'मौत ज़िंदगी से ज़्यादा बेहतर लगने लगी'

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अब तक भारत में ख़ुदकुशी में नाकामी का मतलब था जेल. क़ानूनन ऐसे लोगों को धारा 309 के तहत एक साल की सज़ा और जुर्माने का प्रावधान था.
मगर अब सरकार का प्रस्ताव है कि इस धारा को हटाया जाए नी अब ख़ुदकुशी की कोशिश को अपराध न माना जाए.
बहुत से लोग ख़ुदकुशी की कोशिश करते हैं, जिसकी वजहें सबके लिए अलग-अलग होती हैं.
बीबीसी इस श्रृंखला के ज़रिए ऐसी कहानी सामने ला रही है, जिसमें एक व्यक्ति के आत्महत्या के फ़ैसले तक पहुंचने की बात है.... और फिर ज़िंदा बच जाने के बाद नई ज़िंदगी को नई नज़रिए से जीने की कहानी भी. पढ़ें पहली कड़ी.
पढ़िए ख़ुदकुशी की कोशिश करने वाले की आपबीती

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साल 2012, अप्रैल की 30 तारीख़. चाँदबाग के अपने कमरे से मैं हड़बड़ी के साथ कॉलेज पहुंचा. मौखिक परीक्षा का आख़िरी दिन था.
गार्ड ने मुझे कॉलेज के गेट पर रोक लिया और बताया कि मैं इम्तिहान नहीं दे सकता क्योंकि मैं कॉलेज प्राचार्य के अगले आदेश तक के लिए सस्पेंड हूं.
मैंने उनसे बहुत मिन्नत की, उनके पैर भी पड़े, पर वो न माने. मैं पुलिस के साथ भी इम्तिहान देने के लिए राज़ी था, इस पर भी हमारे प्राचार्य नहीं माने.
भीड़ जमा हो चुकी थी, लोग बातें कर रहे थे और कुछ लोग हँस रहे थे.
फ़ैसला

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तिल-तिलकर कब और कैसे मैं उस अंतिम फ़ैसले पर आ पहुंचा, जिसका अहसास अब भी मेरी रूह में सिहरन पैदा कर जाता है.
इम्तिहान में न बैठने की सूरत में मुझे फ़ेल क़रार दिया जाता. 'फेल', यह सोचते ही मेरे जिस्म में जैसे ठंडी लहर दौड़ गई..दिल बैठ सा गया.
यह एक अल्फ़ाज़ मेरे पिछले 236 दिनों तक कॉलेज में टिकने के लिए किए गए संघर्षों का सिला होने वाला था.
फ़ेल होने का मतलब था कि सब कुछ खत्म- कम साधनों पर जीने वाले लोगों के लिए एक चूक की गुंजाइश भी नहीं होती.
अल्टीमेटम

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मैंने उन्हें 30 मिनट का समय दिया, मुझे इम्तिहान देने से रोकने के फ़ैसले पर फिर सोचने के लिए...
क्योंकि 31वें मिनट में मैं ख़ुद को आग लगाकर मिटाने वाला था.
उन 30 मिनटों में दिल्ली में गुज़ारी 15 महीने की ज़िंदगी, आँखों के सामने बाइस्कोप के परदे जैसे घूमने लगी.
दिखा तुग़लकाबाद के क़िले में बसी अवैध बस्ती में 400 रुपए के किराए वाला, एस्बेस्टस डला किचननुमा कमरे में जर्नलिज़्म के एंट्रेस और इंटरव्यू की तैयारी करता मैं.
मतभेद

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यमुनापार के भजनपुरा, यमुना विहार में एक अदद छत के लिए भगता-फिरता, लगभग घिसटता और मुसलमान होने की अपनी पहचान छिपाता मैं.
दिल्ली कहीं भगा न दे, इसलिए उसके ख़र्च पूरे करने के वास्ते रात में दिल्ली के फाइव स्टार होटलों में बर्तन साफ़ करता मैं.
मसरूफ़ियत का दिखावा कर दोस्तों के साथ सिनेमा हॉल, कैंटीन और खर्चे की संभावना वाली जगहों से बचता मैं.
याद आया कि कैसे मैं 2008 में घर छोड़कर भाग गया था. वजह थी अब्बा के साथ कुछ वैचारिक मतभेद.
सपने का टूटना

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मेरी बचपन से ख़्वाहिश थी कि मैं कॉलेज में पढ़ूं क्योंकि मेरे ख़ानदान में कोई कॉलेज तक नहीं जा पाया. मैं शिक्षक बनना चाहता था.
बड़ी मेहनत से दिल्ली विश्वविद्यालय में दाखिला पाया. यही वजह थी कि मेरे लिए पढ़ाई जारी रखना और फ़ेल न होना इतना अहम था.
इस सपने के टूटने की आशंका देखते हुए मैं जान देने को भी तैयार था.
सपना टूटने की जड़ केवल इतनी थी कि मैं कॉलेज की कई अनियमिताओं के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाता था और कॉलेज प्रशासन की आंख की किरकरी बनने लगा था.
डर और निराशा

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लेकिन यह मेरे फ़ेल होने का सबब बनेगा, यह कभी ज़हन में नहीं आया था.
डर और निराशा से लगभग रुकती हुई धड़कन, गुस्से से लहकती आँखें और ऐंठते हुए बदन को देखकर आसपास खड़े लोग ठहाके लगा रहे थे.
उनमें कुछ शिक्षक भी थे. मैं तमाशा बन रहा था. दिल ख़ौफ़ से भर गया कि लोग क्या कहेंगे.. कि मुझे परीक्षा में बैठने नहीं दिया गया. मैं क्या जवाब दूंगा..!
मेरी तरफ़ लोगों की उठती सवालिया निग़ाहों का जवाब तलाशना एकाएक मुश्किल हो गया था.
मेरी कहानी

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मौत ज़िंदगी से ज़्यादा बेहतर लगने लगी. इस नज़ारे ने मेरे दिमाग़ को बिलकुल पक्का कर दिया .
मैं दौड़ा और पास के पेट्रोल पंप से पॉकेट में पड़े सारे पैसों का पेट्रोल ख़रीद लाया और कॉलेज के मुख्य द्वार के बाहर अपने ऊपर सारा पेट्रोल डाल लिया.
माचिस जलाने से पहले ही मेरे क्लास के कुछ दोस्तों ने मुझे बचाया न होता, तो आज मेरी कहानी कुछ और होती.
प्रताड़ना

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दूर खड़ी पुलिस भी शायद इसी मौक़े का इंतज़ार कर रही थी, इसलिए उन्होंने तुरंत आकर मुझे दबोच लिया. प्रताड़ना का फिर एक दौर शुरू हुआ.
पुलिस मुझे थाने ले गई, पहले थप्पड़ जड़े और कहा 'अटेंप्ट टु सुसाइड' के आरोप में मुझे सात साल की क़ैद में भेज देंगे.
अंत में उन्होंने मुझे रात एक बजे शाहदरा के एक मेंटल हॉस्पिटल में भेज दिया...
(आत्महत्या के इस क़दम के बाद मेरे साथ क्या हुआ, कैसे मैंने साबित किया मैं पागल नहीं, पढ़िए ज़िंदगी को पटरी पर लाने की मेरी कहानी अगली कड़ी में..)
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