'आरक्षण से आर्थिक असुरक्षा का समाधान नहीं'

हार्दिक पटेल

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पटेल आरक्षण के मुद्दे को लेकर जो कोशिश की जा रही है वो अपने आप में दुविधापूर्ण है.

एक तरफ़ वो आरक्षण की मांग कर रहे हैं वहीं दूसरी तरफ़ कह रहे हैं कि या तो आरक्षण दे दिजिए या ख़त्म कर दिजिए.

यह एक द्वंदपूर्ण व्यवहार है जिसमें सैद्धांतिक और व्यवहारिक रूप से कोई रास्ता स्पष्ट नहीं है.

दरअसल यह उस तरह का इलाज है जिसमें आपको मालूम नहीं है कि बीमारी कहां पर है.

हार्दिक पटेल ने गुजरात में चार-पांच दिन पहले जो पटेलों की बड़ी रैली की है उसने 1985 की याद ताज़ा कर दी.

उस वक़्त यही लोग जो आज आरक्षण की मांग कर रहे हैं, खाम जातियों जिसमें अहीर, मुस्लिम और क्षत्रिय थे, के आरक्षण के ख़िलाफ़ हथियार उठाकर खड़े हो गए थे.

उस वक़्त भड़के दंगे में लगभग 1000 लोगों की मौत हुई थीं.

समाधान

आज जो असंतोष पटेल समुदाय के भीतर पैदा हुआ है वो उदारीकरण के दौर में मंद पड़ी अर्थव्यवस्था से उत्पन्न हुआ है.

पहले पटेल लोग कम पढ़े-लिखे होने के बावजूद विदेश चले जाया करते थे लेकिन अब वो आसानी से विदेश नहीं जा पा रहे हैं.

हीरा उद्योग जिसमें पटेलों का वर्चस्व था वो भी अब मंदा चल रहा है. खेती में भी अब कोई ख़ास आकर्षण नहीं बचा है.

अब वे डॉक्टर-इंजीनियर बनना चाह रहे हैं इसलिए चाह रहे हैं कि उन्हें आरक्षण मिल जाए.

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सामाजिक न्याय की लड़ाई सिर्फ़ आरक्षण तक सीमित नहीं है. यह संसाधनों में अन्य प्रकार की वितरण की लड़ाई और उसकी व्यवस्था करना है.

दुनिया भर में लोगों की आमदनी में एक विषमता आई है. यह विषमता अंतरराष्ट्रीय स्तर से लेकर क्षेत्रिय स्तर तक में आई है.

इस विषमता को राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक रूप से ख़त्म करने के बाद ही इन समस्याओं का समाधान होगा.

इस स्तर पर इसे समाधान किए बिना सिर्फ़ जाति-जाति का चक्र चलाते रहेंगे तो लगता नहीं है कि इस समस्या का समाधान हो पाएगा.

विडंबना

यह अपने आप में बहुत बड़ी विडंबना है कि देश तरक़्क़ी कर रहा है और दूसरी तरफ़ पिछड़ा वर्ग का दायरा बढ़ता जा रहा है.

पटेलों का आंदोलन बुनियादी रूप से कोई आरक्षण का समर्थक नहीं है लेकिन उनको लगता है कि अब आरक्षण के तंबू में घूस कर अपने लिए जगह बनाने में ही भलाई है.

एक काम जो हार्दिक पटेल के आंदोलन से हुआ, वह यह हुआ कि गुजरात के बहुप्रचारित मॉडल की पोल खुल गई.

सामाजिक-आर्थिक असुरक्षा का समाधान सिर्फ़ आरक्षण से संभव नहीं.

(बीबीसी संवाददाता निखिल रंजन की वरिष्ठ पत्रकार अरूण कुमार त्रिपाठी से बातचीत पर आधारित)

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