पटेल आंदोलन को नीतीश का समर्थन क्यों?

नीतीश कुमार और नरेंद्र मोदी

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    • Author, सुरूर अहमद
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, पटना

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने गुजरात में आरक्षण की मांग कर रहे पटेलों के आंदोलन को 26 अगस्त को अपने समर्थन का ऐलान कर दिया.

यह अपने रानजीतिक विरोधी नरेंद्र मोदी को उनके ही घर में घेरने की कोशिश भर नहीं थी. इसके पीछे बिहार में मौजूद सामाजिक कारण भी थे.

बिहार के अलावा उत्तर प्रदेश और झारखंड के कुर्मी अपने आपको पटेल की तरह ही मानते हैं. गुजरात के अलावा मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में भी पटेल रहते है.

गुजरात के पटीदार या पटेल सिर्फ़ काश्तकारों का समुदाय नहीं है. वे देश-विदेश में मौजूद राजनीति, सामाजिक और आर्थिक रूप से ताक़तवर समुदाय के रूप में उभरे हैं.

इसके वीपरीत बिहार और उत्तर प्रदेश में कुर्मी जनसंख्या और व्यापार के लिहाज़ से उतने प्रभावशाली नहीं हैं. बिहार में कुर्मी पिछड़े हुए तो हैं, पर उनकी आबादी पूरे राज्य की जनसंख्या की दो प्रतिशत भी नहीं है. दूसरी ओर, पटेल गुजरात की कुल आबादी के लगभग एक चौथाई हैं.

बनारस में कुर्मी

गुजरात का पटेल आंदोलन

गुजरात की मुख्यमंत्री आनंदी बेन और वित्त मंत्री सौरभ भाई इसी समुदाय के हैं. उत्तर प्रदेश के अपना दल को कुर्मियों की पार्टी माना जा सकता है. इसकी स्थापना सोनेलाल पेटल ने की थी. बिहार के मुख्यमंत्री इसी जाति के हैं.

नरेंद्र मोदी के चुनाव क्षेत्र बनारस में ढाई लाख कुर्मी रहते हैं. जनसंख्या के लिहाज से वे ब्राह्मणों और मुसलमानों के बाद तीसरे स्थान पर हैं. बिहार की तरह वहां भी कई लोग पटेल टाइटल का इस्तेमाल करत हैं. चुनाव प्रचार के दौरान मोदी ने सोनेलाल पटेल की जम कर तारीफ़ की थी.

साल 1974 का बिहार आंदोलन हो या 1990 के दशक में चला मंडल आंदोलन, पटना के पटेल छात्रावास से कई कुर्मी नेता निकले. इनमें बिहार के मुख्यमंत्री भी हैं.

सरदार पटेल पर राजनीति

सरदार पटेल की प्रस्तावित प्रतिमा

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मोदी ने जब देश के पहले गृहमंत्री सरदार बल्लभ भाई पेटल की दुनिया की सबसे बड़ी मूर्ति बनाने का ऐलान किया, उसके कुछ दिनों बाद ही सितंबर 2013 में नीतीश कुमार ने उनकी लोहे की प्रतिमा का अनावरण कर डाला.

नालंदा ज़िले के मुख्यालय बिहार शरीफ़ में पटेल के नाम पर बने कॉलेज में उनकी प्रतिमा लगाई गई. नीतीश नालंदा के ही हैं.

गुजरात के पटेलों के साथ गठजोड़ करने की नीतीश की इच्छा हमेशा रही. वे 2012 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में प्रचार करने वहां गए.

हालांकि उस समय तक बिहार में जद (यू) और भारतीय जनता पार्टी की साझा सरकार थी, उत्तर प्रदेश का चुनाव दोनों ने अलग अलग ही लड़ा था. वहां कुर्मी वोटरों को एकजुट करने और अपनी ओर मोड़ने में नीतीश को कामयाबी नहीं मिली.

उत्तर प्रदेश का समीकरण

मुलायम सिंह, नीतीश कुमार और शरद यादव

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उत्तर प्रदेश में कुर्मियों की पारंपरकि पार्टी अपना दल ने 2014 का लोकसभा चुनाव भाजपा के साथ मिल कर लड़ा और दो सीटों पर सफलता हासिल की.

भाजपा को वहां 71 सीटें मिलीं. समाजवादी पार्टी को पांच और कांग्रेस को महज दो सीटों से संतोष करना पड़ा था.

गुजरात के पटेलों के वीपरीत बिहार के कुर्मियों के साथ कई तरह की दिक्क़ते हैं. वे अभी भी मुख्य रूप से खेती बाड़ी में ही लगे हुए हैं.

हालांकि वे निर्माण, रियल स्टेट और शिक्षा जैसे कई व्यवासायों में दाखिल हुए हैं, पर इस मामले में सवर्णों से अभी भी काफ़ी पीछे हैं.

'नीतीश हमारा है'

हार्दिक पटेल, गुजरात पटेल आंदोलन के नेता

पटीदार अनामत आंदोलन समिति के हार्दिक पटेल बिहार के कुर्मियों के साथ लगाव को अच्छी तरह समझते हैं.

इसी वजह से 25 अगस्त को हुई रैली में उन्होंने कहा, “नीतीश कुमार भी हमारा है.” उन्होंने यह नारा नीतीश के समर्थन करने के पहले ही दिया था.

राष्ट्रीय जनता दल के नेता लालू यादव ने नरेंद्र मोदी से हिसाब बराबर करने के लिए तुरंत गुजरात के पटेलों के आंदोलन का समर्थन कर दिया.

नीतीश ने भले ही पटेलों का समर्थन कर दिया, पर उनकी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव ने उनके लिए अजीब स्थिति पैदा कर दी.

यादव ने सहरसा में एक रैली में पटेलों के आंदोलन का विरोध किया. उन्होंने साफ़ साफ़ कह दिया कि पटेल काफ़ी संपन्न समुदाय के हैं और उन्हें आरक्षण के लिए आंदोलन नहीं करना चाहिए.

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