अफ़सरशाही: 'नया ड्राइवर, गाड़ी पुरानी'

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- Author, ज़ुबैर अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
आज के सरकारी बाबुओं से बातचीत के बाद एक पुराने गाने की एक पंक्ति याद आती है, "गाड़ी का ये मॉडल पुराना लगता है"
'बिज़नेस स्टैंडर्ड' अख़बार के <link type="page"><caption> एक ताज़ा लेख</caption><url href="(http://www.business-standard.com/article/opinion/mihir-s-sharma-end-the-ias-115060501417_1.html)" platform="highweb"/></link> के अनुसार देश की ब्यूरोक्रेसी (अफ़सरशाही) उस खटारा गाड़ी की तरह है जिसका नरेंद्र मोदी की शक्ल में ड्राइवर तो नया है लेकिन गाड़ी अब भी पुरानी है.
इस अख़बार का कहना है कि नरेंद्र मोदी कुछ अफसरों की मदद से सरकार चला रहे हैं जो उनकी भूल है. अगर मोदी नाकाम हुए तो बाबुओं के कारण होंगे लेकिन इसके ज़िम्मेदार वो खुद होंगे.
सेवा की दावत

अधिकारियों को लेकर अरविंद केजरीवाल और नजीब जंग के बीच छिड़े युद्ध से पहले दिल्ली के मुख्यमंत्री ने दिल्ली सरकार के अफ़सरों की एक सभा को सम्बोधित किया था. उन्होंने <link type="page"><caption> अफ़सरों को</caption><url href="(http://www.business-standard.com/article/news-ani/bureaucracy-cannot-work-unless-politics-is-fixed-kejriwal-115042100067_1.html)" platform="highweb"/></link> दिल्ली सरकार के साथ मिलकर जनता की सेवा करने की दावत दी थी.
ये 21 अप्रैल की बात है. उस दिन ब्यूरोक्रेसी डे मनाया जाता है. इस अवसर पर केजरीवाल ने अफ़सरों को सरकारी योजनाओं को रचनात्मक तरीके से लागू करने के लिए प्रोत्साहित किया था.
उन्होंने सबसे रचनात्मक प्रोजेक्ट को पुरस्कार देने और इससे जुड़े अफ़सरों को उस योजना का नेतृत्व देने का एलान किया था. लेकिन बहुत कम अफ़सरों ने इसमें भाग लिया
एक वरिष्ठ अधिकारी ने मुझसे तब नाराज़ होकर कहा था कि केजरीवाल उनका मज़ाक उड़ा रहे हैं. उन्होंने केजरीवाल के प्रस्ताव को बकवास कहा और मुझे बताया कि कई अफ़सरों ने इसका बहिष्कार किया.
कुछ नहीं बिगाड़ सकती

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इस अधिकारी का कहना था कि अगर दिल्ली सरकार की जगह कोई निजी कंपनी होती तो इन अफ़सरों की छुट्टी हो जाती लेकिन सरकारें इनका कुछ नहीं बिगाड़ सकती हैं. भारत में बाबुओं के अधिकार तो बहुत हैं लेकिन उनके उत्तरदायित्व ज़ीरो हैं.
मुझे इस वरिष्ठ अधिकारी के बयान से हैरानी नहीं हुई. आज का बाबू यथास्थितिवादी है और वो बदलने को तैयार नहीं हैं.
आज का सरकारी अधिकारी 21 वीं शताब्दी के लायक नहीं है.
वो रचनात्मक तरीके से सोचने की ज़रूरत महसूस नहीं करते. वो अच्छा काम करें या न करें उनका प्रमोशन अपने समय पर हो जाता है. वो स्वयंसेवकों का एक संघ है जिसे लोगों के कल्याण से कोई अधिक लगाव नहीं.
मालिक और नौकर

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लालू प्रसाद यादव ने भारतीय अफ़सरशाही के बारे में एक बार कहा था कि वो अच्छे नौकर हो सकते हैं लेकिन बहुत ख़राब मालिक होते हैं. आम जनता कहती है कि अब तो वो एक अच्छे सेवक भी नहीं रहे. हाँ, वो मालिक ज़रूर बन गए हैं.
लेकिन ग़लती बाबुओं की नहीं प्रणाली की है. कई अधिकारी काफी क़ाबिल होते हैं लेकिन पुराने सिस्टम की वजह से अपनी प्रतिभा नहीं दिखा सकते.
अफ़सरशाही की स्थापना अंग्रेज़ों के ज़माने में सरकार की मदद के लिए की गयी थी. तब ज़माना और था अब हम डिजिटल एज में रहते हैं.
एक वरिष्ठ पत्रकार ने मुझ से कहा कि उससे (बाबू से) तो अपना बैग भी उठाया नहीं जाता वो मोदी सरकार की ई-गवर्नेंस मुहिम का हिस्सा कैसे बन सकता है.
बाबुओं को अपने ख़िलाफ़ आलोचना के बारे में मालूम है. हांगकांग की एक संस्था ने 2102 की अपनी एक रिपोर्ट में भारत की अफ़सरशाही को <link type="page"><caption> एशिया में सबसे बदतर</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/news/world-asia-india-16523672" platform="highweb"/></link> बताया था.
नया ड्राइवर, पुरानी गाड़ी

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इस रिपोर्ट के आने के बाद 2013 में भारतीय अफ़सरों की एक बड़ी बैठक हुई जिसमें उन्होंने अपने गिरेबां में झाँकने का प्रयास किया लेकिन इसके बावजूद कुछ बदलाव नहीं आया.
पिछली सरकारों ने नौकरशाही में थोड़ा बहुत बदलाव लाने की कोशिश की लेकिन ये क़दम बूढ़ी घोड़ी में लाल लगाम की तरह थे.
अब कुछ लोग कहने लगे हैं कि अफ़सरशाही को ख़त्म करो. कुछ दूसरे लोग इसमें नीचे से ऊपर तक सुधार की बात करते हैं.
यानी समय आ गया है कि पुरानी गाड़ी को कबाड़खाने में भेजकर एक नई गाड़ी लाई जाए. इसी से नए ड्राइवर का भला हो सकता है.
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