भेदभाव से निपटने के लिए बनाए गए नए यूजीसी नियमों पर इतना विवाद क्यों?

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- Author, राघवेंद्र राव
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
भारत में कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में भेदभाव रोकने के लिए यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन या यूजीसी ने 13 जनवरी 2026 को नए नियम जारी किए. ये नियम इसी विषय पर 2012 में लागू किए गए नियमों की जगह जारी किए गए हैं.
जहां 2012 के नियमों में 'भेदभाव' की बात की गई थी वहीं 2026 में लाए गए संशोधित नियमों में भेदभाव की परिभाषा में 'जाति‑आधारित भेदभाव' को जोड़ा गया है.
नए नियमों के मुताबिक़ "जाति-आधारित भेदभाव" का मतलब सिर्फ़ जाति या जनजाति के आधार पर अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़े वर्गों के सदस्यों के विरुद्ध किया जाने वाला भेदभाव है.
ख़बरों के मुताबिक़ नए नियमों में 2025 के मसौदे में जो झूठी शिकायतों के लिए सज़ा का प्रावधान था, उसे हटा दिया गया है.
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यूजीसी के मुताबिक़ नए नियमों का मक़सद ये है कि उच्च शिक्षा संस्थानों में पढ़ने‑लिखने और काम करने वाले सभी लोग समान अवसरों का लाभ उठा सकें चाहे उनकी जाति, धर्म, लिंग, विकलांगता या सामाजिक‑आर्थिक पृष्ठभूमि कुछ भी हो.
लेकिन नियम लागू होते ही देशभर में इनके ख़िलाफ़ विरोध और बहस शुरू हो गई.
केंद्र सरकार ने भरोसा दिलाया है कि यूजीसी के नए दिशा-निर्देश कैंपस में जाति आधारित भेदभाव को रोकने के लिए बनाए गए हैं और उनका ग़लत इस्तेमाल नहीं होने दिया जाएगा.
शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान कह चुके हैं कि भेदभाव के नाम पर क़ानून का कोई दुरुपयोग न हो, ये केन्द्र, राज्य सरकारों और यूजीसी, सभी की जिम्मेदारी है. उन्होंने ये भी कहा कि यह मामला सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में है और सभी कदम संविधान के दायरे में रहकर ही उठाए जाएंगे.
इस मसले पर उठे विवाद की वजह समझने से पहले एक नज़र डालते हैं नए नियमों पर.
नए नियमों में क्या है?
नए नियमों के तहत हर विश्वविद्यालय और कॉलेज को समान अवसर केंद्र या इक्वल ऑपर्च्युनिटी सेंटर स्थापित करना होगा.
इस केंद्र का काम वंचित समुदायों के हितों से जुड़ी योजनाओं पर नज़र रखना, छात्रों और कर्मचारियों को पढ़ाई, सामाजिक मामलों और पैसों से जुड़ी सलाह देना, परिसर में विविधता और सबको साथ लेकर चलने का माहौल बढ़ाना और ज़रूरत पड़ने पर ज़िला और राज्य की कानूनी सेवा संस्थाओं की मदद से कानूनी सहायता उपलब्ध कराना होगा.
इस केंद्र के तहत एक समता समिति बनाई जाएगी, जिसकी अध्यक्षता संस्थान के प्रमुख करेंगे. इस समिति में वरिष्ठ शिक्षक, सिविल सोसायटी के सदस्य और छात्र शामिल होंगे. यह समिति भेदभाव से जुड़ी शिकायतों की जांच करेगी.
नए नियमों के हिसाब से प्रत्येक संस्थान को एक चौबीसों घंटे उपलब्ध 'समता हेल्पलाइन' चलानी होगी.
अगर किसी छात्र, शिक्षक या कर्मचारी को लगे कि उसके साथ भेदभाव हुआ है तो वह हेल्पलाइन, ऑनलाइन पोर्टल या समान अवसर केंद्र को ईमेल के ज़रिए शिकायत दर्ज कर सकता है. अनुरोध करने पर शिकायतकर्ता की पहचान गोपनीय रखी जाएगी.
इक्विटी स्क्वॉड्स का गठन

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यूजीसी ने निर्देश दिया है कि अलग-अलग कैंपस में निगरानी रखने और भेदभाव को रोकने के लिए सभी उच्च शिक्षा संस्थान 'समता समूह' या 'इक्विटी स्क्वॉड्स' बनाएंगे.
इसके अलावा हर विभाग, हॉस्टल, पुस्तकालय और अन्य इकाइयों में एक 'समता दूत' या 'इक्विटी एम्बेसडर' नियुक्त किया जाएगा, जो समता-संबंधी गतिविधियों को लागू करने और किसी भी उल्लंघन की रिपोर्ट करने के लिए ज़िम्मेदार होगा.
नए नियमों के मुताबिक़ कोई भी भेदभाव-संबंधी सूचना मिलते ही 24 घंटे के भीतर समता समिति की बैठक बुलाई जाएगी.
पंद्रह वर्किंग डेज़ में जांच रिपोर्ट संस्थान प्रमुख को भेजी जाएगी और प्रमुख को सात वर्किंग डेज़ के भीतर ज़रूरी कार्रवाई करनी होगी. अगर मामला दंडनीय अपराध की श्रेणी में आता है, तो पुलिस को तुरंत सूचित किया जाएगा.
समता को बढ़ावा देने के लिए संस्थानों को क्या करना होगा?

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नए नियमों में कहा गया है कि एडमिशन के वक़्त सभी छात्रों को और साथ ही शिक्षक और कर्मचारियों को एक लिखित घोषणा देनी होगी कि वे किसी भी प्रकार के भेदभाव में शामिल नहीं होंगे.
साथ ही हॉस्टल, कक्षाओं और मेंटर समूहों का बंटवारा पूरी तरह पारदर्शी और बिना किसी भेदभाव के किया जाएगा.
कैंपस में जागरूकता अभियान, कार्यशालाएँ और अलग‑अलग कार्यक्रम चलाए जाएँगे, ताकि बराबरी और समता से जुड़ी गतिविधियों को बढ़ावा मिल सके. इसके अलावा, ज़रूरत पड़ने पर पेशेवर काउंसलर भी छात्रों की मदद के लिए उपलब्ध रहेंगे.
इसके अलावा, संस्थानों के लिए यह ज़रूरी होगा कि वे सामाजिक‑आर्थिक रूप से वंचित समूहों के लिए यूजीसी द्वारा बनाए गए दिशा‑निर्देशों को लागू करें. ताकि समावेशिता यानी सबके लिए समान अवसर को और मज़बूत किया जा सके.
नए नियमों में कहा गया है कि अगर कोई उच्च शिक्षा संस्थान इन नियमों का पालन नहीं करता, तो उसे यूजीसी की किसी भी योजना में शामिल होने से रोका जा सकता है.
इसके अलावा उस संस्थान को डिग्री कार्यक्रम चलाने से प्रतिबंधित किया जा सकता है, ओपन और डिस्टेंस लर्निंग और ऑनलाइन कार्यक्रमों से वंचित किया जा सकता है और ज़रूरत पड़ने पर संस्थान को यूजीसी की सूची से भी हटाया जा सकता है.
यूजीसी ने यह भी कहा है कि मामले की गंभीरता के आधार पर और भी सख्त दंड लगाए जा सकते हैं.
विवाद क्यों हुआ?

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नए नियमों में कहा गया है कि हर उच्च शिक्षण संस्थान को छात्रों और वहाँ काम करने वाले लोगों के ख़िलाफ़ भेदभाव खत्म करने के लिए ज़रूरी कदम उठाने होंगे.
साथ ही जाति, समुदाय, धर्म, भाषा, जातीय पहचान, लिंग या विकलांगता के आधार पर किसी के प्रति कोई पक्षपात न करते हुए उनके हितों की रक्षा करनी होगी.
तो फिर विवाद क्यों हुआ?
इस नोटिफ़िकेशन का विरोध करने वालों का तर्क है कि ये सामान्य वर्ग के लोगों के ख़िलाफ़ है, क्योंकि इसमें सामान्य वर्ग के छात्र-छात्राओं के ख़िलाफ़ फ़र्जी आरोप लगाए जा सकते हैं जो उनके लिए मुश्क़िलें पैदा कर सकते हैं.
नए नियमों के तहत बनाई जाने वाली समता समितियों में अनुसूचित जाति, जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, महिलाएं और विकलांगजनों का प्रतिनिधित्व अनिवार्य है लेकिन जनरल कैटेगरी का प्रतिनिधित्व अनिवार्य नहीं है.
साथ ही इक्विटी स्क्वॉड्स को कैंपस में संवेदनशील स्थानों की निगरानी का व्यापक अधिकार दिया गया है. एक बड़ी चिंता ये है कि समता समूह या इक्विटी स्क्वॉड्स जैसी व्यवस्थाएँ कैंपस को लगातार निगरानी वाले माहौल में बदल देंगी.
अंतिम ड्राफ्ट से झूठी शिकायत पर दंड का प्रावधान हटाए जाने के बारे में विरोध करने वालों का तर्क है कि इन नियमों का दुरुपयोग हो सकता है.
इस मसले पर देश के कई इलाक़ों से विरोध प्रदर्शनों की ख़बरें आ रही हैं. कुछ समूहों ने एक फरवरी को भारत बंद का भी ऐलान किया है.
सोशल मीडिया पर #ShameOnUGC जैसे हैशटैग भी ट्रेंड कर रहे हैं. प्रदर्शनकारियों का कहना है कि नए नियम बिना पर्याप्त चर्चा के लागू किए गए.
वहीं दूसरी तरफ समर्थन की आवाजें भी हैं. कुछ विशेषज्ञ और समूह इन नियमों को सही दिशा में कदम मानते हैं. उनके मुताबिक़ पिछले कुछ सालों में कैंपस भेदभाव के मामलों में बढ़ोतरी देखी गई है.
नए नियमों का समर्थन करने वालों का ये भी कहना है कि 2012 के पुराने नियम ठीक से लागू नहीं हो पाए थे और इसलिए अब एक मज़बूत व्यवस्था की ज़रूरत थी.
इसी बीच नए नियमों के ख़िलाफ़ एक जनहित याचिका सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की गई है.
इस याचिका में कहा गया है कि नए नियम "चुनिंदा संरक्षण प्रदान करते हैं, जिससे विभिन्न क्षेत्रों और वर्गों से आने वाले छात्रों का एक बड़ा हिस्सा वंचित रह जाता है".
याचिकाकर्ताओं ने कहा कि वे "अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति और पिछड़े वर्गों के लोगों को संरक्षण देने का विरोध नहीं कर रहे हैं, बल्कि समाज के अन्य वर्गों या दूसरे शब्दों में कहें तो 'सामान्य वर्ग' के साथ भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए और उन्हें अन्याय, अपमान, अमानवीय व्यवहार, अनुचित कठिनाई और उनकी गरिमा और आत्मसम्मान के विरुद्ध कार्रवाई का शिकार नहीं बनाया जाना चाहिए."
'नए नियमों का स्वागत करना चाहिए'
जाने-माने समाजशास्त्री सतीश देशपांडे ने इस विषय पर 'द इंडियन एक्सप्रेस' अख़बार में लिखा, "यूजीसी के नए नियमों का स्वागत करना चाहिए-भले ही उन पर कई तरह से विरोध हो रहा हो और भले ही आगे चलकर उनमें कुछ बदलाव लगभग तय हों."
देशपांडे ने लिखा, "इन नए नियमों का स्वागत इस वजह से नहीं करना चाहिए कि वे क्या करते हैं या क्या नहीं करते, बल्कि इसलिए करना चाहिए कि वे एक महत्वपूर्ण बदलाव की ओर इशारा करते हैं -शायद अनजाने में ही."
अपनी बात जारी रखते हुए देशपांडे लिखते हैं, "2012 के नियमों का 2026 के नए रूप में फिर से आ जाना अपने‑आप में एक बड़ा बदलाव दिखाता है, क्योंकि यह वही सरकार है जो आम तौर पर पहले की सरकार की नीतियों को बदलने में गर्व महसूस करती है, फिर भी वह इस पुराने नियम को दोहरा रही है."
'भेदभाव की परिभाषा को कमज़ोर कर दिया गया'

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इस विवाद पर राजनीतिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव ने कहा है कि नए नियमों में भेदभाव की परिभाषा को कमज़ोर कर दिया गया है.
न्यूज़ एजेंसी पीटीआई से बात करते हुए उन्होंने कहा, "यह कहना कि मौजूदा सरकार ने जाति‑भेदभाव रोकने की कोई पहल की है, हास्यास्पद है, क्योंकि यह सब सुप्रीम कोर्ट के एक मामले की वजह से हो रहा है."
"सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को मजबूर किया और कहा कि पहले वाले नियम सही तो हैं, लेकिन पर्याप्त नहीं हैं. कोर्ट ने साफ़ कहा कि इन्हें और कड़े करना होगा और किस‑किस तरह से करना होगा, यह भी बताया."
योगेंद्र यादव ने कहा, "वर्तमान नियमों ने वही किया है जो सुप्रीम कोर्ट ने करने को कहा था. लेकिन इस प्रक्रिया में सरकार ने वह भी किया है जो सुप्रीम कोर्ट ने नहीं कहा था. यानि सरकार ने भेदभाव की परिभाषा को कमज़ोर कर दिया है."
"उन्होंने भेदभाव, उत्पीड़न और निशाना बनाए जाने जैसी साफ़-साफ़ स्थितियों को हटा दिया है. तो एक तरफ सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर संस्थागत व्यवस्था मज़बूत की गई है, लेकिन दूसरी तरफ उसका मूल सार कमज़ोर कर दिया गया है. असल स्थिति यही है."
'पुनर्विचार करने में कोई हर्ज नहीं'

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एनसीईआरटी के पूर्व चेयरमैन और शिक्षाविद जे एस राजपूत कहते हैं कि जो लोग नए नियमों पर प्रतिक्रिया दे रहे हैं "उनकी बात में कुछ दम तो है क्योंकि ऐसा नहीं है कि मैलिशियस कम्प्लेंट (दुर्भावनापूर्ण शिकायत) नहीं होती है".
राजपूत कहते हैं कि उन्होंने 11 साल भोपाल के रीजनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ एजुकेशन का नेतृत्व किया है और ऐसे कैंपस में माहौल सिर्फ़ जाति से जुड़ा नहीं होता.
वे कहते हैं, "वो (जाति) एक फैक्टर है, लेकिन कभी भाषा पर बात हो जाती है, कभी क्षेत्रीयता पर हो जाती है और उसके लिए इन नियमों में इस बात का कहीं ज़िक्र नहीं है."
वे कहते हैं कि नए नियमों में टेक्निकल चीज़ें हैं लेकिन इस बात पर कुछ नहीं कि सुधारों के लिए कैसे वातावरण तैयार करने में अध्यापकों और हेड ऑफ़ इंस्टीट्यूशन का सहयोग शुरू से लिया जाना चाहिए या हर सेशन के शुरू में कुछ चीजें होनी चाहिए जो इन चीजों से बच्चों को आगाह करे और उनको तैयार करें.
राजपूत कहते हैं, "इस तरह की चीज़ें इसमें नहीं है. कोर्ट ने आदेश दिया कि नियमों को कड़ा कर दीजिये तो उन्होंने कड़ा कर दिया. अगर किसी उच्च शिक्षण संस्था में कोई किसी को तंग करता है तो हमें उसका ख़्याल रखना चाहिए और जो भी संभव हो वो करना चाहिए."
अपनी बात जारी रखते हुए राजपूत कहते हैं, "सनातन पर जो बातें होती हैं, बड़े-बड़े राजनेता कहते हैं, अखबारों में छपती हैं. ऐसी बातें संस्थाओं में हो जाती हैं, कैंपस में हो जाती हैं. अब अगर सनातन पर कोई व्यक्ति इस तरह की बात करता है और उससे उनके इमोशंस भड़कते हैं तो इसको किस श्रेणी में लिया जाएगा."
वे कहते हैं, "मेरा विचार यह है कि नए नियमों पर पुनर्विचार करने में कोई हर्ज नहीं है. यह ड्राफ्ट सुप्रीम कोर्ट ने नहीं देखा है. अगर सुप्रीम कोर्ट में इसको देख लिया जाए तो कोई हर्ज नहीं है."
जे एस राजपूत के मुताबिक़ यूजीसी को जो प्रतिक्रिया मिली है वो भी उसका अध्ययन कर सकते हैं और सुप्रीम कोर्ट में अपनी बात कह सकते हैं.
उनका कहना है, "सुप्रीम कोर्ट इसको देख ले और फ़ैसला ले. ऐसी कोई बात नहीं है कि इन नियमों को इसी वक़्त लागू करना ज़रूरी हो. अगर सुधार हो सकते हैं तो करें, लेकिन इसमें जो रोकथाम-संबंधी उपाय हैं उनका ज़िक्र होना चाहिए था. और दूसरा यह है कि सेंट्रलाइजेशन बहुत ज्यादा मुझे लग रहा है. हमें संस्थानों के प्रमुखों और संस्थानों में कार्यरत शिक्षाविदों पर भरोसा करना चाहिए."
समता समूह या इक्विटी स्क्वॉड्स के बनाये जाने पर जताई जा रही चिंताओं के बारे में राजपूत कहते हैं कि इन समूहों की ज़रूरत नहीं है.
वे कहते हैं, "छात्रों और शिक्षकों के बीच बातचीत बढ़ाने की ज़रूरत है. जो अकादमिक स्टाफ में खाली पद हैं वो भरे जाने चाहिए. पार्ट-टाइम टीचर के सिस्टम ख़त्म होना चाहिए. अध्यापक वह है जो संस्था से जुड़ा हुआ हो, अपना पूरा समय, ऊर्जा उसमें देता हो. तब इन मामलों का खुद ही समाधान हो जाता है."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.















