शोमैन एनटी रामाराव की सियासी जड़ें जब दामाद चंद्रबाबू नायडू ने बड़ी सफ़ाई से काटीं

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- Author, रेहान फ़ज़ल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
एनटीआर की आदतें थोड़ी अजीब-सी थीं. दुनिया के उठने से तीन घंटे पहले वो अपना बिस्तर छोड़ देते थे और सूरज उगने से पहले भरपेट भोजन कर लेते थे.
उनकी पत्नी ने उनसे अपनी घड़ी मिला रखी थी, वो ताउम्र उनके आराम का ध्यान रखने के लिए उनसे पहले उठा करती थीं. ये सिलसिला तब तक चला जब तक सन 1984 में कैंसर से उनकी मौत नहीं हो गई.
एनटीआर एकाकी शख़्स थे उनके निजी दोस्त बहुत कम थे. उनसे मिलने वालों में अधिक्तर प्रोड्यूसर, निर्देशक, वितरक और फ़िल्म लेखक हुआ करते थे जिनसे उनके सिर्फ़ व्यवसायिक संबंध ही हुआ करते थे.
उनके सात बेटे और चार बेटियाँ थीं लेकिन वो उनके साथ शायद ही कभी वक़्त बिताते थे.
उनके बेटे बालकृष्ण ने एक बार बताया था, "एक बार जब मैं अपने पिता से मिलने एक फ़िल्म के सेट पर गया था तो मैं अपने साथ अपने दोस्तों को भी ले गया था. वहाँ मेरे पिता ने सेट पर मौजूद लोगों से मेरा परिचय अपने सबसे छोटे बेटे के रूप में कराया और कहा कि मैं इंटरमीडिएट में पढ़ रहा हूँ. जबकि ये सही नहीं था. पहला तो ये कि मैं उनका सबसे छोटा बेटा नहीं था और दूसरा मैं तब स्कूल में ही पढ़ रहा था, इंटरमीडिएट में नहीं."
इससे अंदाज़ा मिलता है कि अपने ग्यारह बच्चों में कौन बड़ा और कौन छोटा था या वे किस क्लास में थे, यह बात एनटीआर को ठीक से पता नहीं थी, वे अपनी ही दुनिया में खोए रहते थे.
'द हिंदू' अख़बार के संवाददाता राजेंद्र प्रसाद ने लिखा था, "एक बार एनटीआर अपनी पोती की शादी में शामिल होने सिकंदराबाद आए. हॉल में वो वहाँ अकेले बैठकर प्रेस वालों से बात करते रहे. उनके परिवार के सदस्य उन पर तिरछी नज़र डालते हुए बिना एक शब्द बोले निकल जाते."

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लक्ष्मी पार्वती से बढ़ती नज़दीकियाँ
इस तरह की खाली ज़िंदगी में उनसे आधी उम्र की एक महिला की एंट्री हुई. पहले एक प्रशंसक के रूप में और बाद में एक जीवनीकार के रूप में जो पहले उनकी प्रेमिका बनी, फिर उनकी पत्नी. उसका नाम है- लक्ष्मी पार्वती.
वो उनके पैर छूकर अपनी भक्ति दिखाती है और उनको 'स्वामी' कहकर संबोधित करती है. एनटीआर उसके सामने स्वीकार करते हैं, अपने जीवन के अंतिम चरण में वो एक साथी को मिस करते हैं.
एनटीआर की जीवनी लिखना एक बहाना बन जाता है तो वो दोनों और करीब आते चले जाते हैं.
के चंद्राहास और के लक्ष्मीनारायणा अपनी किताब 'एनटीआर अ बायोग्राफ़ी' में लिखते हैं, "लक्ष्मी पार्वती एनटीआर के साथ शनिवार और रविवार को रहती थीं और सोमवार को अपने घर वापस लौट जाती थीं. एनटीआर ने लक्ष्मी पार्वती के घर पर टेलीफ़ोन लगवा दिया था ताकि वो उनसे फ़ोन पर बात कर सकें. सालों बाद उन्होंने लक्ष्मी को पुराना टेलीफ़ोन बिल दिखाया था जो दो लाख रुपए का था. गर्मियों की छुट्टियों में लक्ष्मी पार्वती पूरे दो महीने एनटीआर के साथ बिताती थीं."

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एनटीआर हुए लकवे के शिकार
जब इस प्रेम संबंध के बारे में पहली बार चर्चा हुई तो एनटीआर ने इसका खंडन नहीं किया. लक्ष्मी पार्वती ने भी स्वीकार किया कि इसने उनकी समस्या हल कर दी लेकिन एनटीआर के परिवार वाले इससे ख़ुश नहीं थे.
उन्होंने लक्ष्मी पार्वती पर एनटीआर का फ़ायदा उठाने का आरोप लगाया. एनटीआर ने सफ़ाई देते हुए कहा, "इस उम्र में यौन संबंध मेरे लिए इतना महत्व नहीं रखते हैं. मुझे इस समय स्नेह और साथ की ज़रूरत है. लक्ष्मी मेरे लिए मात्र एक साथी की तरह है."
उस समय लक्ष्मी पार्वती विवाहित थीं और उनके पति सुब्बा राव को इस बात की शिकायत थी कि उनकी पत्नी किसी दूसरे शख़्स के साथ रह रही हैं. दोनों ने तलाक़ की अर्ज़ी दी. जिस दिन अदालत ने तलाक़ का आदेश पारित किया उसी दिन एनटीआर को लकवा मार गया.
के चंद्रहास और के लक्ष्मीनारायणा लिखते हैं, "एनटीआर को दिल की बीमारी थी, तब भी वो बहुत भारी खाना बड़ी मात्रा में खाते थे. मधुमेह से पीड़ित होने के बावजूद उन्होंने मिठाई खाना बंद नहीं किया था. वो अपनी दवाइयाँ भी नियमित रूप से नहीं लेते थे. लेकिन इसके बावजूद 70 साल की उम्र में भी उनके चेहरे पर झुर्रियाँ नहीं थीं और वो दमकता रहता था. इस बीमारी के दौरान लक्ष्मी पार्वती ने ही एनटीआर की तीमारदारी की थी."

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लक्ष्मी पार्वती से शादी
अमेरिका से इलाज करवा कर लौटने के बाद एनटीआर ने तिरुपति में लक्ष्मी पार्वती के साथ अपनी शादी का ऐलान किया.
मंच से बोलते हुए उन्होंने कहा कि किस तरह एक महिला ने उन्हें मौत के मुँह से बचाया. अगर वो महिला राज़ी हो तो मैं उसके साथ शादी करने के लिए तैयार हूँ. फिर उन्होंने चिल्ला कर लक्ष्मी को मंच पर बुलाया. वो अपने लाखों प्रशंसकों के सामने लक्ष्मी के गले में पवित्र धागा बाँधने के लिए तैयार थे.
सबसे आगे की सीट पर बैठे हुए एनटीआर के दामाद चंद्राबाबू नायडू ताड़ गए कि क्या होने वाला है. उन्होंने तुरंत बिजली कटवा दी. हर जगह अँधेरा छा गया. एनटीआर का भाषण खत्म हो गया और लोगों को पता नहीं चल पाया कि एनटीआर ने लक्ष्मी को वो पवित्र धागा बाँधा या नहीं. एनटीआर इस प्रकरण से बहुत नाराज़ हुए और उनको मनाने के सभी प्रयास असफल हो गए.

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चंद्रबाबू नायडू का विद्रोह
23 अगस्त, 1995 को एनटीआर सत्ता के शिखर पर थे लेकिन आठ दिनों के भीतर सत्ता उनके हाथ से छिन चुकी थी वो पूर्व मुख्यमंत्री बन गए थे. कहा जाता है कि अगर लक्ष्मी पार्वती एनटीआर के जीवन में नहीं भी आई होतीं तब भी चंद्रबाबू नायडू उनको सत्ता से हटाने की अपनी कोशिश पर विराम नहीं लगाते.
हाल में प्रकाशित पुस्तक 'एनटीआर अ पोलिटिकल बॉयोग्राफ़ी' के लेखक रामचंद्र मूर्ति कोंडूभाटला लिखते हैं, "दरअसल, एनटीआर कोई भी सलाह मानने के लिए तैयार नहीं होते थे. वो मनमानी करते थे और निरंकुश थे. अक्सर वो भावनात्मक हो जाते थे और हर बात पर शक करते थे. लक्ष्मी पार्वती का उन्हें एक तरह का जुनून हो गया था. जिस तरह से नायडू ने एनटीआर के ख़िलाफ़ माहौल बनाया वो उनकी रणनीतिक चतुराई का नमूना था. नायडू को अच्छी तरह मालूम था कि उन्हें किसे, किसके खिलाफ़ और कब इस्तेमाल करना है."
चंद्रबाबू नायडू ने अपने साले डॉक्टर दग्गूबती वैंकटेश्वर राव को उप-मुख्यमंत्री पद का लालच देकर अपनी तरफ़ किया जबकि उनको मालूम था कि वो इस वादे को पूरा नहीं कर पाएँगे.

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इस तरह हरिकृष्ण और दग्गूबति दोनों इस मुहिम में उनके साथ होकर एनटीआर का विरोध करने लगे.
जब तक उनका निशाना लक्ष्मी पार्वती थीं एनटीआर ने इस विद्रोह को गंभीरता से नहीं लिया. जब तक उन्हें पता चल पाता कि असली निशाना वो खुद हैं तब तक देर हो चुकी थी.
कोंडुभाटला लिखते हैं, "दरअसल, एनटीआर एक शोमैन थे. उनके पास लोगों को चमत्कृत कर देने वाला करिश्मा था. लेकिन उनको अपने अधिक्तर विधायकों के नाम तक पता नहीं थे. उन्हें साधारण राजनेताओं से बात करना तक पसंद नहीं था, उनकी समस्याएँ दूर करना तो बहुत बड़ी बात होती. दूसरी तरफ, एनटीआर के पीठ पीछे चंद्रबाबू विधायकों को अपनी तरफ़ करने में जी-जान लगा रहे थे. एनटीआर नायडू की महत्वाकांक्षा को पढ़ पाने में पूरी तरह नाकाम रहे."
लक्ष्मी पार्वती दूसरों को भले ही साधारण और स्वार्थी लगें लेकिन एनटीआर के लिए वो ख़ास थीं. पत्नी से बढ़कर वो उनकी बहुमूल्य साथी थीं.

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एनटीआर का इस्तीफ़ा
चंद्रबाबू नायडू ने एनटीआर को मनाने के लिए तीन सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल भेजा जिसमें दो मंत्री अशोक गजपति राजू और देवेंदर गौड शामिल थे. वो उनके सामने चार माँगें लेकर गए थे जिसमें शामिल था आठ विधायकों का निलंबन वापस लेना, लक्ष्मी पार्वती के वफ़ादार आठ मंत्रियों की बर्ख़ास्तगी, सरकारी और पार्टी मामलों से पार्वती को दूर रखना और तेलुगू देशम पार्टी की कार्यकारिणी का पुनर्गठन करना.
एनटीआर ने चारों माँगें मानने से इनकार कर दिया था.
उलटा एनटीआर ने उनसे कहा था, "आप मुझे वो समस्याएँ बताइए जिनका पार्वती की वजह से आपको सामना करना पड़ा है? मैं ये कैसे बर्दाश्त कर सकता हूँ कि मेरी खुद की पत्नी का इस तरह अपमान किया जा रहा हो? आपको इस बात का क्या अधिकार है कि आप मुझे अपनी पत्नी पर नियंत्रण रखने के लिए कहें? आप सब मिलकर भी मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकते. और अगर ज़रूरी हुआ तो मैं पार्टी को भंग करने से भी नहीं हिचकूँगा."

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ये तीनों नेता शांत रहे और बिना कुछ कहे वहाँ से चले आए. नायडू ने अपने पक्ष में 171 विधायक कर लिए थे जो उनके साथ वायसराय होटल में रुके हुए थे. उन्होंने वहीं से राज्यपाल को फ़ैक्स भेजा कि एनटीआर विधानसभा में अपना बहुमत खो चुके हैं. जब एनटीआर को इसका पता चला तो उन्होंने आसमान सिर पर उठा लिया.
उन्होंने विधानसभा को भंग करने के लिए एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा दिया लेकिन वो कामयाब नहीं हुए. राज्यपाल ने उन्हें 30 अगस्त तक बहुमत सिद्ध करने का समय दिया. एनटीआर ने पूर्व राज्यपाल रामलाल का उदाहरण देते हुए 15 सितंबर तक का समय माँगा. राज्यपाल कृष्णकांत ने इस अनुरोध को अस्वीकार करते हुए बहुमत सिद्ध करने का समय एक दिन बढ़ाकर 31 अगस्त कर दिया.
इस बीच एनटीआर बीमार पड़ गए और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा. जब राज्यपाल उन्हें देखने वहाँ गए तो उन्होंने अपना इस्तीफ़ा सौंप दिया. उसी दिन चंद्रबाबू नायडू को तेलुगू देशम विधायक दल का नेता चुन लिया गया. अगले दिन उन्होंने मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली.

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चंद्रबाबू नायडू से मिलने से इनकार
शपथ लेते ही चंद्रबाबू नायडू अपनी पत्नी भुवनेश्वरी और बेटे लोकेश के साथ एनटीआर के निवास स्थान गए. तीनों विज़िटर्स हॉल में करीब एक घंटे तक बैठे रहे. एनटीआर ने न तो उनसे ऊपर अपने कमरे में आने के लिए कहा और न ही वो नीचे उनसे मिलने आए. एनटीआर के सचिव भुजंग राव को आख़िर उनसे कहना पड़ा एनटीआर अस्वस्थ हैं और उनसे मिलने की स्थिति में नहीं हैं.
चंद्रबाबू नायडू ने भुजंग को ही फूलों का गुलदस्ता पकड़ाया और वहाँ से वापस चले आए. ये साफ़ था कि उन दोनों के बीच संबंध हमेशा के लिए ख़राब हो चुके थे.
चंद्रहास और के लक्ष्मीनारायणा लिखते हैं, "एनटीआर के पास उन राजनीतिक सलाहकारों की कमी थी जो उन्हें विधायकों को साथ रखने का तरीका सुझा पाते. इस क्षेत्र में लक्ष्मी पार्वती चंद्रबाबू नायडू से उन्नीस साबित हुईं. मेक्यावली ने कहा था कि आमतौर से लोग तूफ़ान की कल्पना नहीं करते जब समुद्र शांत हो. एनटीआर से यहीं गलती हुई. वो काफ़ी समय तक उदासीन बने रहे और जब उन्हें अपनी गलती का अहसास हुआ तब तक काफ़ी देर हो चुकी थी."
हिंदू अख़बार के संवाददाता राजेंद्र प्रसाद ने लिखा, "इस बात पर अटकलें लगाई जा सकती हैं कि अगर लक्ष्मी पार्वती गृहिणी बन कर ही संतुष्ट हो गईं होतीं और उनकी कोई राजनीतिक महत्वाकांक्षा नहीं होती तो क्या एनटीआर अपनी मृत्यु तक आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री बने रहते और चंद्रबाबू नायडू उनकी सरकार मे महत्वपूर्ण भूमिका निभाते?"

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दामाद को कभी माफ़ नहीं किया
एनटीआर ने अपनी पत्नी के लिए अपना सब कुछ छोड़ दिया. उन्होंने अपने बेटों, बेटियों, पोतों, नातियों तक को छोड़ दिया. आख़िर में सत्ता भी उनके हाथ से चली गई. उनके अपने दामाद ने परिवार वालों की मदद से उन्हें सत्ता से अलग कर दिया.
एनटीआर ने कभी उन्हें माफ़ नहीं किया. सात सितंबर को जब विधानसभा की बैठक शुरू हुई तो एनटीआर को उनका बयान नहीं पढ़ने दिया गया.
विधानसभा अध्यक्ष ने कहा कि वो विश्वास मत हो जाने के बाद ही एनटीआर को बोलने की अनुमति देंगे.
चंद्रबाबू नायडू का 183 तेलुगू देशम विधायकों ने समर्थन किया. एनटीआर के इस्तीफ़ा देने के एक दिन बाद जयप्रकाश नारायण, सीएस राव और उनके साथ काम करने वाले कुछ लोग सुबह तड़के उनसे मिलने पहुंचे.
एनटीआर अपने उठने के निर्धारित समय से पहले ही जाग गए थे. उन्होंने उन्हें अपनी स्टडी में रिसीव किया. उन्होंने उनसे इस तरह बातें की जैसे कुछ हुआ ही न हो. उनसे एनटीआर के आख़िरी शब्द थे, "मैं मुख्यमंत्री के तौर पर तो पैदा नहीं हुआ था. अब इससे क्या फ़र्क पड़ता है कि मैं मुख्यमंत्री रहूं या न रहूँ."

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शवयात्रा में लोग उमड़े
सत्ता से हटने के साढ़े चार महीनों बाद 17 जनवरी, 1996 को दिल का दौरा पड़ने से एनटी रामाराव का निधन हो गया. अंतिम दर्शन के लिए उनके पार्थिव शरीर को लाल बहादुर शास्त्री स्टेडियम में रखा गया.
लक्ष्मी पार्वती उनके पार्थिव शरीर के सिरहाने एक कुर्सी पर बैठ कर उनके चेहरे को छूते हुए रो रही थीं. मंच पर लक्ष्मी पार्वती का समर्थन करने वाले विधायक मौजूद थे. जब एनटीआर के बेटे हरिकृष्ण वहाँ पहुंचे तो उन्होंने लक्ष्मी पार्वती के समर्थकों से चिल्ला कर परिवार के सदस्यों के लिए जगह बनाने के लिए कहा.

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सिर्फ़ लक्ष्मी पार्वती को अकेले वहाँ बैठने की अनुमति दी गई. कोई एनटीआर की पहली पत्नी की तस्वीर ले आया जिसे एनटीआर के पार्थिव शरीर के बग़ल में रख दिया गया. जब पार्वती कुछ समय के लिए टॉयलेट गईं तो उनकी कुर्सी वहाँ से हटा दी गई. आख़िर पुलिस को हस्तक्षेप कर उनकी कुर्सी वहाँ फिर डलवानी पड़ी और हरिकृष्ण के लिए दूसरी कुर्सी मँगवाई गई.
एनटीआर की शवयात्रा में लाखों लोग शामिल हुए. कहा जाता है कि महात्मा गाँधी के बाद शायद इतने लोग किसी व्यक्ति की शवयात्रा में शामिल नहीं हुए थे जो उस समय सत्ता में नहीं था.
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