त्रिपुरा और नगालैंड में बीजेपी की बन रही है सरकार, क्या है इसके राजनीतिक मायने

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- Author, कीर्ति दुबे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
पूर्वोत्तर के तीन राज्यों त्रिपुरा, मेघालय और नगालैंड के चुनावी नतीजे आ गए हैं. इन तीनों ही राज्यों की विधानसभा में 60 सीटें हैं.
त्रिपुरा में बीजेपी और इंडिजिनस पीपल्स फ्रंट ऑफ़ त्रिपुरा ने सरकार बनाने का बहुमत हासिल कर लिया है. ये गठबंधन 33 सीटों पर आगे है.
मेघालय में एनपीपी से अलग होकर सभी 60 सीटों पर चुनाव लड़ने वाली बीजेपी एक बार फिर एनपीपी के साथ गठबंधन कर सरकार बना सकती है. माना जा रहा है कि दोनों दलों के बीच चुनाव बाद गठबंधन को लेकर बातचीत तेज़ हो गई है.
नगालैंड में भी बीजेपी ने नगा पार्टी नेशनलिस्ट डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी के साथ चुनाव लड़ा. यहां बीजेपी ने 12 सीटें जीती हैं. ये बीजेपी के लिए एक नया रिकॉर्ड है. इससे पहले कभी भी बीजेपी यहां दहाई के आंकड़े तक नहीं पहुंच सकी थी.
त्रिपुरा को छोड़ कर बाकी दोनों राज्यों में बीजेपी गठबंधन में छोटे साझेदार की भूमिका में रही है.
इन तीनों राज्यों में से त्रिपुरा के चुनाव पर सबकी नज़र थी क्योंकि इस बार वहां लंबे समय तक एक दूसरे की धुर विरोधी रही कांग्रेस और लेफ़्ट पार्टियां एक साथ गठबंधन में चुनाव लड़ रही थी. लेकिन दोनों महज 14 सीटों पर ही जीत हालिस कर पाईं.
लेफ़्ट के हिस्से 11 सीटें आई हैं जो त्रिपुरा के शाही प्रिंस प्रद्योत मनिके देबबर्मा की पार्टी टिपरा मोर्था से भी कम है. ये पार्टी पहली बार विधानसभा चुनाव लड़ रही है, लेकिन टिपरा मोर्था ने 13 सीटों पर जीत दर्ज की है. कांग्रेस त्रिपुरा में केवल तीन सीटें जीत सकी है.
साल 2018 में बीजेपी ने 36 सीटें जीत कर पहली बार आईपीएफ़टी के साथ गठबंधन में सरकार बनाई थी. इस बार बीजेपी को चार सीटों का नुकसान हुआ है और पार्टी ने 32 सीटें जीती हैं. हालांकि फिर भी बीजेपी के पास बहुमत से अधिक सीटें हैं.
तीनों राज्यों के चुनाव नतीजे जो तस्वीर पेश कर रहे हैं उनमें सबसे रंगीन और जश्न वाली तस्वीर बीजेपी के लिए ही उभरी हैं.
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साल 2023 में मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, कर्नाटक और तेलंगाना में चुनाव होने हैं. साल की शुरुआत पूर्वोत्तर के तीन राज्यों त्रिपुरा, मेघालय और नगालैंड से हुई है. तीनों चुनावों में बीजेपी या तो खुद के दम पर सरकार बना रही है या उस गठंबधन का हिस्सा है जो सरकार बनाने की ओर है.
राष्ट्रीय राजनीति में बीजेपी के लिए कितने अहम ये नतीजे
इस जीत के लिए बीजेपी के क्या मायने हैं?
इस सवाल पर वरिष्ठ पत्रकार राधिका रामासेषन कहती हैं, " ये नतीजे बीजेपी के लिए बेहद संतुष्ट करने वाली ख़बर लेकर आए हैं, त्रिपुरा जीत लिया है, उन्हें दूसरा कार्यकाल मिल रहा है वहां, जहां पांच साल पहले तक लेफ़्ट पार्टियां काफ़ी मज़बूत स्थिति में थीं. नगालैंड में बीजेपी जूनियर पार्टनर है और नगा पार्टी नेशनलिस्ट डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी जैसे मज़बूत क्षेत्रीय दल के साथ उसका गठबंधन है. वहां भी वह सरकार बनाने की तैयारी में हैं. रही बात मेघालय की तो बीती रात ही असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने मेघालय के मुख्यमंत्री कॉनराड संगमा के साथ मुलाकात की है. मेघालय में बीजेपी पार्टियों कांग्रेस से आगे चल रही है जो उसके लिए सबसे ज़्यादा अहम है."
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वो कहती हैं, "कुल मिलाकर पूर्वोत्तर से 21-22 सीटें होती हैं, ये नंबर में तो बहुत ज़्यादा नहीं हैं लेकिन इसकी महत्ता तो है. जैसे नगालैंड का उदाहरण लीजिए वहां लंबे वक़्त तक अलगाववादी अभियान चरम पर था, वहां अलग देश की मांग उठती रहती थी. वो बातें अब इन चुनावों में कोई मुद्दा भी नहीं रहा. त्रिपुरा और असम को छोड़ दीजिए तो लंबे वक़्त तक बाकी पूर्वोत्तर राज्य खुद को अलग-थगल महसूस करते रहे थे, उन्हें लगता था कि दिल्ली में बैठी सरकार उनके साथ सौतेला व्यवहार करती है, लेकिन अब आप देखिए कि उनको मेनस्ट्रीम में लाया जा रहा है. ये चुनाव इस बात को और साफ़ करते हैं."

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पहली हिंदुत्व पार्टी जो पूर्वोत्तर में मज़बूत हुई
बीजेपी ने पूर्वोत्तर के राज्यों के लिए नॉर्थ-ईस्ट डेवलपमेंट अलायंस यानी नेडा का गठन किया है. इसके संयोजक असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा हैं.
साल 2015 में इसका गठन किया गया और इसका मक़सद था कि बीजेपी पूर्वोत्तर राज्यों में उन क्षेत्रीय दलों को एक साथ लाए जो कांग्रेस से खुश नहीं हैं.
2016 में बीजेपी ने 15 साल से चले आ रहे कांग्रेस के शासन को असम में ख़त्म करके अपनी सरकार बनाई.
2018 में 30 साल से काबिज लेफ़्ट सरकार को हटाकर पहली बार बीजेपी ने त्रिपुरा में सरकार बनाई.
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राधिका रामासेषन कहती हैं, " नेडा का गठन बताता है कि बीजेपी के लिए पूर्वोत्तर राज्य कितने अहम रहे हैं. पूर्वोत्तर के राज्यों की आबादी में आदिवासियों की बहुलता है और ईसाई अल्पसंख्यकों की तादाद यहां ज्यादा है, ऐसे में जब इन राज्यों में बीजेपी जीतती है तो उसके लिए इस नैरेटिव को काउंटर करना और आसान हो जाता है कि वह अल्पसंख्यक विरोधी है. इन चुनावों का एक फ़ायदा ये भी है कि बीजेपी ये कह सकती है कि वह अगर अल्पसंख्यक विरोधी होती तो उसे ये जीत ना मिलती. "
'बीजेपी की स्थानीय मुद्दे को भुनाने की कला'
लेकिन बीजेपी की जीत को पूर्वोत्तर के वरिष्ठ पत्रकार सुबीर भौमिक अलग तरह से देखते हैं. वो कहते हैं कि मुझे नहीं लगता कि त्रिपुरा में बीजेपी को जो जीत मिली है उसके पीछे मोदी फ़ैक्टर है बल्कि बीजेपी का स्थानीय मुद्दे को भुना लेने का हुनर उसकी जीत का कारण है.
भौमिक कहते हैं, " त्रिपुरा में शाही प्रिंस ने टिपरा मोर्था पार्टी बनाई और त्रिपुरा जनजाति के लिए अलग राज्य ग्रेटर त्रिपुरालैंड की बात की. इससे जो वहां की 70 फ़ीसदी बांग्ला-भाषी आबादी है उसकी असहजता को बीजेपी ने अपने पक्ष में कर लिया. लेफ़्ट को ये लग रहा था कि बंग्ला-भाषी लोग तो उसके साथ हैं ही इसलिए उन्होंने जनजातीय समुदाय से आने वाले जितेंद्र चौधरी को सीमएम पद का चेहरा बनाया ताकि जनजातीय वोटों को अपने पक्ष में कर सकें लेकिन इस चक्कर में उनके बांग्ला भाषी वोट भी चले गए."
बीजेपी का त्रिपुरा में गठबंधन आईपीएफ़टी के साथ है, जो साल 2018 में त्रिपुरालैंड बनाने की बात किया करती थी लेकिन बीजेपी के साथ गठबंधन के बाद इस पार्टी ने अलग राज्य की मांग छोड़ दी.

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आम तौर पर ये देखा जाता है कि पूर्वोत्तर राज्यों में क्षेत्रीय पार्टियां उनके साथ ही गठबंधन करती हैं जिसके पास दिल्ली में सत्ता होती है.
सुबीर भौमिक दावा करते हैं, " क्षेत्रीय पर्टियों के भीतर भ्रष्टाचार होता है और चुनाव के वक़्त उन्हें अप्रत्यक्ष रूप से ये डर दे दिया जाता है कि उनके खिलाफ़ केस खोले जा सकते हैं. ये दबाव अक्सर दिल्ली में बैठी पार्टियों के पक्ष में काम कर जाता है. बीजेपी का साफ़ तरीका है वो गठबंधन में आने के लिए कहती है, नहीं आएंगे तो वह नेताओं के खिलाफ़ केस खोल देगी. बीजेपी के पास इतना पैसा है कि वह पार्टी के विधायक तोड़ने का दम रखती है तो क्षेत्रीय दलों को सरकार गिरने का डर भी रहता ही है. इसलिए भी गठबंधन होते हैं."
वो कहते हैं, " तीन सीट जीत कर ये लग रहा है कि मेघालय में बीजेपी के गठबंधन की सरकार बन जाएगी लेकिन पांच सीटें जीत कर कांग्रेस कही भी नहीं है. "
वहीं राधिका रामाशेषन इसकी वजह कुछ और मानती हैं.
वो कहती हैं, "पूर्वोत्तर में क्षेत्रीय दल केंद्र में सरकार बनाने वाली पार्टी के साथ जाते हैं क्योंकि इन राज्यों को इफ्रांस्ट्रक्चर की सख़्त ज़रूरत होती है. कर्नाटक या तमिलनाडु और महाराष्ट्र की तरह इन राज्यों के पास आय के सृजन के ज़रिए बहुत नहीं होते इसलिए वो नहीं चाहती कि उन्हें केंद्र से फ़ंड मिलने में परेशानी हो. "

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क्या बीजेपी पूर्वोत्तर में 'कांग्रेस-मुक्त' अभियान की ओर बढ़ रही है?
लेफ़्ट पार्टियां काडर आधारित हैं और पूर्वोत्तर के राज्यों में उनका काडर मज़बूत है लेकिन 2018 के चुनाव में त्रिपुरा में बीजेपी की जीत के पीछे संघ का बड़ा हाथ था.
साल 2018 में त्रिपुरा में लेफ़्ट के किले में सेंध लगाने वालों में से मुख्य किरदार सुनील देवधर का था. आदिवासी इलाकों में आरएसएस की पकड़ लागातार मज़बूत होती रही है.
राधिका रामाशेषन कहती हैं, " इन चुनाव नतीजों से एक बड़ी चीज़ जो साफ़ नज़र आ रही है वो है बीजेपी का दिया या नारा- कांग्रेस मुक्त भारत, जिसे वह हक़ीकत में बदलने के एक क़दम क़रीब आई है. कांग्रेस पूर्वोतर से गायब हो रही है, ये वो इलाका है जो कभी कांग्रेस से हमदर्दी रखने वाला माना जाता था, लेकिन आज यहां कांग्रेस सीन से ही गायब है. "
सुबीर भौमिक कहते हैं, "कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में शामिल हुए हिमंत बिस्वा सरमा बीजेपी के लिए पूर्वोत्तर में मज़बूत ज़मीन तैयार कर चुके हैं. मोदी और अमित शाह से भी ज़्यादा जब हिमंत बिस्वा कहते हैं कि त्रिपुरालैंड नहीं बनेगा तो वहां की जनता इस पर यक़ीन करती है, क्योंकि हिमंत बिस्वा सरमा ही वो नेता हैं जिन्होंने बोडोलैंड की मांग को कुचल कर रख दिया."
कांग्रेस के पास ऐसा कोई बड़ा चेहरा अब पूर्वोत्तर में नहीं है.













