जो मर गए नसबंदी के तानों से...

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जून 1975 में भारत की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने पूरे देश में आपातकाल लागू कर दिया था. उस दौरान चुनाव स्थगित हो गए थे और नागरिक अधिकार ख़त्म.
लेकिन आपातकाल की सबसे ज़्यादा भयावह यादें नसबंदी अभियान से जुड़ी हैं, जिसमें कई लोगों को लालच, धोखे या जबरन नसबंदी करने पर मजबूर किया गया.
बीबीसी के विटनेस कार्यक्रम में दिल्ली के ज़हीर पंसारी ने आपातकाल से जुड़ी अपनी यादें साझा कीं.
काला कानून

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ज़हीर पंसारी कहते हैं, "जामा मस्जिद इलाक़े में हमारी एक दुकान है. मेरे पिता के समय से हम मसाले बेचते हैं. यह सब मेरी आंखों के सामने ही हुआ था."
26 जून, 1975 की रात को आपातकाल की घोषणा कर दी गई.
प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने रेडियो पर अपने संबोधन में कहा, "राष्ट्रपति ने आपातकाल की घोषणा कर दी है. इससे घबराने की ज़रूरत नहीं है. मुझे यकीन है कि आप इस गहरी और बड़ी साज़िश के बारे में जानते ही होंगे."
उस वक़्त ज़हीर 15 साल के थे. शाम होते-होते उन्होंने सुना कि इलाक़े से बहुत से लोगों को पुलिस उठाकर ले गई थी.
वह बताते हैं, "उन्होंने स्थिति का फ़ायदा उठाया और सफ़ाई के नाम पर झुग्गियों को गिराना शुरू कर दिया. झुग्गी बस्तियों को साफ़ करने, नए मकान बनाने, सड़कें बनाने के बजाय उन्होंने झुग्गियों को गिराना शुरू कर दिया."

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"उस समय की सबसे ख़राब बात थी- काला कानून. आबादी नियंत्रित करने के लिए उन्होंने नसबंदी शुरू की. पास ही एक शिविर लगा था जहां लोगों को नसबंदी के लिए लाया जाता था."
"शुरुआत में लोगों को प्रोत्साहित करने के लिए उन्हें ज़मीनें भी दी गईं. लेकिन फिर वह घटते-घटते पांच किलो घी के टिन और एक घड़ी पर आ गया."
ऐसे भी लोग थे जिन्हें नसबंदी करवाने पर ज़मीन देने का वादा तो किया गया था लेकिन मिली नहीं.
ज़हीर कहते हैं, "पहले तो नसबंदी रज़ामंदी से की जानी थी लेकिन बाद में यह क्रूरतापूर्वक की जाने लगी."
शब्बीर की नसबंदी

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जिन लोगों को नसबंदी में ज़्यादतियों के लिए ज़िम्मेदार माना जाता है उनमें से एक इंदिरा गांधी के 29 वर्षीय बेटे संजय गांधी थे. यूथ कॉंग्रेस के ज़रिए उन्होंने इस नसबंदी कार्यक्रम का संचालन किया.
बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा था, "मैंने बैठकों में लोगों से पूछा कि क्या वह किसी ऐसे व्यक्ति को ला सकते हैं जिसकी जबरन नसबंदी की गई हो? तो मुझे बस यही जवाब मिला कि हमने इस बारे में सुना है लेकिन यह यहां नहीं हुआ."
ज़हीर कहते हैं, "उस दौरान करीब 3,50,000 लोगों की नसबंदी की गई थी और उनमें से करीब 60 फ़ीसदी मुसलमान थे."
ज़हीर कहते हैं, "हम देखते थे कि लोग उन्हें चिढ़ाते थे जिनकी नसबंदी हुई थी. हमारी दुकान के सामने शब्बीर रहते थे, जिनकी सेहत अच्छी-ख़ासी थी. उन्हें जबरन एंबुलेंस में डालकर ले गए थे और उनकी नसबंदी कर दी गई थी."

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"जिसके बाद लोग उन्हें चिढ़ाते थे कि शब्बीर की नसबंदी हो गई, नसबंदी हो गई. यकीन मानिए अच्छी-ख़ासी सेहत का वह आदमी अचानक मर गया. वह ऑपरेशन की वजह से नहीं मरे, वह तानों से मर गए."
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