समझौता धमाके में मामला वहीं का वहीं

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- Author, अंकुर जैन
- पदनाम, अहमदाबाद से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
भारत में 2006 से 2008 तक हुए बम धमाकों की छह घटनाओं में 120 से ज्यादा लोग मारे गए और 400 से ज्यादा घायल हुए थे.
प्रारंभिक जांच में इन बम धमाकों में राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ (आरएसएस) से प्रत्यक्ष या परोक्ष तौर पर जुड़े लोगों के नाम सामने आए थे.
ये घटनाएँ 'भगवा आतंक' या 'हिंदू चरमपंथ' के नाम से चर्चित हुईं.
लेकिन आज तक इनमें से किसी भी मामले में कोई भी दोषी क़रार नहीं दिया जा सका है. कई में सुनवाई तक नहीं शुरू हुई है. एक मामला तो बंद हो चुका है.
<link type="page"><caption> पहली क़िस्त पढ़ेंः एनआईए 'हिंदू चरमपंथ' के मामलों में नाकाम?</caption><url href="http://www.bbc.com/hindi/india/2015/07/150720_nia_terror_attack_investigation_tk" platform="highweb"/></link>
इन सभी मामलों की जांच भारत की प्रमुख एजेंसी एनआईए यानी राष्ट्रीय जांच एजेंसी कर रही है.
बीबीसी की इस विशेष सीरीज़ की दूसरी क़िस्त में पढ़ें 18 फ़रवरी 2007 को दिल्ली से अटारी जा रही समझौता एक्सप्रेस में हरियाणा के पानीपत के पास हुए धमाके के बारे में.
समझौता एक्सप्रेस धमाका

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समझौता एक्सप्रेस की दो बोगियों में धमाका हुआ, जिसमें 68 लोग मारे गए.
हरियाणा पुलिस और महाराष्ट्र के एटीएस ने अपनी जांच में एक हिंदू कट्टरपंथी संगठन 'अभिनव भारत' की ओर संकेत किया था.
'अभिनव भारत' के कर्ताधर्ता कथित तौर पर सेना के एक अधिकारी कर्नल श्रीकांत पुरोहित थे.
हरियाणा पुलिस की जांच में इंदौर के एक दर्जी का पता चला, जिसने उस सूटकेस का कवर सिला था जिसमें बम रखे गए थे.
जब समझौता एक्सप्रेस, अजमेर और हैदराबाद की मक्का मस्ज़िद में हुए धमाकों में शक की सुई हिंदू चरमपंथी गुटों की ओर गई तो मामला और पेचीदा हो गया.
जब कोई और सुराग नहीं मिला तो 29 जुलाई 2010 को इसकी जांच एनआईए को सौंप दी गई.
एनआईए ने क्या किया?

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हरियाणा पुलिस को मिले सूटकेस के सुराग से एनआईए ने अपनी जांच शुरू की, लेकिन इसमें उसे मामूली सफलता हासिल हुई.
इस बीच हैदराबाद धमाके की जांच कर रही केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने नवंबर 2010 में हरिद्वार से स्वामी असीमानंद को गिरफ़्तार किया.
असीमानंद ने कबूल किया कि वो समझौता एक्सप्रेस धमाके में शामिल थे और उनके ही आदमियों ने मक्का मस्जिद और अजमेर में धमाके किए थे.
इस कबूलनामे के बाद एनआईए ने 23 दिसम्बर 2010 को असीमानंद को अपनी हिरासत में ले लिया.
तीन महीने बाद असीमानंद ये कहते हुए अपने बयान से मुकर गए कि उन्होंने वो बयान टॉर्चर की वजह से दिया था.
इस मामले के आठ अभियुक्तों के ख़िलाफ़ एनआईए एक चार्जशीट और दो सप्लिमेंटरी चार्जशीट दायर कर चुकी है, जिनमें तीन लोग अभी भी फ़रार हैं.
चार्जशीट में बातचीत के लहजे वाले बयानों की भरमार है और इसमें दस्तावेज़ी सबूत नहीं हैं.
असीमानंद को जमानत

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अधिकांश तर्क असीमानंद के कबूलनामे पर आधारित हैं, जिनसे वो पहले ही मुकर चुके हैं.
हमले में इस्तेमाल किया गया आरडीएक्स और धन के स्रोत का पता नहीं चला है.
मामले की सुनवाई 24 फ़रवरी 2014 से ही पंचकुला में एनआईए की एक विशेष अदालत में जारी है.
कोर्ट में एनआईए असीमानंद के ख़िलाफ़ पर्याप्त सबूत नहीं दे पाई, इसलिए उन्हें जमानत मिल गई.
एनआई ने अभी तक अमित उर्फ प्रिंस, साध्वी प्रज्ञा, इंद्रेश कुमार, देवेंदर गुप्ता और कुछ अन्य लोगों के ख़िलाफ़ चार्जशीट दायर नहीं की है.
(इसी सीरीज़ की तीसरी क़िस्त में 2007 में हैदराबाद की मक्का मस्ज़िद में हुए धमाके के बारे में पढ़ें)
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