'देश को जोड़ने के लिए था अंतरिक्ष कार्यक्रम'

- Author, प्रोफ़ेसर यशपाल
- पदनाम, वैज्ञानिक और शिक्षाविद्
भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम में हर तरह के लोग शामिल रहे हैं.
जब अंतरिक्ष विभाग में ये चर्चा हो रही थी कि मंगल ग्रह वग़ैरह की बात करें या नहीं तो वहां जो इंजीनियर दोस्त हैं उनका कहना था कि हम तंग आ गए हैं, रोज़-रोज़ वही ट्रांसपॉन्डर, उपग्रह बना कर. कब तक ये करते रहेंगे. ये वो लोग हैं जो नई चीज़ें करते हैं और जिन्हें नई चीज़ें करने में मज़ा आता है.
वो बहुत उत्साही लोग हैं और इंजीनियर जो काम कर सकते हैं वो है धरती की इस हलचल से दूर जाना, कहीं और की यात्रा करना. ऐसे लोग निश्चित तौर पर हैं.
मेरी ख़ास दिलचस्पी अंतरिक्ष में इस वजह से थी कि मैं खगोल विज्ञान में दिलचस्पी रखता था.
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कॉस्मिक किरणों में मेरी बहुत दिलचस्पी थी. मेरी तरह ही कॉस्मिक किरणों में दिलचस्पी रखने वालों में एक व्यक्ति थे विक्रम साराभाई.
'साराभाई का सपना'

वो बड़े सपने देखने वालों में से थे. वो बहुत महान आदमी थे. उन्होंने अहमदाबाद में फ़िज़िकल रिसर्च लैबोरेट्री की स्थापना की.
हम कॉस्मिक किरणों पर बात करते थे. वो हमारी पीढ़ी के उन लोगों में से थे जो देश के लिए नए काम करने में यक़ीन रखते थे.
उन्हें एक चीज़ सूझी कि हम उपग्रह भेजेंगे, क्योंकि हम कॉस्मिक किरणों का अध्ययन करते हैं तो उपकरणों को बलून से बांध कर अंतरिक्ष में भेजते हैं. अंतरिक्ष में जाने पर हम कॉस्मिक किरणों का अध्ययन बेहतर कर सकते हैं.
जब मैं बलून से उपकरणों को भेजता हूं तो वो 1-2 हज़ार फ़ीट तक जा सकते हैं, वातावरण से ऊपर जा सकते हैं और धरती को देख सकते हैं लेकिन अगर मैं अंतरिक्ष में जाऊं तो न सिर्फ़ धरती के बड़े हिस्से को देख सकता हूं बल्कि बाहरी ग्रहों को भी देख सकता हूं.
फिर आप सोचते हैं कि आप बाहर हैं और रेडियो है तो सिग्नल दुनिया के बड़े हिस्से तक पहुंच सकते हैं. लेकिन उपग्रह हो तो धरती के चारों ओर घूमेंगे और उन्हें अगर इक्वेटर पर सही ऊंचाई पर रखा जाए तो ये स्टेशनरी होंगे.
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साराभाई ये समझते थे. हम अक्सर इस के बारे में बात करते थे. उन्होंने मुझसे कहा कि तुम जानते हो कि हम संचार के लिए क्या कर सकते हैं. हम पूरे भारत को एक साथ जोड़ सकते हैं.
'अंतरिक्ष से भारत एक होगा'
ये सोचा नहीं लोगों ने कि भारत को एक करने के लिए अंतरिक्ष में जाना ज़रूरी है. वहां से सिग्नल ब्रॉडकास्ट करेंगे तो सारे भारत में एक साथ पहुंच जाएगा.
फिर जो मेरे जैसे लोग होते हैं वो कहते हैं कि शिक्षा में भी इसका इस्तेमाल हो सकता है क्योंकि शिक्षा वो नहीं है कि लोग आपकी बात सुनते रहें, शिक्षा तो वो भी है कि आप लोगों से बात कर सकें.

शुरू में ही जो बड़ा प्रोजेक्ट था तो साराभाई के मन में आता था कि ऐसा करना चाहिए. सब लोग कहते थे कि कैसे करें, हमारे पास सामान ही नहीं, तो वो कहते थे कि कुछ दोस्त हैं उनके साथ मिल कर करेंगे.
वो अच्छे वैज्ञानिक भी थे और रोमांटिक भी थे. हम लोग बात करते थे कि बड़ा मज़ा आएगा. कृषि के विकास के लिए, लोगों से बात करने के लिए इस्तेमाल कर सकेंगे.
एक बार उनके मन में आया कि अंतरिक्ष कार्यक्रम होना चाहिए. मैं अंदाज़ा लगा रहा हूं कि ऐसा हुआ होगा क्योंकि साराभाई दोस्ताना शख़्सियत के आदमी थे और प्रधानमंत्री से मिले होंगे.
प्रधानमंत्री से उन्होंने कहा कि कितना अच्छा हो अगर हम एक ऐसा एंटीना बना सकें कि पूरे देश से बात कर सकें. और हम देख सकें कि तूफ़ान आने वाला है तो किधर जाएगा. बरसात कितनी होगी, कहां होगी.
इंदिरा जी ने उनसे कहा कि कैसे करोगे. उन्होंने कहा कि एक उपग्रह हुआ तो उसके ज़रिए कभी तो हो सकता है.
नए प्रयोग
इंदिरा जी ने कहा कि किसी के पास है ऐसा सैटेलाइट. साराभाई ने कहा कि नहीं है. वो भी बनाएंगे, हम भी बनाएंगे. वो भी सीखेंगे, हम भी सीखेंगे.
तो बाद में साराभाई ने अपने दोस्तों से जाकर कहा कि छोटा सा प्रोजेक्ट है, श्रीमति गांधी ज़रा मान जाएं तो. दोस्तों ने पूछा क्या है. उन्होंने कहा कि अमरीकी दोस्त हैं जो प्रायोगिक सैटेलाइट बना रहे हैं.
कोशिश कर रहे हैं कि क्या सैटेलाइट से ब्रॉडकास्ट कर सकते हैं, अभी तक किसी ने किया नहीं है. टेलीविज़न सिग्नल ब्रॉडकास्ट कर सकते हैं क्या.

मैं प्रस्ताव दे देता हूं अपने दोस्तों को कि आपके सैटेलाइट में एक ट्रांसपॉन्डर लगाएंगे. ये वो वक़्त था कि साराभाई ने श्रीमति गांधी को उत्साहित कर दिया.
इंदिरा जी ने साराभाई से पूछा कि महंगा तो नहीं है, उन्होंने कहा नहीं 20-30 करोड़ से 50 करोड़ रुपए लगेंगे. इंदिरा जी ने कहा उतना तो हो सकता है.
उस प्रयोग को मंज़ूरी मिली. हमारा नासा से क़रार हुआ. क़रार ये था कि ग्राउंड सिस्टम हम बनाएंगे और टेस्ट करेंगे एक साथ.
बाद में आकलन करेंगे. और प्रोग्राम बनाएंगे, लोगों से बात करेंगे. काम शुरू हुआ ही था कि साराभाई की मौत हो गई. बहुत कम उम्र में वो चल बसे.
सतीश धवन से कहा गया कि वो इसरो का काम संभालें. एक मीटिंग में वो मेरा हाथ पकड़कर बोले कि यार आना इधर.
कॉलेज की इमारत से काम
ये प्रोग्राम करना है तो एप्लीकेशंस भी होना चाहिए. एक एप्लीकेशंस सेंटर भी बनाना पड़ेगा. तुम टीआईएफ़आर से पांच साल की छुट्टी ले लो.
मैंने कहा कि यार मेरा काम बढ़िया चल रहा है. मुझसे कहते हैं कि ऐसा काम फिर कौन करेगा. तुम्हें अहमदाबाद में रहना होगा, तुम अहमदाबाद आ जाओ.
हमने अहमदाबाद में एक कॉलेज की ऊपरी मंजिल में स्पेस एप्लीकेशन सेंटर (सैक) शुरू किया. नासा से बातचीत करने की ज़िम्मेदारी थी, अर्थ स्टेशन, रिसीविंग स्टेशन, लो नॉइज़ एम्पीफ़ायर भी बनाने थे.
एक वक्त ऐसा था कि 800-900 इंजीनियर थे. तीन-चार समाजशास्त्री भी आ गए. उन्हें ये देखना था कि कैसी भाषा का इस्तेमाल करते हैं, क्या करते हैं.

एक क़िस्म के नए विषयों पर बात हुई जिन पर पहले सोच नहीं सकते थे. ज़्यादा वक्त था नहीं, दो-तीन साल में सब शुरू करना था.
बाद में ये कार्यक्रम चला, सफल हुआ. समझ आने लगा कि इसका कुछ फ़ायदा होगा. दुनिया में कहीं भी सैटेलाइट ब्रॉडकास्टिंग नहीं था, अमरीका में भी नहीं था.
लोग कहते थे कि पागल हो क्या ऐसे मुल्क में कर रहे हो. ऐसे लोगों से साराभाई का कहना होता था कि देखिए इसकी ज़रूरत सबसे ज़्यादा हम को है. हमारे दूरदराज़ के इलाक़ों में संपर्क साधने का कोई ज़रिया नहीं है. हम कर पाएं तो उसका कितना फ़ायदा होगा.
'तकनीकी रूप से सफल'
किस तरह से काम हुआ, क्या सीखा उस दौरान उसकी तो कहानी बहुत लंबी है. कार्यक्रम बनाने थे तो तय हुआ कि दूरदर्शन ही बना सकता है.
हमने कहा कि कार्यक्रम तो बनाने हैं क्योंकि हमें दिलचस्पी है. बच्चों के लिए विज्ञान के कार्यक्रम बनाने थे. उन्होंने कहा कि तुम्हें बनाने होंगे ऐसे कार्यक्रम, हमें तो पता नहीं है.
फिर हमने बहुत सारे लोगों से कहा कि एक महीने सिर्फ़ यही लिखो कि क्या कार्यक्रम बनाएंगे. एफ़टीआईआई से आई प्रोड्यूसरों की नई पौध को उत्साहित किया कि ऐसे कार्यक्रम बनाने हैं.
टीआईएफ़आर के वैज्ञानिकों को लेकर दोनों की टीम बनाई. दोस्तों को चिट्ठी लिखकर पूछा कि प्रोग्राम कैसे बनाएं. एमआईटी के प्रोफ़ेसर फ़िलिप मॉरीसन ने मदद की.
अहमदाबाद में स्टूडियो क्या किसी ने टेलीविज़न तक नहीं देखा था. मुंबई में प्रोग्राम बनाने थे.
मैंने बीएमसी की मुख्य शिक्षाधिकारी माधुरी शाह को फ़ोन कर के कहा कि हमें एक कमरा ही दे दो. मैंने उनके साथ काम किया था तो उन्होंने कहा कि यश तुम्हारे लिए सब कर सकते हैं. उसी शाम लोग भेज दिए और प्रोग्राम बनने लगे.
नैस्कॉम के चेयरमैन रहे किरण कार्णिक उस वक्त सैक में थे उन्हें मुंबई भेजा गया. आख़िर जो प्रोग्राम बने वो तकनीकी रूप से बहुत सफल हुए.
ये वो वक्त था जब भारत सरकार ने फ़ैसला किया कि अंतरिक्ष कार्यक्रम होना चाहिए. सैन्य ज़रूरतों के लिए नहीं, सामाजिक ज़रूरतों के लिए.
इस सब के बाद रॉकेट, उपग्रह बने. आज भारत के इंजीनियर सब काम कर लेते हैं. उम्मीद है कि भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम आगे भी सफल होगा.
(बीबीसी संवाददाता अनुराग शर्मा से बातचीत पर आधारित)
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