मंगलयान के साथ एहसास भी उड़ चले थे

- Author, अनुराग शर्मा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
बचपन से हम सब तारों-सितारों और दूसरे ग्रहों की बात करते हैं, उनके बारे में सोचते हैं. बचपन में जब टीवी पर सूर्यग्रहण को लेकर बहस देखते थे तो अक्सर एक बुज़ुर्ग से वैज्ञानिक बड़ी सरल भाषा में सब समझाते दिखते थे. बड़ा हुआ तो पता चला कि वह प्रोफ़ेसर यशपाल हैं, बहुत मशहूर वैज्ञानिक हैं.
बीबीसी ने जब भारत के <link type="page"><caption> मंगलयान अभियान</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/multimedia/2013/10/131018_top_10_world_mars_mission_an.shtml" platform="highweb"/></link> को लेकर एक विशेष श्रृंखला की योजना बनाई तो <link type="page"><caption> प्रोफ़ेसर यशपाल</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2013/10/131019_yashpal_india_space_programme_mars_mission_an.shtml" platform="highweb"/></link> का नाम उन लोगों में सबसे ऊपर था, जो पाठकों को भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के सफ़र के बारे में बता सकें.
अक्तूबर की एक दोपहर मैं प्रोफ़ेसर यशपाल से मिलने नोएडा में उनके घर गया. मैं काफ़ी हिचकिचा रहा था, वजह थी यह सवाल कि भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम से सीधे तौर पर जुड़ाव न रखने के बावजूद क्या उनका उससे संपर्क बना हुआ है.
<link type="page"><caption> देखें: भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम तस्वीरों में</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/multimedia/2013/11/131101_india_space_programme_journey_an.shtml" platform="highweb"/></link>
मैंने अपना परिचय देने के बाद उनसे अनौपचारिक बात शुरू की और बोलना शुरू कर दिया, लेकिन वह अंग्रेज़ी में बोल रहे थे और मुझे उनसे हिंदी में बात करनी थी.

मैंने जैसे ही पहला सवाल हिंदी में किया उन्होंने कहा, ''अच्छा, हिंदी बोलनी है, बढ़िया है, मज़ा आएगा.''
पत्रकारिता में अब तक कई ऐसे लोगों से पाला पड़ चुका है, जो मूल रूप से हिंदीभाषी होते हुए भी हिंदी में बात करने को तैयार नहीं होते. ऐसे में प्रोफ़ेसर यशपाल का यह रुख़ मेरे लिए सुखद आश्चर्य की तरह था.
शुरुआत में यह तय नहीं था कि हमें कितनी देर बात करनी है. मगर एक बार प्रोफ़ेसर यशपाल ने यादों के अपने ख़ज़ाने से दिलचस्प बातें निकालनी शुरू कीं, तो मैं बस मंत्रमुग्ध रह गया.
विक्रम साराभाई, सतीश धवन, इंदिरा गांधी और सोनिया गांधी तक उनके पास बताने के लिए बहुत कुछ था. मुझे लगा कि वह भारत में विज्ञान के इतिहास के एन्साइक्लोपीडिया की तरह हैं. किस तरह भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम शुरू हुआ, स्पेस ऐप्लीकेशन सेंटर कैसे बना और इंदिरा गांधी के भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम पर क्या विचार थे, आदि-आदि सैकड़ों नई बातें उनके पास बताने के लिए थीं.
प्रोफ़ेसर यशपाल की तबीयत उस दिन ठीक नहीं थी, काफ़ी ज़ुकाम था इसके बावजूद वह 50 मिनट तक धाराप्रवाह बोलते रहे.
उस दिन मुझे अहसास हुआ कि भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम को प्रोफ़ेसर यशपाल जैसे लोगों ने ही खड़ा किया है, जो अपने अच्छे-खासे भविष्य को छोड़कर अंतरिक्ष कार्यक्रम के साथ इसलिए जुड़े ताकि इसके ज़रिए दूरदराज़ के लोगों तक शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी सुविधाएं पहुंच पाएं.
अंतरिक्ष कार्यक्रम की इस बीबीसी सिरीज़ के लिए जब मशहूर <link type="page"><caption> कार्टूनिस्ट प्राण से ख़ास कार्टून</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/11/131105_pran_mars_mission_comics_ar.shtml" platform="highweb"/></link> बनाने के लिए निवेदन किया गया, तो वे भी राज़ी हो गए. प्राण साहब की तबीयत भी ठीक नहीं रहती, लेकिन इस कार्टून सिरीज़ के लिए उनका उत्साह देखने लायक था.
बहुत जल्द उन्होंने अपने मशहूर किरदार साबू के कार्टून बनाकर हमें भेजे, जिन्हें बीबीसी के पाठकों ने काफ़ी पसंद किया.

मगर अंतरिक्ष कार्यक्रम की इस सिरीज़ ने यह अहसास कराया कि बड़े से बड़े विज्ञान अभियान भी तब तक पूरे नहीं हो सकते, जब तक क़ुदरत का सहारा न मिल जाए. भारत ने पहले मंगलयान को अंतरिक्ष में भेजने के लिए 28 अक्तूबर की तारीख़ तय की थी, लेकिन प्रशांत महासागर में तूफ़ान की वजह से भारत का विशेष जहाज़ वहां समय पर नहीं पहुंच पाया, जिसे मंगलयान पर नज़र रखनी थी. इस वजह से मंगलयान के <link type="page"><caption> प्रक्षेपण की तारीख़ आगे खिसकाई</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/10/131019_isro_mars_mission_postponed_an.shtml" platform="highweb"/></link> गई.
इसरो के जिन वैज्ञानिकों से इस अभियान के बारे में हमारी बात हुई थी, वे मंगलयान के प्रक्षेपण तक काफ़ी तनाव में थे लेकिन मंगलयान के सफल प्रक्षेपण के बाद उन सबके चेहरे खिले हुए थे.
टीवी पर उनके चेहरों की मुस्कान देखकर मेरे दिल में भी एक तरह का सुकून था. शायद यही होता है ख़बर को जीना, जिसे मैं महसूस कर पा रहा था.
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