क्या मोदी ने दी कोडनानी, बजरंगी की कुरबानी?

2002 गुजरात दंगों में दोषी पूर्व मंत्री <link type="page"><caption> माया कोडनानी </caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2012/08/120831_naroda_sentencing_vk.shtml" platform="highweb"/></link>और बाबू बजरंगी को मौत की सज़ा दिए जाने की मांग को लेकर राज्य सरकार अगले 15 दिनों में अदालत में अपील दायर करेगी. इस कदम के पीछे के कारणों पर बहस तेज़ हो गई है.
<link type="page"><caption> माया कोडनानी</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2012/08/120831_maya_kodnani_profile_va.shtml" platform="highweb"/></link> के पति डॉक्टर सुरेंद्र कोडनानी ने इस कदम पर टिप्पणी करने से इंकार कर दिया.
गौरांग व्यास सरकारी वकील हैं. व्यास के मुताबिक जब विशेष अदालत में मामला चल रहा था तो बहस के दौरान भी उन्होंने इन दोनो को मौत की सज़ा दिए जाने की मांग की थी.
वो कहते हैं, “अदालत के अनुसार ये मामला उस श्रेणी में आता है (रेयरेस्ट ऑफ़ रेयर कैटगरी) जिसमें मौत की सज़ा दी जा सकती है लेकिन इन दोनो को मौत की सज़ा नहीं दी गई. इसलिए हमने सरकार से कहा था कि हमें मौत की सज़ा के लिए हाई कोर्ट में अपील दायर करनी चाहिए. गुजरात सरकार के कानून मंत्रालय ने इस बात की मंज़ूरी दे दी.”
<link type="page"><caption> नरोदा पाटिया दंगों</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/multimedia/2012/02/120229_gujarat_naroda_picgallery_pa.shtml" platform="highweb"/></link> के मामले में एक विशेष अदालत ने माया कोडनानी को 28 वर्ष की कैद की सजा सुनाई थी, जबकि बाबू बजरंगी को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी.
वाकया 28 फरवरी 2002 का है जब नरोदा पाटिया इलाके को घेर कर 97 लोगों की हत्या कर दी गई थी.
आरोप है कि भीड़ का नेतृत्व कोडनानी ने किया था और बाबू बजरंगी भी उसमें शामिल थे.
लेकिन गुजरात सरकार के ताज़ा कदम पर जहाँ निलंबित आईपीएस अधिकारी संजीव भट्ट जैसे मोदी विरोधी इसे दोनो को बलि का बकरा बनाया जाना बता रहे है, सरकारी वकीलों के अनुसार ये एक सामान्य प्रक्रिया है.
नरेंद्र मोदी के आलोचक इस ताज़ा कदम को माया कोडनानी और बाबू बजरंगी जैसे उन लोगों से पल्ला झाड़ने की कोशिश से जोड़कर देख रहे हैं जिन्हें 2002 दंगों के लिए ज़िम्मेदार माना जाता है.
गौरतलब है कि नरेंद्र मोदी के आलोचक उन पर 2002 दंगों में हुई हिंसक मौतों के लिए जिम्मेदार ठहराते हैं. और ऐसे वक्त जब नरेंद्र मोदी खुद को भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर प्रस्तुत करने की मुहिम पर हैं, कोडनानी और बाबू बजरंगी को मौत की सज़ा दिए जाने की वकालत करने के कदम पर सवाल उठना लाज़मी है.
कुरबानी
संजीव भट्ट ऐसे ही कुछ सवाल उठाते हैं.
वो कोडनानी और बाबू बजरंगी को नरेंद्र मोदी के सैनिक बताते हैं जिनकी कुरबानी कभी भी दी जा सकती है.
वो कहते हैं, “ये ऐसे लोग हैं जिनका हिंदुत्व या धर्म के नाम पर इस्तेमाल किया गया और जब नेता को लगा कि इसकी आंच उस तक पहुँच सकती है तो उनकी बलि चढ़ा दी गई.”
उधर बीबीसी से बातचीत में ज़किया जाफरी के परिवार ने इस मामले पर टिप्पणी करने से इंकार कर दिया. गुजरात भाजपा प्रवक्ता आईके जडेजा ने भी इसे सरकार से जुड़ा मामला बताकर कुछ भी नहीं कहा.
माया कोडनानी भाजपा से तीन बार की महिला विधायक रह चुकी हैं और नरेंद्र मोदी सरकार में मंत्री थी. माया कोडनानी पहली महिला वर्तमान विधायक थीं जिन्हें गोधरा दंगों के बाद सजा हुई.
अहमदाबाद में टाइम्स ऑफ़ इंडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार अजय उमठ भी इसे एक सामान्य बात बताते हैं.
उनके अनुसार ऐसे मामलों में अभियोजन पक्ष दोषी को दी गई सज़ा को हमेशा बढ़ाने की वकालत करता है और ये ताज़ा कदम इसी को दर्शाता है.
लेकिन गुजरात के इस ताज़ा फैसले से विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) जैसे भाजपा के सहयोगी संगठन और कट्टर हिंदुत्व की वकालत करने वाले लोग भी नाराज़ होंगे.
ओड दंगा मामले में जब 27 लोगों को अदालत ने आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई थी और गुजरात सरकार ने उन्हें मौत की सज़ा दिए जाने के लिए हाईकोर्ट का रुख किया था, उस वक्त भी वीएचपी ने गुजरात सरकार के फैसले का विरोध किया था.
ऐसे ही कई मुद्दों पर नरेंद्र मोदी और वीएचपी के संबंध अच्छे नहीं रहे हैं.












