आरक्षण पर नए सिरे से बहस की ज़रूरत?

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- Author, शशि थरूर
- पदनाम, लेखक और राजनेता
गुजरात में हाल ही में आरक्षण की मांग पर एक प्रभावशाली समुदाय के प्रदर्शन में आठ लोग मारे गए.
पटेल समुदाय शिक्षा और सरकारी नौकरियों में आरक्षण की मांग कर रहा है.
इस घटना के बाद आरक्षण के मुद्दे पर एक नई बहस की ज़रूरत है. लेकिन क्यों?
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प्रभावशाली पटेल समुदाय के विशाल प्रदर्शन ने न केवल भारत को हिलाकर रख दिया है बल्कि देश के तेजी से विकास करते राज्य गुजरात को भी ठप कर दिया.
आश्चर्यजनक रूप से जुझारू नेता के रूप में उभरे 22 साल के हार्दिक पटेल के नेतृत्व में लाखों लोग राज्य के प्रमुख शहरों में इकट्ठा होकर आरक्षण की मांग करने लगे.

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इसके बाद हिंसा भड़क गई, जिससे संपत्ति का नुकसान हुआ, आठ लोगों की जान गई और सेना को बुलाना पड़ा.
हार्दिक पटेल को कुछ देर के लिए गिरफ़्तार किया गया और जब गुस्सा और हिंसा और भड़क गई तो उन्हें छोड़ दिया गया.
इस प्रदर्शन से भारतीय राजनीति के बारे में बनी कुछ बुनियादी धारणाएं भी टूट गईं.
भेदभाव
1950 में स्वीकार किए गए भारतीय संविधान ने दुनिया के सबसे पुराने और सबसे व्यापक आरक्षण कार्यक्रम की नींव रखी.
इसमें अनुसूचित जन जातियों और अनुसूचित जातियों को शिक्षा, सरकारी नौकरियों, संसद और विधानसभाओं में न केवल आरक्षण दिया गया बल्कि समान अवसरों की गारंटी भी दी गई.
ये आरक्षण या कोटा जाति के आधार पर दिया गया था. भारत में आरक्षण के पक्ष में दिया जाने वाला तर्क बेहद साधारण था, यानी, इसे सदियों से जन्म के आधार पर किए जाने वाले भेदभाव को खत्म करने के तरीक़े के तौर पर सही ठहराना.
यह उन लाखों दुर्भाग्यशाली लोगों के लिए एक छोटा सा हर्जाना भर था जिन्होंने अछूतपने के अपमान और नाइंसाफ़ी को हर रोज़ बर्दाश्त किया था.
साल 1989 में आरक्षण पर तब राजनीति तेज़ हो गई जब वीपी सिंह की सरकार ने मंडल आयोग की सिफ़ारिशों के आधार पर अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) को भी आरक्षण देने का फैसला किया.

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ओबीसी उन निम्न और मध्यवर्ती जातियों से आते थे, जिन्हें इसलिए पिछड़ा माना जाता था क्योंकि उन्हें समाज में ऊंची जाति वाला दर्जा हासिल नहीं था.
जैसे जैसे लोग पहले से ही कम हो रही सरकारी और विश्वविद्यालयों की नौकरियों में हिस्सेदारी मांगने लगे, वैसे वैसे जातियों में खुद को पिछड़ा घोषित किए जाने के लिए हास्यास्पद हद तक होड़ लग गई.
मसलन, राजस्थान में मीणा और गुर्जर जातियों को मूल रूप से ओबीसी में शामिल नहीं किया गया था लेकिन दोनों में एक दूसरे से भी ज़्यादा पिछड़ा होने की होड़ हास्यास्पद लगती अगर दोनों पक्ष बहुत गंभीर नहीं होते.
मेरे एक चाचा ने इस होड़ को कुछ यूं कहा था, “अब हमारे देश में आप अगड़े तब तक नहीं कहे जा सकते जब तक आप पिछड़े न हों.”
प्रभावशाली जाति

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हालांकि आरक्षण की मांग करने वाला पटेल समुदाय ऐसी जाति नहीं है. असल में ये लोग गुजरात में 15 प्रतिशत की आबादी के लिहाज से अधिक प्रभावशाली, प्रमुख, सफल और सम्पन्न हैं.
गुजरात की मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल इसी जाति से आती हैं और इनके कैबिनेट में अधिकांश अहम पदों पर पटेल ही हैं. जबकि हार्दिक पटेल कहते हैं कि समुदाय के अधिकांश लोग कम संपन्न हैं.
लेकिन पूरी जाति के लिए आरक्षण की मांग करना गुजरात के अधिकांश लोगों को अटपटा लग रहा है.
असल में भारत की हर समस्या की तरह यह समस्या राजनीतिक अधिक है.
भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने उम्मीद की थी कि आज़ादी के बाद जातीय चेतना धीरे धीरे ख़त्म हो जाएगी लेकिन इसका उलटा हुआ.
चूंकि जाति खुद की पहचान का एक मजबूत स्रोत है, इसलिए भारत के चुनावी लोकतंत्र में यह राजनीतिक गोलबंदी का एक प्रमुख हथियार साबित हुआ.
यानी, जब एक भारतीय अपना वोट देता है तो वो आम तौर पर अपनी जाति को ही वोट करता है. भारतीय राजनीति में तमाम जातियों को फायदा पहुंचाना, वोट बैंक की राजनीति का प्रमुख तरीका हो गया.
तमिलनाडु में 69 प्रतिशत कोटा

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इस तरह का फ़ायदा लेने वाली जातियों की संख्या अलग अलग राज्यों में अलग अलग है, लेकिन तमिलनाडु जैसे राज्य में तो यह चरम पर पहुंच चुका है, जहां ग़रीब और पिछड़ी जातियों के लिए सरकारी नौकरियों और शैक्षिक पदों में 69 प्रतिशत आरक्षण है.
हालत ये है कि इस राज्य में ब्राह्मणों के लिए दलित या पिछड़ी जातियों वाले जाली सर्टिफ़िकेट का पूरा घरेलू उद्योग चल पड़ा है.
लेकिन इसका अनिवार्य दुष्परिणाम भी तय था. ऊंची जातियों के लोग आरक्षण की निंतरता पर दोष मढ़ने लगे हैं और सवाल खड़े किए हैं उसके तर्क संगत होने पर.
उदाहरण के लिए उनकी ओर से ये पूछा जाने लगा कि पिछड़ी जाति से आने वाले एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी की बेटी को क्यों आरक्षण मिलना चाहिए?
जबकि ऊंची जाति के एक ड्राइवर या क्लर्क के बेटे को सीमित सामान्य सीटों के लिए संघर्ष करना पड़ता है.
कुछ लोगों का तर्क है कि अब आरक्षण को जाति आधारित नहीं रहने देना चाहिए बल्कि इसे आर्थिक आधार के साथ जोड़ देना चाहिए, जिसमें कुछ जातियों के सम्पन्न लोगों की बजाय सभी जातियों के ग़रीबों को लाभ मिलेगा.
(बहुतों को संदेह है कि हार्दिक पटेल आरक्षण के लिए आंदोलन नहीं चला रहे हैं, बल्कि असल में असंभव मांग कर के, वो आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था ही ख़त्म करना चाहते हैं.)
विरोध

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हालांकि मौजूदा व्यवस्था में लाभ पाने वाली जातियों ने कड़ी प्रतिक्रिया दी कि इस तरह का बदलाव उस सामाजिक भेदभाव को नज़रअंदाज करता है जो छुआछूत के कारण मौजूद है.
उदाहरण के लिए एक दलित परिवार कितना ही संपन्न हो, अधिकांश ऊंची जाति वाले भारतीय उसे सम्मान नहीं देंगे, जब तक कि वो किसी सम्मानजनक सरकारी पद पर न हों.
गुजरात में पटेलों का प्रदर्शन आरक्षण को लेकर देशव्यापी बहस को शुरू करने में सफल रहा है.
दिलचस्प है कि इस साल की शुरुआत में ही सुप्रीम कोर्ट ने जाट समुदाय को ओबीसी के तहत आरक्षण देने वाली सरकारी अधिसूचना को रद्द कर दिया था.
जजों का तर्क था कि आरक्षण की मांग के सवाल पर सरकार को स्वघोषित पिछड़े वर्ग या अगड़े वर्गों की धारणा के साथ बह नहीं जाना चाहिए.
सुप्रीम कोर्ट का नज़रिया

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सबसे अहम ये है कि कोर्ट ने ये मानते हुए कि ऐतिहासिक रूप से देश में जाति व्यवस्था नाइंसाफ़ी का प्रमुख कारण रही है, स्वीकार किया कि किसी वर्ग के पिछड़ेपन का एकमात्र कारण जाति नहीं हो सकती.
‘पिछड़ेपन को तय’ करने का आसान कारण जाति हो सकती है, लेकिन शीर्ष अदालत ने किसी समूह को सिर्फ जाति के आधार पर पिछड़ा घोषित करने और इसके लिए नए तरीक़े और मानदंड मानने के प्रति अगाह भी किया.
अदालत ने चेतावनी दी थी कि आरक्षण का दरवाजा केवल उन्हीं के लिए खोला जाएगा जो सबसे अधिक पीड़ित हैं. इसके अलावा किसी और को इसमें आने की इजाज़त देना सरकार के लिए संविधान के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी से पीछे हटने जैसा होगा.
इसका मतलब है कि सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक़ ओबीसी के तहत लाए जाने की पटेलों की मांग जायज नहीं ठहरती. लेकिन इसका मतलब यह भी है कि भारत में आरक्षण से संबंधित पहलुओं की फिर से समीक्षा करने की ज़रूरत है.
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