जहां एंबुलेंस बचती हैं रैलियों के रास्ते से

इमेज स्रोत, P M TEWARI
- Author, पीएम तिवारी
- पदनाम, कोलकाता से, बीबीसी हिंदी के लिए
सुबह उठते ही अख़बार पढ़ना अब पल्टू दास की दिनचर्या में शामिल हो गया है. अब सवाल उठता है कि इसमें नई बात क्या है?
दरअसल, पल्टू दास सुर्ख़ियों या ख़बरों के लिए अख़बार नहीं पढ़ते. पेशे से एंबुलेंस ड्राइवर पल्टू की जिज्ञासा महज़ यह जानने तक सीमित है कि उस दिन महानगर में कब किसकी रैली होगी.
ताकि किसी गंभीर मरीज़ को अस्पताल पहुंचाते समय वे वैकल्पिक रास्ता तलाश सकें. दो बार ट्रैफ़िक जाम में फंसने के कारण उनकी एंबुलेंस में सवार मरीज़ों की मौत हो चुकी हैं.
पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता धीरे-धीरे रैलियों का शहर बनता जा रहा है.

इमेज स्रोत, P M TEWARI
वर्ष 2014 के दौरान शहर में कुल 1480 रैलियां हुई थीं. यानी रोज़ाना औसतन चार से ज़्यादा.
अब अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए इस साल पिछला रिकार्ड टूटने की पूरी संभावना है.
किसी बड़ी रैली की स्थिति में ट्रैफ़िक व्यवस्था ठप होने की वजह से आम लोगों के अलावा मरीज़ों और ट्रेन या हवाई यात्रा करने वाले यात्रियों को गंभीर ख़मियाजा भुगतना पड़ता है.
कोलकाता ट्रैफ़िक पुलिस के आंकड़ों से साफ़ है कि बीते पांच वर्षों के दौरान हर साल छोटी-बड़ी एक हज़ार से ज़्यादा रैलियों का आयोजन होता रहा है.

इमेज स्रोत, P M TEWARI
बीते साल यह आंकड़ा लगभग डेढ़ हज़ार तक पहुंच गया और इस साल अब तक की स्थिति देखे तो इस रिकॉर्ड के पीछे छूट जाने में कोई संदेह नहीं है.
महानगर के सबसे व्यस्त इलाके धर्मतल्ला में स्थित रानी रासमणि रोड तो रैली रोड ही बन गया है.
शहर में रैली चाहे किसी भी संगठन की और कहीं से निकले, वह ख़त्म होती है यहीं आकर.
शायद ही कोई ऐसा दिन होता है जब वहां सुबह से शाम तक चार-पांच रैलियां और सभाएं नहीं होती हों.

इमेज स्रोत, P M TEWARI
ट्रैफ़िक जाम से होने वाले नुकसान का गंभीर आर्थिक पहलू भी है.
ऑटोमोबाइल उत्सर्जन विशेषज्ञ सोमेंद्र मोहन घोष कहते हैं, ''जाम में फंसे वाहनों से भारी प्रदूषण होता है. तीन किमी लंबी सड़क पर एक घंटे तक वाहनों के फंसे होने की हालत में कम से कम चार सौ लीटर ईंधन ख़र्च होता है.''
शहर का प्रमुख व्यापारिक केंद्र होने के कारण छोटा-सी रैली से भी पूरा कारोबार ठप हो जाता है.

इमेज स्रोत, P M TEWARI
दिलचस्प बात यह है कि तमाम प्रमुख राजनीतिक दल रैलियों की बढ़ती तादाद, ट्रैफ़िक व्यवस्था पर उसके असर और आम लोगों को होने वाली परेशानियों पर चिंता तो जताते हैं, लेकिन उनकी कथनी और करनी में अंतर साफ़ नज़र आता है.
सीपीएम सांसद मोहम्मद सलीम कहते हैं, ‘रैली आयोजित करने और विरोध जताने के अधिकार पर अंकुश नहीं लगाया जा सकता. लेकिन ट्रैफ़िक के बेहतर प्रबंधन से आम लोगों को होने वाली परेशानियां कम हो सकती हैं. इसके अलावा रविवार और छुट्टी के दिन रैलियों के आयोजन से कई समस्याएं सुलझ सकती हैं.’
तृणमूल कांग्रेस नेता पार्थ चटर्जी कहते हैं, ''अगर मीडिया इन रैलियों और धरने-प्रदर्शनों की कवरेज बंद कर दें तो इनकी तादाद अपने-आप कम हो जाएगी.''

इमेज स्रोत, P M TEWARI
कांग्रेस नेता ओम प्रकाश मिश्र भी इस स्थिति के लिए कुछ हद तक मीडिया को ज़िम्मेदार मानते हैं.
वे सवाल करते हैं कि क्या मीडिया कोलकाता से दूर किसी छोटे शहर में होने वाली छोटी-मोटी रैलियों की कवरेज करने जाएगा?
अपनी ताक़त दिखाने और प्रचार पाने के लिए ही तमाम संगठन शहर के प्रमुख इलाक़े में जुटते हैं.
सुझाव तो सबके पास है, लेकिन कोई ख़ुद उन पर अमल करने को तैयार नहीं है.
<bold>(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप <link type="page"><caption> यहां क्लिक</caption><url href="https://play.google.com/store/apps/details?id=uk.co.bbc.hindi" platform="highweb"/></link> कर सकते हैं. आप हमें <link type="page"><caption> फ़ेसबुक</caption><url href="https://www.facebook.com/bbchindi" platform="highweb"/></link> और <link type="page"><caption> ट्विटर </caption><url href="https://twitter.com/BBCHindi" platform="highweb"/></link>पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)</bold>












