'तोहफ़ा' जो मौत से पहले अरुणा देकर गई

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- Author, दिव्या आर्य
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
42 साल पहले मुंबई के एक अस्पताल में काम कर रही एक नर्स पर वहीं के एक वार्ड ब्वॉय ने ज़ंजीरों में जकड़ कर यौन हिंसा की. बलात्कार का मामला अदालत में साबित नहीं हुआ और उस वार्ड बॉय को हत्या की कोशिश का दोषी पाते हुए सात साल की सज़ा हुई.

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पर बर्बर हिंसा का शिकार हुईं अरुणा शानबाग के दिमाग में गहरी चोट आई. उनकी आंखों की रौशनी चली गई, सुनाई देना बंद हो गया. धीरे-धीरे बाहरी दुनिया से उनका कोई संपर्क नहीं रहा. वो ‘वेजिटेटिव स्टेट’ में चली गईं और सिर्फ़ दवाओं के ज़रिए ज़िंदा थीं.
सोमवार सुबह अरुणा की उस ज़िंदगी का अंत हो गया. पर इससे पहले, अस्पताल के बिस्तर पर लेटीं अरुणा एक बहुत अहम काम कर गईं.
बीबीसी से बातचीत में अरुणा की जीवनी लिखने वाली पिंकी वीरानी ने कहा, “अरुणा जिसे जीवन में कोई न्याय नहीं मिला, वो जाने से पहले देश को एक बहुत बड़ा तोहफ़ा दे गई हैं – ‘पैसिव यूथेनेशिया’ का क़ानून.”
क्या है ‘पैसिव यूथेनेशिया’?
अरुणा पर हुए हमले के 25 साल बाद, 1998 में उनपर लिखी जीवनी प्रकाशित हुई. पिंकी वीरानी उसके बाद भी उनके साथ लंबे समय तक जुड़ी रहीं.
अरुणा की हालत देख उन्हें लगा कि इससे बेहतर ये है कि अरुणा को मरने की अनुमति दी जाए. साल 2009 में उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में अपील की कि अरुणा की स्थिति को देखते हुए उन्हें ऐसे ज़िंदा नहीं रखा जाना चाहिए.

कोर्ट ने ये अनुमति तो नहीं दी पर ‘पैसिव यूथेनेशिया’ के हक़ में फ़ैसला लिया.
साल 2011 में दिए गए इस फ़ैसले के मुताबिक अगर कोई व्यक्ति अरुणा की तरह ‘वेजिटेटिव स्टेट’ में है या वेंटिलेटर पर है और उनका ख़याल रखने वालों, परिवार वालों और डॉक्टरों को लगता है कि उनकी हालत सुधरने की कोई उम्मीद नहीं है तो वो ‘पैसिव यूथेनेशिया’ की मदद ले सकते हैं.
‘पैसिव यूथेनेशिया’ के तहत मरीज़ को धीरे-धीरे ‘लाइफ़-सपोर्ट’ से हटा दिया जाता है.
किसे मिले ये हक़?
सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के मुताबिक किसी मरीज़ के डॉक्टर और परिवार वाले अगर ‘पैसिव यूथेनेशिया’ का रास्ता अपनाना चाहते हों तो उन्हें हाई कोर्ट में इसकी अर्ज़ी दाख़िल करनी होगी. हाई कोर्ट उनका पक्ष सुनने के बाद इस पर आखिरी फ़ैसला लेगा.
दिसंबर 2014 में स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने संसद को बताया कि क़ानून और न्याय मंत्रालय ने तय किया है कि ‘यूथेनेशिया’ के मामलों में सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले को ही 'गाइडलाइन' माना जाए.
देश भर में लागू होने के बावजूद अरुणा के लिए ‘पैसिव यूथेनेशिया’ का रास्ता बंद ही रहा.
लेखिका पिंकी वीरानी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करते व़क्त खुद को अरुणा का ‘दोस्त’ बताया था. कोर्ट ने कहा कि ‘दोस्त’ की हैसियत से वो अरुणा के लिए ये फ़ैसला नहीं ले सकतीं.

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ये हक़ केईएम अस्पताल को दिया गया. जहां हमले के बाद से अरुणा की देख-रेख की गई. दशकों से चल रहे इलाज के दौरान अरुणा के मां-बाप की मृत्यु हो गई और बाक़ि परिवार वाले उनसे दूर चले गए.
अस्पताल को ही उनका परिवार माना गया और उन्होंने मौत की जगह ज़िंदगी के हक़ में फ़ैसला लिया, फिर वो चाहे जैसी भी थी.
केईएम अस्पताल के डीन अविनाश सुपे ने कहा, “अपने परिवार के लिए कोई मृत्यु मांगे ये सही नहीं है.”
मरने का हक़
अरुणा के केस से देशभर में ‘यूथेनेशिया’ पर बहस छिड़ गई. जो व्यक्ति ‘वेजिटेटिव स्टेट’ में पहुंच जाए, क्या उसे जानते हुए ज़हरीली दवा देकर मौत की ओर ले जाना सही है? और जब मरीज़ ख़ुद ये फैसला करने की हालत में न हो तो इसका हक़ किसे दिया जाए?
सुप्रीम कोर्ट की नई गाइडलाइन आ गईं, अरुणा की मौत हो गई, पर इन सवालों पर बहस अभी जारी है.

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लेखिका पिंकी वीरानी के बाद इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने एक याचिका दायर की है.
भूषण के मुताबिक अगर मरीज़ के बेहतर होने की कोई सूरत न दिखे, वो ‘वेजिटेटिव स्टेट’ में पहुंच जाए तो जानबूझकर ज़हरीली दवा देकर उसे ज़िंदगी के ऊपर मौत चुनने का अधिकार दिया जाए. और इसके लिए मरीज़ को पहले से ही होशो-हवास में एक 'वसीयत' लिख इस फ़ैसले को ज़ाहिर करने का अधिकार दिया जाए.
‘ऐक्टिव यूथेनेशिया’ और ‘पैसिव यूथेनेशिया’ में वही फ़र्क है जो मारने और मर जाने देने में है. भारत का संविधान जीने का हक़ तो देता है पर मौत चुनने का नहीं.
याचिका पर जब सुप्रीम कोर्ट किसी फ़ैसले तक पहुंचेगा तो अरुणा की मौत के बाद ही सही, शायद ज़िंदगी और मौत के इन मुश्किल सवालों के जवाब मिल जाएं.
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