शहरों से ग़ायब हो जाएंगे ऑटोरिक्शा?

- Author, इमरान क़ुरैशी
- पदनाम, बेंगलुरु से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
उबर प्रकरण के बावजूद भारत के शहरों में टैक्सी का कारोबार बढ़ रहा है. विशेषज्ञों को लगता है कि यह रफ़्तार धीरे-धीरे तिपहिया को शहरों से बाहर कर देगी.
ऐसे में तिपहिया चालकों में इन नई टैक्सियों को लेकर डर है. लेकिन टैक्सी संचालक कंपनियों का कहना है कि तिपहियों के लिए भी बाज़ार मौजूद है.
कुछ टैक्सी एग्रेगेटर कंपनियां तो तिपहियों को भी अपने बेड़े में शामिल कर रही हैं.
पढ़िए पूरी रिपोर्ट

भारत का शहरी परिवहन धीरे-धीरे सर्वव्यापी तिपहिया के बजाय कारों की ओर बढ़ रहा है, क्योंकि कथित उबर बलात्कार प्रकरण के बावजूद एग्रेगेटर कंपनियां विभिन्न शहरों में सभी प्रकार की टैक्सियाँ उपलब्ध करवा रही हैं.
परिवहन विशेषज्ञ प्रोफ़ेसर एम एन श्रीहरि कहते हैं, "हाल के विवाद के बावजूद शहरी परिवहन में टैक्सियां बढ़ती रहेंगी. यह एक स्वाभाविक विकास प्रक्रिया है. उबर जैसी घटनाओं से एक बेहतर व्यवस्था और प्रक्रिया से निपटा जाएगा."
वह कहते हैं, "शहरी विकास मंत्रालय के अनुसार जिस भी शहर की आबादी 50 लाख से ज़्यादा है उसे ऑटोरिक्शा से टैक्सी के इस्तेमाल की ओर बढ़ना चाहिए और एक व्यवस्थित निजी परिवहन व्यवस्था लागू करनी चाहिए."
बलात्कार मामले से पहले इंटरनेट आधारित कंपनियों के बीच प्रतियोगिता ज़्यादा से ज़्यादा वाहनों को जल्दी से जल्दी सड़क पर उतारने की थी.

इमेज स्रोत, BBC World Service
अगर एक टैक्सी ऑपरेटर ने भारत की सबसे सस्ती कार टाटा नैनो को सड़कों पर उतारा तो दूसरी कंपनियों ने भी भारी संख्या में मौजूद तिपहियों (ऑटोरिक्शा) को उपलब्ध करवाना शुरू कर दिया.
प्रोफ़ेसर श्रीहरि कहते हैं, "सवाल असंगठित तिपहियों को ज़्यादा व्यवस्थित सिस्टम से बदलने का है. अंततः मुंबई की तरह तिपहिया उपनगरीय क्षेत्रों में खिसक जाएंगे."
कम भाड़ा
टैक्सियों में बढ़ोतरी की वजह सिर्फ़ तिपहिया चालकों का बर्ताव नहीं, बल्कि इससे ज़्यादा महत्वपूर्ण चीज़- भाड़ा है. इन टैक्सियों का भाड़ा तिपहिया वाहनों से कम रखा गया है.
उदाहरण के लिए बेंगलुरु जैसे शहरों में एक टैक्सी एग्रेगेटर, पहले चार किलोमीटर के लिए 49 रुपए की दर से कार उपलब्ध करवा रहा है. कई बार तो प्रति किलोमीटर 10 रुपए ही लिए जाते हैं, जो तिपहिया के मुक़ाबले तीन रुपए कम है.

इमेज स्रोत, BBC World Service
इससे तिपहिया चालकों और उनकी यूनियनों को झटका लगा है क्योंकि उनका न्यूनतम किराया 1.8 किलोमीटर के लिए 25 रुपए है.
लेकिन ओला कैब्स और टैक्सी फ़ॉर श्योर (टीएफ़एस) जैसे टैक्सी एग्रेगेटर परिवहन विशेषज्ञ की इस राय से इत्तेफ़ाक नहीं रखते.
ओला कैब्स के मार्केटिंग कम्युनिकेशन्स निदेशक, आनंद सुब्रमण्यम कहते हैं, "तिपहिया को बदला नहीं जा सकता. टैक्सी और तिपहिया दोनों साथ-साथ चलेंगे. दरअसल बेंगलुरु में हम तिपहिया चालकों के फ़ायदे के लिए भी एक तकनीक को जांच रहे हैं."
टैक्सी फ़ॉर श्योर के सह-संस्थापक और सीईओ रघुनंदन जी. कहते हैं, "हमें नहीं लगता कि कारें तिपहिया की जगह ले लेंगी. जहां तक भाड़े की बात है, हमने सस्ती दरों में टाटा नैनो भी शुरू की लेकिन भाड़ा समान बना हुआ है."
यूनियंस में डर

लेकिन बेंगलुरु के बाद चेन्नई, हैदराबाद, चंडीगढ़, जालंधर, पुणे और मुंबई जैसे शहरों में भी यह प्रयोग शुरू होने से तिपहिया चालकों और यूनियनों में डर घर गया है.
बेंगलुरू की आदर्श ऑटो यूनियन के अध्यक्ष मंजुनाथ कहते हैं, "इन टैक्सी कंपनियों को विदेशों से पैसा मिल रहा है इसलिए वह तिपहिया से सस्ते किराए पर टैक्सी उपलब्ध करवा सकती हैं. एक बार शुरुआती हैप्पी डेज़ ख़त्म हो जाएं तो वह तिपहिया वाहनों को ख़त्म कर देंगे. सरकार को इसमें दख़ल देना ही होगा."
लेकिन एक अन्य ऑटो चालक गणेश, ओला के तकनीकी बेड़े में शामिल होने के फ़ैसले से ख़ुश हैं.

इमेज स्रोत, BBC World Service
वह कहते हैं, "फ़ायदा यह है कि मैं रोज़ 150-250 रुपये ज़्यादा कमाता हूं. यह इसलिए है क्योंकि मुझे सवारियों के लिए इंतज़ार नहीं करना पड़ता या ढूंढते फिरना नहीं पड़ता."
"जब मैं किसी यात्री को छोड़ देता हूं तो कंपनी मुझे एक किलोमीटर के दायरे में सवारी के बारे में बता देती है. उन्होंने मुझे एक जीपीएस स्मार्टफ़ोन भी दिया है."
स्मार्ट तकनीकी
कारों से मिल रही चुनौती के बाद तिपहिया चालकों की यूनियनें भी इस तकनीक को अपनाने पर विचार कर रही हैं.
स्मार्ट कम्यूटिंग सर्विस प्राइवेट लिमिटेड के सह-संस्थापक हरीश बालासुब्रमणि अय्यर कहते हैं, "हम पटना में ईज़ी ऑटो ऐप का परीक्षण कर रहे हैं. यह ठीक काम कर रहा है. दरअसल, ऑटो चालक अपने और ग्राहक के बीच किसी तीसरे व्यक्ति के आने को लेकर आशंकित हैं."

इमेज स्रोत, BBC World Service
ऑपरेटर टैक्सी के साथ ही ऑटो रिक्शा चालक को भी प्रोत्साहन राशि दे रहे हैं. जितने ज़्यादा चक्कर वह लगाएंगे, उतनी ज़्यादा प्रोत्साहन राशि.
पांच चक्कर के लिए टैक्सी ड्राइवर को 500 रुपए बख़्शीश के रूप में मिलते हैं. लेकिन यात्री को किराए-भाड़े के लिए मोल-तोल करने या ऑटोरिक्शा के मना करने की तकलीफ़ झेलने की ज़रूरत नहीं.
दिल्ली के फ़ोटोग्राफ़र बिद्युतपर्ण चक्रवर्ती कहते हैं, "रेडियो टैक्सी के साथ सबसे अच्छी बात यही है. टैक्सी बुलाने के लिए आपको बस एक ऐप पर क्लिक करना है."
ताज़ा अनुमान के अनुसार यह 5.58 ख़रब रुपए से बड़ा उद्योग है जो भारत में 20-30 फ़ीसदी सालाना की दर से बढ़ रहा है. पिछले साल इस उद्योग में 600 करोड़ रुपए से ज़्य़ादा का निवेश हुआ है.
<bold>(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए <link type="page"><caption> यहां क्लिक करें</caption><url href="https://play.google.com/store/apps/details?id=uk.co.bbc.hindi" platform="highweb"/></link>. आप हमें <link type="page"><caption> फ़ेसबुक</caption><url href="https://www.facebook.com/bbchindi" platform="highweb"/></link> और <link type="page"><caption> ट्विटर</caption><url href="https://twitter.com/BBCHindi" platform="highweb"/></link> पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)</bold>












