'प्रभावशाली' पटेलों को क्यों चाहिए आरक्षण?

- Author, शिव विश्वनाथन
- पदनाम, समाजशास्त्री
राजनीति विडंबनाओं और विरोधाभासों का पुलिंदा है.
आमतौर पर लोकतंत्र से उम्मीद की जाती है कि इसमें हाशिए के लोगों को मुख्यधारा में शामिल किया जाएगा और समाजवाद इस बात का आभास पैदा कर पाएगा कि उनके साथ न्याय हो रहा है.
<link type="page"><caption> केजरवाल नहीं हैं हार्दिक पटेल</caption><url href="http://www.bbc.com/hindi/india/2015/08/150827_hardik_patel_gujrat_rd.shtml" platform="highweb"/></link>
पर हाल के दिनों में देखा गया है कि भारत में एक बिल्कुल दूसरी तरह की भाषा बोली जा रही है.
यह भाषा हाशिए पर खड़े लोगों की नहीं है, यह मध्य वर्ग की भाषा है. यह न्याय की भाषा नहीं है, यह भाषा है एक पायदान से दूसरे पायदान तक पहुंचने की.
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ताक़तवर और अधिक ताक़तवर बनना चाहते हैं. अगर एक दबंग जाति ज़मीन के बड़े हिस्से पर दबदबा बनाने में कामयाब हो जाती है तो फिर वो शिक्षा पर नियंत्रण करने की फ़िराक़ में लग जाती है.
ज़मीन, शिक्षा और चुनावी प्रणाली, सत्ता तक पंहुचने के तीन रास्ते हैं और दबंग जातियां इन तीनों पर अपना पूरा अधिकार स्थापित करना चाहती हैं.
पाटीदारों का इतिहास इसका उदाहरण है. समाजविज्ञानियों का मानना है कि पाटीदार या पटेल एक बड़ी प्रभावशाली जाति के रूप में उभरे.
उन्होंने ज़मीन पर नियंत्रण को राजनीति पर दबदबा क़ायम करने के लिए इस्तेमाल किया.
जनसांख्यिकी, राजनीति, दुनिया के तमाम जगहों पर उनकी फैलाव, ये सारे उनकी शक्ति के साक्ष्य हैं.
लव-कुश के वंशज

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उनके बारे में मिथक यह है कि लेउवा और कडवा समुदाय के लोग लव और कुश के वंशज हैं.
हालांकि ऐतिहासिक रूप से पाटीदार अंग्रेजों की ईजाद हैं, जो अंग्रेजों के द्वारा शुरू किए गए ज़मीन की पट्टीदारी व्यवस्था में फले फूले.
वर्ण व्यवस्था में उनका ताल्लुक नीची जाति से रहा है लेकिन उन्होंने ख़ुद का संस्कृतीकरण किया. उनमें ज़्यादातर लोग शाकाहारी हैं.
पटेल या पाटीदार समुदाय के लोगों ने भूमि और खेतीबाड़ी से बाहर निकल कर व्यापार जगत में क़दम रखा. विदेशों में आज वे मोटल व्यवसाय का पर्यायवाची बन गए हैं.

अब सवाल यह उठता है कि जो जाति इतनी ताक़तवर और प्रभावशाली है, उसके लोगों में इतना गुस्सा क्यों है कि लाखों ने अहमदाबाद शहर को पूरी तरह ठप कर दिया.
राजनीति की गतिशीलता को कई स्तरों पर समझा जा सकता है कि शक्ति कोई ऐसी मुद्रा नहीं है, जिसको हर जगह भुनाया जा सके.
ज़मीन के बल पर हमेशा बेहतर शिक्षा हासिल नहीं की जा सकती और न ही इसके बल पर रोज़गार हासिल किया जा सकता है.
हाशिए पर खड़े लोग

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हताशा तब बढ़ जाती है जब ये दिखता है कि कुछ पाटीदार मंहगी फ़ीसों वाले बड़े बड़े कॉलेजों के मालिक बन बैठे हैं.
इससे शुरू होता है संघर्ष - उन मज़बूत और कमज़ोर पाटीदारों के बीच, उनमें से एक जो समुदाय के कमज़ोर लोगों के शोषण में तो कुछ ग़लत नहीं समझते लेकिन अपनी उस शक्ति का इस्तेमाल व्यवस्था और शिक्षा में प्रतिनिधित्व को बढ़ाने के लिए कुछ नहीं करते हैं.
तथ्यों की पड़ताल करें तो राजनीति में, कॉलेज पर नियंत्रण में, पटेलों का दबदबा साफ नज़र आता है. लेकिन उसके उलट पटेल समुदाय की शिक्षा में भागीदारी कम है और शिक्षा नौकरियां पाने का अहम ज़रिया है.
इससे गुस्से की भावना बढ़ती है. जो विरोध प्रदर्शन हुए उसमें ग़ुस्सा साफ़ झलकता है.
कमल नहीं खिलेगा

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इनका पहला गुस्सा तो सत्ता के नशे में चूर उन पटेलों से है जो युवाओं के गुस्से को नहीं समझ पा रहे.
दूसरे गुस्सा भारतीय जनता पार्टी से है, जो पटेलों के दबदबे की वजह से ही सत्ता में पंहुची. पूरी बिडंवना इससे साफ़ हो जाती है.
गुजरात कैबिनेट में इतने सारे पटेलों के नाम गिनवाने का क्या फ़ायदा अगर वो आपके किसी काम का न हो?
युवा पटेल इस बात को लेकर साफ हैं कि अगर उनकी मांगें नहीं मानी गईं तो कमल नहीं खिलेगा.
तीसरी बात यह है कि यह आरक्षण विरोधी आंदोलन नहीं है.
पटेल यह चाहते हैं कि जाति और जाति-आधारित आरक्षण का लाभ उन्हें मिले. वे आरक्षण व्यवस्था को तभी ध्वस्त करना चाहते हैं जब वो उनके ख़िलाफ़ काम कर रही हो.
राजनीति में पादीदारों की पारंपरिक स्थिति और समुदाय आधारित राजनीति से कोई काम नहीं बनेगा.
हार्दिक पटेल परस्पर विरोधी विचारधाराओं पर काम कर रहे हैं.
वे ऐसा नया काडर बनाना चाहते हैं जो उनका वफ़ादार हो और वो मौजूद व्यवस्था में अपना बड़ा हिस्सा चाहते हैं.
मतभेदों के बाद क्या?

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आधुनिक मीडिया और युवाओं की ताक़त प्रभावशाली जाति आधारित राजनीति को और मज़बूत ही करती है.
जब नए और पुराने के बीच का मतभेद ख़त्म हो जाएगा, चतुर लोग मिल बैठ कर बात करेंगे, उस समय मोदी और शाह के इर्द गिर्द घूम रही पिछड़ी जाति की राजनीति और मज़बूत ही होगी.
चुनाव आधारित राजनीति की यह तार्किक परिणति है. यह भूमंडलीकरण का भी नतीजा है.
पाटीदार समुदाय के लोग जातिवादी हैं. पर भूमंडलीकरण की वजह से वे शिक्षा का महत्व समझते हैं.

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उन्होंने पहले जिस तरह ज़मीन पर नियंत्रण का फ़ायदा उठाया, अब उसी तरह शिक्षा का इस्तेमाल अपने हित में करना चाहते हैं.
पटेलों के विरोध का मौजूदा अर्थ यही है.
आरक्षण के खेल का नियम बदल कर अपनी सत्ता को और मजबूत करने का यह तरीका है.
वे आरक्षण के ज़रिए हाशिए पर खड़े लोगों की नहीं बल्कि पूरे ओबीसी वर्ग के लोगों की ताक़त बढ़ाना चाहते हैं.
ऊंची आकांक्षा रखने वाले समाज में न्याय तभी काम करता है जब यह आपके हित में काम करे. मौजूदा राजनीति का यही तर्क है.
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