केजरीवाल नहीं हैं हार्दिक पटेल

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- Author, शिव विश्वनाथन
- पदनाम, समाजशास्त्री
सामाजिक आंदोलन के दो पक्ष होते हैं जो अक्सर परस्पर विरोधी होते हैं लेकिन आख़िरकार एक दूसरे के पूरक होते हैं.
एक स्तर पर इसके केंद्र में कोई एक आदमी होता है, असल में ऐसे आंदोलन काफ़ी व्यक्तिकेंद्रित और जीवनीपरक होते हैं.
दूसरी तरफ ये संघर्ष के सामूहिक सामाजिक व्याकरण पर भी ज़ोर देते हैं.
पिछले कुछ दिनों में अहमदाबाद की हुई घटनाओं पर प्रतिक्रिया देने वाले लोग दो बातों पर चकित हैं, पटेल समुदाय का ग़ुस्सा और एक नए नेता, हार्दिक पटेल का उदय.
'नई पीढ़ी के प्रतिनिधि'

हार्दिक पटेल के बारे में ज़्यादा जानकारी नहीं हैं और फिर भी उनके बारे में जो मोटी बातें पता चली हैं उन्होंने उनके बारे में उत्सुकता बढ़ा दी है.
हार्दिक के पिता भाजपा के मझोले स्तर के पार्टी कार्यकर्ता हैं. उनका परिवार पानी वितरण का छोटा सा कारोबार चलाता है.
उम्मीद के अनुरूप ही हार्दिक ने कॉमर्स में स्नातक की पढ़ाई की. वो पढ़ाई में बहुत तेज़ नहीं थे. इस तरह की कहानी के मूल में गुस्सा, महत्वाकांक्षा और हताशा मौजूद होती हैं.
सफलता और महत्वाकांक्षाएँ तो चारों तरफ हैं लेकिन खेती-किसानी से शिक्षा की तरफ़ आने वाले नौजवानों को विफलता ज़्यादा कचोटती है
मीडिया की ख़बरों में जिस तरह ये पूछा जा रहा है कि 'कौन हैं हार्दिक' उससे दंभ और तिरस्कार की बू आती है.
इसका सीधा जवाब है कि वो आप के पास-पड़ोस में रहने वाले आम ओबीसी (अन्य पिछड़ी जाति) हैं, जिसे लगता है कि जिस नौकरी पर उनका हक़ था उसे आरक्षण निगल रहा है.
बाहर ही नहीं, अंदर की भी लड़ाई

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हार्दिक याद दिलाते हैं कि पटेलों की यह लड़ाई, असल में पटेलों की अंदरूनी लड़ाई भी है.
वो उस नई पीढ़ी के नौजवान हैं जिसमें इच्छा और उम्मीद दोनों ज़्यादा हैं और उसे सबकुछ बहुत जल्द चाहिए.
आज के युवा के लिए, चाहे वह पटेल हो या कोई और, देरी एक अभिशाप है.
इस युवा पटेल का तरीक़ा कठोर है. वह नागरिक अधिकारों की परवाह नहीं करता. वह युवा दलितों या आदिवासियों की तरह अधिकार नहीं मांग रहा. उसे ये फ़ैसला तुरंत चाहिए.
उसे पटेलों की स्थापित संस्थाओं या उनके दूसरे चेहरे यानी भाजपा को धमकाने में कोई दिक्कत नहीं. वह ज़ोर देकर कहता है कि अगर उसकी मांगें नहीं मानी गईं तो अगले चुनाव में कमल नहीं खिलेगा.
स्टाइल ही आदमी की पहचान बन जाती है, आक्रामक, बेसब्र और ढीठ बना देती है. कुछ महीने पहले तक उसके इन गुणों के बारे में किसी को पता नहीं था, अब वह घर-घर में जाना जाने वाला नाम है.
जब आधिकारिक समय सीमा से ज़्यादा देर तक धरना देने के लिए उन्हें गिरफ़्तार किया गया तो अहमदाबाद जल उठा.
हार्दिक और केजरीवाल

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इसके तुरंत बाद मीडिया और आहत पटेल नेताओं ने तुलनाओं की झड़ी लगा दी. तुरंत ही उन्हें नया केजरीवाल बताया जाने लगा और पटेलों के आंदोलन को अरब स्प्रिंग.
हार्दिक पटेल अरविंद केजरीवाल नहीं हैं. दोनों में बस एक ही चीज़ समान है कि दोनों रातों-रात चमक गए.
केजरीवाल के पास कम से कम आईआईटी डिग्री है और वो राजस्व सेवा के अधिकारी थे. पटेल की बीकॉम की डिग्री से उन्हें शायद ही नौकरी मिल पाए.
केजरीवाल और पटेल अलग-अलग तरह की ताक़तों के प्रतीक हैं. केजरीवाल उस युवा वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं जो एक नई तरह की राजनीति चाहता है, जो आदर्शवादी है और चाहता है कि राजनीति ज़्यादा भागीदारी वाली हो.

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हार्दिक पटेल एक ऐसी पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं जो ये देख रही है कि आरक्षण की राजनीति की वजह से उन्हें उनका शेयर नहीं दिया जा रहा. वह चाहते हैं कि आरक्षण का फ़ायदा उन्हें मिले या फिर किसी को न मिले.
यह कहना ग़लत होगा कि हार्दिक पटेल आरक्षण के ख़िलाफ़ हैं. ये कहना ज़्यादा सही होगा कि हार्दिक ऐसा आरक्षण चाहते हैं जो उन्हें नौकरी की गारंटी दे.
वो समाज के सभी तबकों के संग न्याय की आकांक्षा नहीं रखते बल्कि विकास के मौकों में बराबर की भागीदारी चाहते हैं.
गुस्सा और हताशा

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कई आलोचकों ने उनके चारों ओर एक भ्रम का जाल बुन दिया है कि उनके पीछे किसी बड़ी ताक़त का हाथ है.
कुछ कहते हैं कि हार्दिक को पर्दे के पीछे से कांग्रेस चला रही है तो कुछ कहते हैं अमित शाह.
लेकिन कम ही यह देख पा रहे हैं कि गुजरात की राजनीति में पैदा हुए शून्य से हार्दिक या उनके जैसा ही कोई जन्म लेता.
उनमें एक जायज ग़ुस्सा और हताशा है. उन्हें लगता है कि अपनी सत्ता से संतुष्ट वरिष्ठ पटेल नेता युवाओं को निराशा के अंधे कुएं में धकेल रहे हैं.
राजनीति हमेशा अपनी सीमाओं से आगे निकल जाती है. लोगों को उम्मीद है कि हार्दिक पटेल एक फुसफुसा पटाखा साबित होंगे, लेकिन वो ये नहीं समझ पा रहे हैं कि उनके सामने 60 हज़ार से अधिक हार्दिक पटेल हैं. वो ख़ुद ही संदेश हैं और संदेशवाहक भी.
उन्हें भारी-भरकम बायोडाटा की ज़रूरत नहीं है क्योंकि उनकी सीवी उनकी नाकामी है, उनके सफ़लता के ईर्द-गिर्द बनाई गई सीमाएं जिसने उनमें खीज पैदा की है.

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लोकतंत्र, अधिकार, हक़ के लिए लोग अब बरसों बरस इंतजार नहीं कर सकते हैं. राशन कार्ड वाला समाजवाद एक दलदल जैसा था.
हार्दिक उस पीढ़ी का हिस्सा हैं जो जल्दी में है, जो पुराने तरीकों और समीकरणों से ऊब चुकी है. वो अपनी उम्मीद के अनुरूप ही अपना भविष्य बनाना चाहते हैं.
आज के भारत को यही समझने की ज़रूरत है.
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