इंसेफ़्लाइटिस भी चुनावी मैदान मे

- Author, रामदत्त त्रिपाठी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, गोरखपुर से
चुनाव के इस मौसम में जहाँ राजनीतिक दल और उम्मीदवार अपने अपने लिए प्रचार कर रहें हैं, गोरखपुर के एक डाक्टर आर एन सिंह इंसेफ्लाइटिस अथवा दिमागी बुखार की बीमारी को चुनावी मुद्दा बनाने में लगे हैं.
डा.आर एन सिंह ने इंसेफ्लाइटिस उन्मूलन अभियान पर केन्द्रित एक पर्चा छपाया है जिसका शीर्षक है, “इंसेफ्लाइटिस बनेगा 2012 का चुनावी मुद्दा.”
गोरखपुर और बस्ती मंडल के सात जिले पिछले तैंतीस वर्षों से इंसेफ़्साइटिस यानी दिमागी बुखार के क़हर से पीड़ित हैं. इस दरम्यान क़रीब 40 हज़ार बच्चे इस बीमारी से पीड़ित हुए.
वर्ष 2004 में इस महामारी से करीब डेढ़ हज़ार बच्चे मारे गए थे. इसके बाद केंद्र सरकार ने गाँवों में इलाज की सुविधा बढ़ाने के लिए हज़ारों करोड़ रूपए की लागत से ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन कार्यक्रम चालू किया. लेकिन उत्तर प्रदेश में यह धन भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गया और प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों की हालत नहीं सुधरी.
इसी साल अकेले गोरखपुर मेडिकल कालेज में दिमागी बुखार से पीड़ित लगभग साढ़े तीन हज़ार बच्चे भर्ती हुए. इनमें से क़रीब साढ़े छह सौ मारे गए और इससे ज़्यादा स्थायी रूप से विकलांग हो गए.
डाक्टर आर एन सिंह कहते हैं, “इंसेफ्लाइटिस की बीमारी पूर्वांचल का यमराज है, जिससे हर साल वास्तव में दो ढ़ाई हज़ार लोग मरते हैं.”
उनका कहना है कि, ‘भ्रष्टाचार, पलायन, बेरोज़गारी आड़े सभी मुद्दे इसके पीछे हैं, क्योंकि यह आदमी के वजूद का सवाल है. इसलिए इसे हर हाल में चुनावी मुद्दा बनाना है.”
मासूमों को बचाने की जंग
डॉक्टर आर एन सिंह अपने पर्चे में मतदाताओं से कह रहें हैं कि अब जबकि चुनाव के मौके पर नेताओं की नकेल उनके हाथों में है, यही समय है कि मतदाता जागें और पूर्वांचल के मासूमों को बचाने की जंग में दो कदम साथ चलें.
इस अभियान के तहत सभी दलों के उम्मीदवारों से यह सवाल पूछे जा रहें हैं कि क्या उन्होंने और उनके दल ने इस बीमारी के खात्मे के लिए कोई संघर्ष किया? और क्या वह चुने जाने के बाद इस सम्बन्ध में कोई सक्रिय कदम उठाएंगे?
डाक्टर सिंह कहते हैं कि कुछ लोग उम्मीदवारों से सवाल पूछ रहें हैं, मगर अभियान को उतनी सफलता नही मिल रही, जितनी मिलनी चाहिए. इसके लिए वह आम आदमी को दोष देते हैं.

उनका कहना है, “इस बीमारी के लिए बहुत हद तक यहाँ की जनता भी जिम्मेदार है, क्योंकि यही बीमारी अगर हरियाणा या पश्चिम बंगाल में होती तो वहां के लोगों ने नेताओं और अधिकारियों के बाल नोच लिए होते.”
डा. आर एन सिंह के निराश होने का कारण शायद यह है कि वोट देते समय बहुत से लोग अपने जनप्रतिनिधि और सरकार का कामकाज परखने के बाद जाति या धर्म की निकटता के आधार पर मतदान करते हैं. लेकिन वोटरों का एक तबका ऐसा भी है जो इस तरह से जाति या दलीय प्रतिबद्धता से ऊपर उठकर सोचते हैं. इनके लिए भ्रष्टाचार और कुप्रशासन उम्मीदवार के चुनाव का बड़ा पैमाना होता है.
दरअसल इंसेफ्लाइटिस की महामारी भी एक प्रकार से पूर्वांचल की ग़रीबी, कुपोषण और कुप्रशासन का परिणाम है. इसलिए जागरूक मतदाताओं के लिए सरकार के मूल्यांकन की यह भी एक कसौटी है.












