अमृतपाल सिंह खालिस्तान की मांग और अजनाला हिंसा पर क्या बोले?

अमृतपाल सिंह

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    • Author, अरविंद छाबड़ा
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

वारिस पंजाब दे संगठन के प्रमुख अमृतपाल सिंह ने अपने साथी को छुड़ाने के लिए पिछले दिनों पंजाब के अजनाला में थाने का घेराव किया था.

उस दौरान काफ़ी हंगामा देखने को मिला था.

अमृतपाल सिंह अपने सैकड़ों समर्थकों के साथ थाने पहुँचे थे. इनमें कुछ के पास बंदूकें और तलवारें भी थीं.

अमृतपाल की तुलना अक्सर 1984 के ऑपरेशन ब्लूस्टार में मारे गए जरनैल सिंह भिंडरावाले से की जाती है.

कुछ तो उन्हें भिंडरावाले 2.0 का भी नाम देते हैं.

अमृतपाल सिंह के साथ बीबीसी ने खालिस्तान और अजनाला हिंसा समेत कई मुद्दों पर बात की.

पढ़िए इस बातचीत के प्रमुख अंश:-

क्या आपको भारत के संविधान पर भरोसा है?

ये बात ऐसी नहीं है, जब ब्रिटिश यहाँ थे तो उन्होंने एक संविधान बनाया था. 1947 के बाद उसमें बहुत कम बदलाव हुए हैं. भारत के संविधान में आज भी सेडिशन (राजद्रोह) जैसे क़ानून हैं.

ये मेरी बात नहीं है कि मुझे इस पर भरोसा है. भारत का संविधान तो ये भी नहीं कहता कि सिख अलग रिलीजन (धर्म) है. हालाँकि गुरुबानी कहती है कि न हम हिंदू हैं और न मुसलमान हैं.

हमारा धर्म पूरी तरह इंडिपेंडेंट (स्वतंत्र) है. उसका किसी के भी साथ लेना-देना नहीं है. लेकिन फिर आर्टिकल 125 (बी) में ये लिखते हैं कि सिख जो है, शाखा है, एक बड़े पेड़ की, जिसे हिंदुत्व या सनातन कहा जाता है. हमें इस बात से भी समस्या है.

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मैंने कहीं आपका ये बयान पढ़ा है कि आप अपने आपको इंडियन नहीं मानते?

इंडियन आइडेंटिडी (भारतीय पहचान) ब्रिटिश लोगों की ओर से दिया गया एक 'अंब्रेला टर्म' है, उन्होंने 'रेड इंडियन' भी बोला था, वो तो भेदभावपूर्ण मानते हैं.

भारतीय होना एक पहचान नहीं है, भारतीय कोई भाषा नहीं है, इंडिया की कोई भाषा नहीं है, कोई संस्कृति नहीं है.

अगर आप बोलेंगे की साउथ इंडिया और नॉर्थ इंडिया का कल्चर एक सा है, तो ग़लत होगा. यहाँ खान-पान और भाषा में कोई समानता नहीं है.

मैं ये कहता हूँ कि इंडियन एक 'अंब्रेला टर्म' है, उसके नीचे अगर मेरी पहचान सुरक्षित है तो मैं ख़ुद को इंडियन कहूँगा, मुझे अपनी पहचान तो पंजाबी के तौर पर ही प्रमोट करनी होगी.

वीडियो कैप्शन, खालिस्तान की मांग और अजनाला हिंसा पर क्या बोले वारिस पंजाब दे संगठन के प्रमुख अमृतपाल सिंह

आप 'इंडिपेंडेंट खालिस्तान' की मांग करते हैं, क्यों न आपके ख़िलाफ़ देशद्रोह का केस हो?

देखिए ये सुप्रीम कोर्ट का मैंडेट (आदेश) है कि शांतिपूर्ण तरीक़े से आप खालिस्तान की बात कर सकते हैं.

सेल्फ़ डिर्टमिनेशन (आत्मनिर्णय) लोकतंत्र में बड़ी सम्मानित चीज़ है. कनाडा और दूसरी जगहों पर सेल्फ़ डिटर्मिनेशन के अधिकार लोगों को मिले हैं, जनमत संग्रह हुए हैं, बहुत सी जगह पर. लोकतंत्र में इसे सेलिब्रेट किया जाता है.

मेरे ख़्याल से जिस दौर में हम जी रहे हैं, वहाँ सेपरेशन (अलगाव) की बात करना कोई बुरी बात नहीं है. राजद्रोह जैसे क़ानून कोलोनियल (औपनिवेशिक) क़ानून हैं, उन्हें आज भी अमल में लाना सही नहीं है.

जहाँ तक मुझे लगता है कि सुप्रीम कोर्ट का 2006 का मैंडेट है जिसमें वो कहते हैं कि शांतिपूर्ण तरीक़े से खालिस्तान की बात करना, खालिस्तान की वकालत करना, उसके बारे में लिखना और उसे बाँटना या कॉन्फ्रेंस करना पूरी तरह से क़ानूनी है.

'खालिस्तान ज़िंदाबाद' कहना भी क़ानूनी है. ऐसा करेंगे तो सुप्रीम के मैंडेट को चुनौती देकर क़ानून के जरिए क़ानून को ही चुनौती दी जाएगी.

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यानी आप शांति में विश्वास करते हैं?

यक़ीनन, हर कोई शांति पसंद करता है. हमारे लिए हिंसा कभी भी विकल्प नहीं रही.

लेकिन जिस तरह से अजनाला में किया आपने. आप वहाँ गए. आपके साथ हज़ारों समर्थक थे. तलवारें थीं, बंदूकें थीं. जिस तरह से आप पुलिस स्टेशन में दाखिल हुए, उसे तो शांतिपूर्ण नहीं माना जा सकता?

उसे स्टॉर्मिंग (घुस जाना) नहीं माना जाएगा. आपको बताता हूँ कि मुद्दा क्या है. हमने यहाँ से कहा था कि जहाँ भी आप हमें रोकेंगे, हम अमृत संचार करेंगे, गुरु ग्रंथ साहिब के बिना अमृत संचार नहीं होता,

ये तो सिर्फ़ प्रोपेगैंडा किया जाता है कि धार्मिक मुद्दा है. इनका तो मुद्दा नहीं है.

वहाँ पर जब हम गए, तीन स्तर की बैरिकेडिंग लोगों ने पहले हटा दी थी. आख़िरी बैरिकेडिंग पुलिस स्टेशन के बिल्कुल सामने थी.

हमने कहा था कि पुलिस के साथ हम शांति से बातचीत करना चाहते हैं, तो पहला लाठी चार्ज पुलिस ने शुरू कर दिया. उनको नहीं करना चाहिए था. उसके जवाब में लाठियाँ चली हैं, गन का कोई इस्तेमाल नहीं हुआ. ये लोग जो बोल रहे हैं, गन तो हमारे साथ हमेशा रहती हैं.

लाइसेंस वाले हथियार हैं. वो हमारी सुरक्षा के लिए हैं. हम ड्रग्स के ख़िलाफ़ लड़ रहे हैं.

आप जानते हैं कि उसमें क्या होता है, उसमें हम सरकार से सुरक्षा तो लेंगे नहीं, तो अपनी ख़ुद की सुरक्षा तो करेंगे. बंदूकों का कोई इस्तेमाल नहीं हुआ. लाठियाँ ज़रूर चली हैं. लेकिन पहले लाठियाँ पुलिस की तरफ़ से चली हैं.

वारिस पंजाब दे संगठन के नेता अमृतपाल सिंह के समर्थक अमृतसर के पास अजनाला में उनके (अमृतपाल सिंह के) क़रीबी सहयोगी की रिहाई की मांग को लेकर बैरिकेड्स तोड़कर पुलिस थाने में घुस गए

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इमेज कैप्शन, 'वारिस पंजाब दे' संगठन के नेता अमृतपाल सिंह के समर्थक अमृतसर के पास अजनाला में उनके (अमृतपाल सिंह के) क़रीबी सहयोगी की रिहाई की मांग को लेकर बैरिकेड्स तोड़कर पुलिस थाने में घुस गए

लेकिन आप कोर्ट भी जा सकते थे?

हम कई दिन से बातचीत करने की कोशिश कर रहे थे. कोर्ट की प्रक्रिया ही अपनाई गई बाद में. लेकिन आपको मालूम है कि यहाँ पर सिस्टम ऐसा है कि अगर आप बैठेंगे और कुछ नहीं करेंगे, तो आप प्रोटेस्ट भी नहीं करते.

वैसे तो कृषि क़ानूनों को वापस लेने के लिए कोर्ट की प्रक्रिया भी होती. कोई न कोई याचिका दाखिल कर सकते थे सुप्रीम कोर्ट में.

विरोध प्रदर्शन क्यों होता है. कोर्ट तो हमेशा मौजूद है. लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन के क्या मायने हैं. मायने ये हैं कि आपको अधिकार है विरोध करने का.

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आप लोकतंत्र पर सवाल उठा रहे हैं. आप सिखों की ग़ुलामी की बात करते हैं. आपके ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं हुई. क्या आपके पीछे राजनीतिक समर्थन है?

नहीं ऐसा नहीं है. उन्होंने कहा कि वो वीडियो का सबूत लेंगे और मेरे ख़्याल से वो करेंगे. उसका हम देखेंगे कि क्या करना है. ये पॉलिटिकल बैकिंग का मसला नहीं होता है, मुझे जो समर्थन हासिल है वो मैंने किसी से ख़रीदा नहीं है.

मैं वहाँ अपने आप गया था. लोगों से मैंने अपील की थी और वो एक दिन की कॉल थी और वहाँ हज़ारों की संगत आई, बावजूद इसके उन्होंने सबको रोक दिया, तो जितनी संगत आई, वो 10-20 प्रतिशत थी. बाक़ी को रास्ते में रोक दिया गया.

आप बताएँ जो जन भावना होती है, वो पॉलिटिकल बैकिंग ही होती है एक किस्म की.

पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार

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क्या ऐसा नहीं हो सकता है कि आप राजनीतिक प्रक्रिया अपनाएँ और चुनाव लड़ें, क्या आपको भारत सरकार और पंजाब की सरकार पर भरोसा नहीं है?

हमें नहीं है भरोसा. भारत की चुनावी प्रक्रिया ऐसी स्थिति में चली गई है, जहाँ ये एक फ़िक्स्ड स्ट्रक्चर (तय ढाँचा) है.

अगर आप इसके अंदर जाना चाहते हैं या कामयाबी चाहते हैं, तो आपको समझौता करना होगा. पंजाब में जो मुख्यमंत्री हैं, उनके पास कोई शक्ति नहीं है. केंद्र सरकार का इतना दखल है पंजाब में कि वो कुछ कर नहीं सकते हैं.

पंजाब का पानी है, उस पर कोई फ़ैसला नहीं कर सकते. पंजाब के अधिकारों पर कोई फ़ैसला करने की स्थिति में नहीं होता.

अगर वो करते हैं तो उन्हें चुनौती दी जाती है. तब ये कहना कि मैं चुनाव में जाऊँ और ये करूँ, ये एक बड़ी नाकामी होती है.

वीडियो कैप्शन, पंजाब में बेरोज़गारी की ज़मीनी हक़ीक़त क्या है?

पंजाब में नई सरकार है. आम आदमी पार्टी की सरकार पहली बार चुनकर आई है, सरकार क्यों नहीं कुछ कर रही है?

आपको बताता हूँ कि सरकार चुनकर आई. भगवंत मान की छोड़ी हुई सीट पर वो चुनाव हार गए. खालिस्तानी सांसद ने उन्हें हराया.

आप देखें कि पंजाब में राजनीतिक हालात क्या हैं. जो पार्टी इतना बहुमत लेकर आती है, इसका मतलब ये नहीं है कि लोगों ने इनको समर्थन दिया.

इसका मतलब था कि सारी जो राजनीतिक पार्टियाँ थीं, उन्हें ख़ारिज कर दिया गया.

उनके आप्रासंगकि होने की वजह से इन्हें जगह मिल गई. लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि इनमें क्षमता है.

दो तीन महीने में इनकी ये स्थिति हो गई कि ये अपनी सीट नहीं बचा सके.

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ऐसा क्यों हुआ?

क्योंकि पंजाब में अनरेस्ट (अशांति) है. राजनीतिक अस्थिरता है. युवाओं को पहले आप पाँच साल के लिए एंगेज कर पाते थे. नई पार्टी आती थी. दो तीन साल तो उनका हनीमून पीरियड रहता था.

आख़िर में वो वादे करते थे, अब स्थिति ये है कि अगर आप एक-दो महीने में नतीजे नहीं देते, तो आपको ख़ारिज कर दिया जाएगा.

आज सरकार के ख़िलाफ़ लोगों के मन में इतना ग़ुस्सा है, वो भी तब जब इस सरकार को एक साल नहीं हुआ.

एक साल में जो कुछ हुआ है, चाहे वो सिद्धू मूसेवाला की हत्या हो, या कुछ और. हमें ये सोचना है कि पंजाब में लोगों में जो अनरेस्ट है, उसका कैसे समाधान निकाला जाए.

पंजाब पुलिस की फ़ाइल फ़ोटो

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इमेज कैप्शन, पंजाब पुलिस की फ़ाइल फ़ोटो

आज के माहौल को लेकर लोगों में एक डर है, आपके लिए ये चिंता की बात नहीं है?

मैं तो इसका समाधान निकालने में ही लगा हूँ. समाज में डर का माहौल क्यों बनाया गया. वो तो हिंसा से बनाया गया ना. सरकार की हिंसा ने डर की स्थिति बना दी. नहीं तो आज़ादी की बात करना, संप्रभुता की बात करना, ख़ुद मुख़्तारी की बात करना कहाँ से डर की वजह बनती.

सरकार ने ऐसा माहौल बनाया. पुलिस से लोगों को डर लगने लगा. हमें इसका समाधान करना चाहिए.

आम लोगों में ये बात चल रही है कि पुलिस को मानवाधिकारों की कोई परवाह नहीं है. हमारे सिख जो सज़ा पूरी कर चुके हैं, वो बाहर नहीं आ रहे हैं. नए सिखों को अंदर डाला जा रहा है.

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लोगों में डर है कि कहीं पंजाब दोबारा 1980 के दौर में तो नहीं जा रहा है?

वो कौन लेकर जाएगा? हम अजनाला की ही बात करें, पहले ग़लत एफ़आईआर हुई, पहले दिन भी मैं वहाँ जा सकता था.

हमने सात दिन इंतज़ार किया. जो चीज़ वहाँ जाकर हुई वो पहले भी हो सकती थी, इसका मतलब क्या था, इसका मतलब है कि वो गंभीर ही नहीं हैं.

बातें करने को उनसे करा लें, केंद्र सरकार भी कहती है कि वो सिखों के बहुत हितचिंतक हैं.

पंजाब में कई मोर्चे लगे हुए हैं. मैं तो नहीं लगा रहा हूँ. उसका बुनियादी स्तर पर हल करना चाहिए.

बुनियादी कारण क्या हैं? वो हैं- सिखों को लेकर सरकार की नीतियाँ.

अगर वो इसे नहीं बदलते, तो ये कहाँ जाएगा, ये कहना किसी के नियंत्रण में नहीं है.

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