इंटरनेट पर मुफ़्त बंट रही 'होशियारी'!

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    • Author, पारुल अग्रवाल
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

मध्य प्रदेश के जबलपुर के अमोल भावे फ़ोन पर बात करते हुए लगातार अपना अमरीकी लहज़ा छिपाने की कोशिश करते हैं.

अमोल इन दिनों अमरीका के बॉस्टन शहर में दुनिया के सबसे बेहतरीन विश्वविद्यालों में से एक <link type="page"><caption> एमआईटी</caption><url href="http://ocw.mit.edu/index.htm" platform="highweb"/></link> यानी मेसाच्यूसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलोजी के छात्र हैं.

लेकिन एमआईटी तक पहुंचने की अमोल की कहानी बेहद दिलचस्प है.

इस कहानी के कई किरदार हैं जैसे छोटे शहरों की जिंदगी, घरों में कंप्यूटर की दस्तक, इंटरनेट की धीमी स्पीड और शिक्षा के क्षेत्र में भारतीयों के लिए खुलते दुनिया के दरवाज़े.

'बदल गई ज़िंदगी'

अमोल भावे

अमोल <link type="page"><caption> MOOCs </caption><url href="http://www.bbc.com/hindi/india/2015/06/150620_online_education_mooc_edx_sr" platform="highweb"/></link>यानी मैसिव ओपन ऑनलाइन कोर्सेज़ के दीवाने हैं.

सीधी-सरल भाषा में कहें तो MOOCs यानी दुनियाभर के विश्वविद्यायों के ज़रिए इंटरनेट पर मौजूद पाठ्यक्रम जो आम तौर पर मुफ़्त होते हैं.

अमोल बताते हैं, "मुझे गणित और फिज़िक्स पढ़ने का हमेशा से शौक था. 2012 में गर्मियों की छुट्टियों के दौरान मुझे पता लगा कि दुनिया की कई बड़ी यूनिवर्सिटीज़ अलग-अलग विषयों पर MOOCs यानी मुफ्त ऑनलाइन कोर्स उपलब्ध करा रही हैं. एमआईटी यूनिवर्सिटी के चार हफ्ते के ऐसे ही एक कोर्स के ज़रिए मुझे एहसास हुआ कि ये तो एक अलग ही दुनिया है."

ज्ञान का भंडार

मनोविज्ञान, इतिहास, भारत की जाति व्यवस्था, कंपनी शुरु करने के तौर तरीके, आंकड़ों को समझने के गुर, डाटा एनेलेटिक्स या डाटा साइंस, इंटरनेट पर MOOCs के खज़ाने में क्या-कुछ मौजूद नहीं.

ये पाठ्यक्रम कोरसेरा(<link type="page"><caption> Coursera</caption><url href="https://www.coursera.org/" platform="highweb"/></link>), एडैक्स(<link type="page"><caption> Edx</caption><url href="https://www.edx.org/" platform="highweb"/></link>), यूडासिटी(<link type="page"><caption> Udacity</caption><url href="https://www.udacity.com/" platform="highweb"/></link>) जैसी MOOCs वेबसाइटों के अलावा ऑक्सफ़र्ड, हार्वर्ड, एमआईटी जैसे दुनिया के तमाम विश्वविद्यालयों के ज़रिए उपलब्ध हैं.

MOOCs आमतौर पर किसी वीडियो की तरह होते हैं जिसमें एक्सपर्ट या कोई प्रोफ़ेसर किसी विषय को आसान टुकड़ों में बांटकर समझाते हैं.

स्कूल-कॉलेजों में होने वाले लेक्चर्स के मुकाबले MOOCs को बार-बार सुना जा सकता है और कई बार इनमें एनिमेशन या ग्राफिक्स भी होते हैं.

कोर्स ख़त्म करने पर बकायदा एक सर्टिफ़िकेट भी मिलता है.

अमोल कहते हैं, "उस कोर्स के दौरान मैंने कई ऐसी बातें सीखीं जो मेरी किताबों में नहीं थीं. मुझे लगा मेरे हाथ खज़ाना लग गया है. एक-एक कर मैंने कई कोर्स डाउनलोड किए. फिर मैंने अपने दोस्तों को इसके बारे में बताया और जल्द ही पैन-ड्राइव के ज़रिए ये MOOCs मेरे स्कूल और दोस्तों के बीच फैल गए."

MOOCs से परिचित भारत

लैपटॉप पर पढ़ाई करती लड़की

दुनिया की सबसे तकनीक संपन्न एमआईटी यूनिवर्सिटी के एक कमरे में बैठे अमोल ये बताते हुए अपनी हंसी नहीं रोक पाते कि जबलपुर में 256kbps की धीमी इंटरनेट स्पीड पर वीडियो डाउनलोडिंग के लिए उनका कंप्यूटर कैसे दिन-रात चलता था और उनकी मां गुस्साती थीं.

देर से ही सही लेकिन MOOCs अब भारत में एक जाना पहचाना शब्द है.

MOOCs से जुड़ने वालों में अमरीकियों के बाद भारतीय अब दूसरे नंबर पर हैं.

भिलाई के रहने वाले विवेक शांग्री ने चार साल की उम्र में मां को खो दिया, पिता कभी साथ नहीं रहे और 12वीं के बाद रिश्तेदारों ने स्कूल फीस देने से मना कर दिया. पैसे की कमी के चलते विवेक कभी कॉलेज नहीं जा सके.

पूरी हुई इच्छा

विवेक शांगरी

लेकिन स्कूली पढ़ाई के दौरान कंप्यूटर के महारथी बन चुके विवेक को जब MOOCs के बारे में पता लगा तो उन्होंने इसके ज़रिए अपनी ज़िंदगी की सबसे बड़ी कमी को पूरा करने का मन बना लिया.

सालों की मेहनत से अपनी खुद की कंपनी खड़ी कर चुके विवेक कहते हैं, ''जिन्हें आईआईटी-आईआईएम से डिग्रियां पाने का मौका मिला है वो ये कभी नहीं समझ सकते कि इनके बिना ज़िंदगी में कोई मकाम हासिल करना कितना मुश्किल है. मैं कभी इंजीनियर नहीं बन पाया लेकिन MOOCs के ज़रिए आज उन लोगों को अपने यहां नौकरी पर रखने लायक हूं जिनके पास बड़ी से बड़ी डिग्रियां हैं.''

MOOCs को भले ही फ़िलहाल डिग्री या डिप्लोमा जैसी मान्यता न हो लेकिन नौकरियों और पढ़ाई में इनकी जगह बनती जा रही है.

नई दुनिया

साई

आठ घंटे की नौकरी के अलावा हफ्ते में तीन से चार घंटे MOOCs पढ़ने वाले साई कृष्नन मोहन कहते हैं, ''भारत में एक बड़ी समस्या है कि कॉलेज आपको जो सिखाते हैं कंपनियां उसके मुकाबले फील्ड से जुड़े अलग तरह के हुनर चाहती हैं. मुझे अपने एक बॉस के ज़रिए MOOCs का पता चला और इसके बाद ‘स्पेशलाइज़ेशन’ के तौर पर मैंने कुछ कोर्स किए. अब मैं अपनी कंपनी में एक ऐसे प्रोजेक्ट पर काम कर रहा हूं जिसे जानने वाले बहुत कम लोग हैं.’’

ऐडैक्स के ज़रिए MOOCs का भारतीय चेहरा बन चुके <link type="page"><caption> अनंत अग्रवाल </caption><url href="https://en.wikipedia.org/wiki/Anant_Agarwal" platform="highweb"/></link>के मुताबिक ये कोर्स जल्द ही ईंट-पत्थर के संस्थानों और हमउम्र लोगों के साथ बंद कमरों में पढ़ने का रिवाज़ बदल देंगे.

अनंत कहते हैं, ''MOOCs आपको ये सुविधा देते हैं कि आप जो चाहें, जिस विश्वविद्यालय से चाहें, जब चाहें पढ़ सकते हैं. हो सकता है कि दुनिया के अलग-अलग देशों में बैठे, अलग-अलग पेशों से जुड़े लोग एक ही MOOC पढ़ रहे हों. ये पढ़ने-पढ़ाने की एक नई दुनिया है.''

'समस्या का हल नहीं'

कॉलेज की बिल्डिंग देखते छात्र-छात्रा

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तो क्या MOOCs भारत में शिक्षा व्यवस्था की खामियों और ‘रटन-विद्या’ की समस्या का हल सुझा सकते हैं?

दिल्ली विश्वविद्यालय के वरिष्ठ प्रोफ़ेसर अपूर्वानंद का मानना है कि MOOCs पारंपरिक शिक्षा और विश्वविद्यालयों में मिलने वाले माहौल का विकल्प नहीं हो सकते.

वो कहते हैं, ''विकसित देशों में बनने वाले MOOCs को डाकियों के ज़रिए भारत, अफ्रीका जैसे देशों में बांट देने से इन देशों में शिक्षा से जुड़ी समस्याएं हल नहीं हो जाएंगी. इस तरह के

ज्यादातर कोर्स उन्हीं लोगों के काम आ रहे हैं जो स्कूल-कॉलेज की पढ़ाई पूरी कर चुके हैं.''

मिलेंगे अवसर?

कॉलेज कैंपस में छात्र-छात्रा

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साल 2014 में नरेंद्र मोदी सरकार ने ‘स्वयम्’ के बैनर तले कई भारतीय संस्थानों को MOOCs से जोड़ा है.

सरकार का दावा है कि इसके ज़रिए नौजवानों को घर बैठे बेहतर शिक्षा के अवसर मिलेंगे.

देखना ये है कि तकनीक से कटे भारत के गांवों-कस्बों में दबे पांव पहुंच रहे MOOCs अकेले अपने दम पर भारत के नौजवानों के लिए शिक्षा और नौकरियों के कितने अवसर पैदा कर पाते हैं.

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