहिर किया कि वे राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष की भूमिका निभाते रहेंगे. और ये संयोग नहीं कि उन्होंने ऐलान किया कि वे जनता का धन्यवाद देने के लिए वाराणसी, प्रधानमंत्री के निर्वाचन क्षेत्र, जाएंगे.

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बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में लालू प्रसाद यादव और उनकी पत्नी राबड़ी देवी के 1990-2005 के शासन काल को जंगल राज या अराजक शासन पुकारना एक फ़ैशन बन गया है.

चारा घोटाला 1996 में सामने आया जिसमें 1983-1996 के बीच 1,200 करोड़ रुपए का घपला हुआ और इस मामले में लालू यादव को 1997 में गिरफ़्तार कर जेल भेज दिया गया.

ये मामला उन कई मामलों में से एक था जिनके आधार पर लालू को 2014 में दोषी करार देते हुए चुनाव लड़ने से रोक दिया गया.

लेकिन उनके आलोचकों ने कई बातें बड़ी आसानी से भूला दी है.

बिहार में 1980-1990 के बीच की अवधि कोई स्वर्णिम युग नहीं थी.

लालू प्रसाद के मुख्यमंत्री बनने के पहले जनसंहार, जाति आधारित निजी सेनाएं, माओवादी हिंसा, फिरौती के लिए अपहरण जैसी समस्याएं मौजूद थीं.

साल 1995 में शानदार चुनावी जीत के बस एक साल बाद ही चारा घोटाला हुआ था.

तत्कालीन मुख्यमंत्री, वित्त मंत्री, गृह मंत्री होने के कारण उन्हें तब इस घोटाले के लिए जवाबदेह ठहराया गया था.

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लालू के ख़िलाफ़ सारे सबूत परिस्थितिजन्य थे.

सीबीआई ने घोटाले में पूर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्रा जैसे राजनेता, आईएएस अधिकारी, आपूर्तिकर्ताओं आदि पर आरोप लगाए थे. घोटाले को संरक्षण देने के बावजूद पुलिस और सतर्कता अधिकारी लोगों की आंखों में धूल झोंकने में सफल हो गए.

इन संरक्षकों का एक बड़ा हिस्सा थे अगड़ी जातियां और 'शिक्षित'.

लालू प्रसाद यादव जब केंद्रीय रेल मंत्री थे तो उनसे एक संवाददाता ने पूछा कि रेलवे में उल्लेखनीय काम करने के बावजूद वे बिहार में क्यों हार गए. उनका जवाब निरुत्तर कर देने वाला था.

उन्होंने कहा, “ जब 1996 में काम करने का वक्त आया तो मुझे जेल में डाल दिया गया."

हालांकि हल्के फुल्के अंदाज में कही गई ये बात सवाल का जवाब नहीं थी लेकिन इसमें एक आशय छिपा था.

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मुख्यमंत्री के रूप में ज़िम्मेदारी संभालने से पहले लालू यादव कभी भी मंत्री नहीं बने थे. उन्होंने काम करते हुए सब कुछ सीखा.

अपने दूसरे कार्यकाल में ख़ुद का अस्तित्व बनाए रखने के लिए वे राजनीतिक लड़ाई लड़ रहे थे.

लेकिन 2004 से 2009 के बीच रेल मंत्री के रूप में उनका कार्यकाल विवादों से मुक्त रहा. उन्होंने सबक ले लिया था.

उन्होंने संवाददाता को बताया, “मैंने ख़ुद डॉ मनमोहन सिंह को कहा था कि मुझ पर नज़र रखने के लिए वे आईबी, रॉ और कोई दूसरी एजेंसी को लगा दें... मैं जानता हूं कि लोग मेरा भेद जानने के इंतज़ार में हैं.”

उनके हाव-भाव से हम निश्चिंत हो सकते हैं कि लालू यादव को बिहार के लोगों ने जो दूसरा मौक़ा दिया है उसे वे अब नहीं गंवाएंगे.

जनता ने दूसरा मौक़ा दिया है. तीसरे की बारी कभी नहीं आएगी.

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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