स्कूलों में मिड डे मील के बदले पैसे?

 स्कूलों में दोपहर का भोजन

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    • Author, इमरान क़ुरैशी
    • पदनाम, बैंगलुरू से, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए

क्या जिन बच्चों को स्कूलों में दोपहर का खाना नहीं मिलेगा, उन्हें उसके बदले पैसे दिए जाएंगे?

यह सवाल विशेषज्ञों को परेशान कर रहा है.

मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने स्कूलों में ज़हरीला खाना परोसे जाने के मामले से बचने के लिए नए नियम बनाए तो यह सवाल उठने लगा.

भोजन की गुणवत्ता

बिहार के एक स्कूल में 'मिड डे मील स्कीम' के तहत विषाक्त खाना परोसा गया था.

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इमेज कैप्शन, बिहार के एक स्कूल में 'मिड डे मील स्कीम' के तहत विषाक्त खाना परोसा गया था.

एक अक्टूबर को इस नियम से जुड़ी अधिसूचना जारी की गई. इसमें स्कूलों में बच्चों को दिए जाने वाले दोपहर के भोजन की गुणवत्ता पर चिंता जताई गई है.

अधिसूचना में कहा गया है, "भोजन की गुणवत्ता का पता लगाने के लिए हर महीने इसके नमूनों की जांच अधिकृत प्रयोगशालाओं में की जाएगी."

इसके साथ ही स्कूली बच्चों को खाना के बदले खाद्य सुरक्षा भत्ता यानी पैसे देने के नियम की भी बारीकी से पड़ताल शुरू हो गई.

खाद्य अधिकार के मामले में सुप्रीम कोर्ट की ओर से नियुक्त आयुक्त और वकील क्लिफ़्टन रोज़ेरियो कहते हैं, "यह संविधान के तहत दिए गए भोजन के अधिकार का खुल्लम खुल्ला उल्लंघन है. सुप्रीम कोर्ट ने अपने कई आदेशों में कहा है कि बच्चों को खाना दिया जाना चाहिए."

बच्चे पैसे का क्या करेंगे?

क्या ये बच्चे पैसे लेकर ख़ुद खाने की व्यवस्था कर पाएंगे?

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इमेज कैप्शन, क्या ये बच्चे पैसे लेकर ख़ुद खाने की व्यवस्था कर पाएंगे?

वे सवाल करते हैं, "क्या सरकार छह से 14 साल की उम्र के बच्चों से यह उम्मीद करती है कि वह उन्हें पैसे दे दें और स्कूलों की ग़ैर ज़िम्मेदारी की वजह से खाने की व्यवस्था ये बच्चे ख़ुद करें? स्कूलों के पास कोई विकल्प नहीं है. उन्हें बच्चों को दोपहर का भोजन देना ही होगा. आदिवासी इलाक़ों और ऐसे पंचायतों के बच्चे क्या करेंगे जहां रेस्तरां नहीं हैं?"

नेशनल इंस्टीच्यूट ऑफ़ एडवांस्ड स्टडीज़ के प्रोफ़ेसर नरेंदर पाणि एक दूसरा मुद्दा उठाते हैं.

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वे कहते हैं, "पहले तो सरकार बच्चों को पैसे दे, जिन पैसों पर उसका कोई नियंत्रण नहीं है. बच्चों को दिए जाने वाले भोजन की गुणवत्ता पर निगरानी रखने का कोई तरीका नहीं है."

इंटरनेशनल सोसाइटी फॉर कृ्ष्णा कॉन्शसनेस (इस्कॉन) की मदद से अक्षय पात्र फाउंडेशन चलता है. यह फाउंडेशन 12 राज्यों के 11,000 स्कूलों में 15 लाख से ज़्यादा बच्चों को दोपहर का भोजन खिलाता है.

फाउंडेशन के ट्रस्टी मोहनदास पई कहते हैं, "कुपोषण के शिकार बच्चों को पोषण और शिक्षा देना सबसे बड़ी चुनौती है. उन्हें पैसे देना इस मामले को नहीं समझना और उसे उलझाना है."

अर्थव्यवस्था पर असर

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प्रोफ़ेसर पाणि तकनीकी रूप से एक बड़ा सवाल उठाते हैं.

वे कहते हैं, "बच्चों को भोजन देने के लिए सरकार अनाज खरीदती है और उसे बांटती है. यह एक बात है. पर यदि आप बच्चों को पैसे देंगे, वे उसे रेस्तरां में खर्च कर देंगे. यह रेस्तरां मालिकों की आय हुई, जिसे वो किसी और मद में खर्च करेंगे. इसके अंत में जो हासिल होता है, उसे अर्थशास्त्री 'मल्टीप्लायर इफ़ेक्ट' कहते हैं, यानी पैसे को कई गुना बढ़ाने करने का प्रभाव."

वे इसके आगे कहते हैं, "खाने पीने की चीज़ों पर इस 'मल्टीप्लायर इफ़ेक्ट' से महंगाई का दवाब बढ़ता है. दोनों बातों पर ध्यान देना ज़रूरी है. बच्चों को अच्छा खाना मिले, इसके साथ ही अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले इसके प्रभाव पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए."

मूल अवधारणा के ख़िलाफ़

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उनके मुताबिक़, "यह मध्याह्न भोजन कार्यक्रम की मूल अवधारणा के ही ख़िलाफ़ है."

पई कहते हैं कि यूपीए सरकार भोजन के अधिकार से जुड़ा विधेयक लाई थी, उसी समय से यह नियम है. पर इस मामले में भत्ता दिए जाने की कोई मिसाल अब तक नहीं मिली है. इस नियम को बदलना ही होगा.

कर्नाटक के खाद्य व नागरिक आपूर्ति मंत्री दिनेश गुंडु राव पई की बातों से सहमत हैं. वे यह मानते हैं कि पैसे देना व्यवहारिक और अच्छा विकल्प नहीं है.

गुंडु राव कहते हैं, "यह एक तरह से निवारण यानी बचने का तरीका है. इस स्कीम को पैसे से जोड़ना ही असली समस्या है. हमें इस पर फिर से विचार करना चाहिए. हम पर इस पर विचार विमर्श करेंगे और उसके बाद केंद्र सरकार को लिखेंगे."

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