अमृता फडणवीस की सुरक्षा बढ़ने पर क्यों उठाए सवाल?- प्रेस रिव्यू

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महाराष्ट्र गृह विभाग ने राज्य के उप मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की पत्नी अमृता फडणवीस की सुरक्षा को X से बढ़ाकर Y+ कर दिया गया है. इसके अलावा उन्हें ट्रैफ़िक क्लियरंस के लिए एक गाड़ी भी दी गई है.
अंग्रेज़ी अख़बार इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, अमृता फडणवीस के साथ चौबीसों घंटे के लिए एक एस्कॉर्ट व्हीकल और पाँच पुलिसवाले तैनात रहेंगे. ट्रैफ़िक क्लियरंस व्हीकल का काम लगभग एक पायलट कार की तरह ही होता है. यानी ये गाड़ी अमृता फडणवीस के सफर करने के दौरान ट्रैफ़िक हटाएगी.
अखबार ने पुलिस सूत्रों के हवाले से लिखा है कि मुंबई पुलिस के बचाव और सुरक्षा विभाग ने ट्रैफ़िक अथॉरिटीज़ को इस संबंध में ज़रूरी निर्देश दे दिए हैं लेकिन अमृता फडणवीस ने अभी तक ट्रैफ़िक क्लियरंस कार का इस्तेमाल नहीं किया है.
पत्नी का सुरक्षा घेरा बढ़ाए जाने पर सवाल को लेकर देवेंद्र फडणवीस ने इंडियन एक्सप्रेस से कहा, "अमृता फडणवीस ने सुरक्षा बढ़ाने के लिए कोई आवेदन नहीं किया था. उनके ऊपर ख़तरे को भांपते हुए, हाई-पावर कमेटी ने सुरक्षा दी है. ट्रैफ़िक क्लियरंस गाड़ी भी नहीं मांगी गई थी. अमृता ने पुलिस को साफ़-साफ़ कहा था कि उन्हें ट्रैफ़िक क्लियरंस गाड़ी की ज़रूरत नहीं है."
उन्होंने कहा, "मुझे बताया गया है कि इस तरह के ट्रैफ़िक क्लियरंस गाड़ियां पूरे ठाकरे परिवार और बहुत से अन्य लोगों को दी जा चुकी हैं. ये पद से जुड़ा मामला नहीं है बल्कि ख़तरे की आशंका से जुड़ है. इसलिए ऐसे भी लोग हैं जो कि विधायक तक नहीं लेकिन उन्हें Z या Z+ सुरक्षा तक दी गई है."
पुलिस अधिकारियों ने इंडियन एक्सप्रेस से कहा कि ट्रैफ़िक क्लियरंस गाड़ी आमतौर पर सिर्फ़ उन्हें दी जाती है, जो संवैधानिक पदों पर होते हैं.
शिवसेना के एक वरिष्ठ नेता और ठाकरे परिवार के करीबी ने अख़बार से कहा, "रश्मि ठाकरे (उद्धव ठाकरे की पत्नी) और तेजस ठाकरे के पास दो सुरक्षाकर्मी है लेकिन ट्रैफ़िक पुलिस नहीं. आमतौर पर अगर ट्रैफ़िक पुलिस के कर्मी होते हैं तो वो पहले कंट्रोल रूम में फ़ोन कर के ट्रैफ़िक की स्थिति पता करते हैं और उसे तेज़ी से हटाने के लिए भी कहते हैं. लेकिन सीएम या एसपीजी सुरक्षा प्राप्त व्यक्ति के अलावा किसी के लिए भी ट्रैफ़िक को रोका नहीं जा सकता."

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सुरक्षा घेरा कैसे तय होता है?
एक अधिकारी ने नाम ज़ाहिर न करने की शर्त पर अख़बार से कहा, "2 अक्टूबर को एसआईडी यानी राज्य ख़ुफ़िया विभाग कमिश्नर के कार्यालय ने एक नोट जारी किया कि अमृता फडणवीस का सुरक्षा घेरा बढ़ा दिया गया है. उन्होंने राज्य में मौजूद एसआईडी की सभी इकाइयों के प्रमुखों को ये निर्देश भी दिया कि उनके क्षेत्र में अमृता फडणवीस के आने पर उन्हें ट्रैफ़िक क्लियरंस उपलब्ध कराई जाए."
सुरक्षा घेरा बढ़ाने की प्रक्रिया पर बात करते हुए इस अधिकारी ने अख़बार को बताया कि एसआईडी कमिश्नर इस संबंध में 'उच्च समिति' के साथ बैठक करते हैं.
ये समिति ही किसी के सुरक्षा घेरा बढ़ाने या घटाने से जुड़े सुझाव देती है.
ये सुझाव राज्य भर में ख़ुफ़िया विभागों से मिली जानकारी और संबंधित व्यक्ति पर खतरे की आशंका को ध्यान में रखकर दिए जाते हैं.
इन सुझावों को 'समीक्षा समिति' के पास भेजा जाता है, जिसकी अध्यक्षता राज्य से चीफ़ सेक्रेटरी करते हैं और इसके बाद अंतिम फ़ैसला लिया जाता है.
हालाँकि, इस मामले पर चीफ़ सेक्रेटरी मनू कुमार श्रीवास्तव और एसआईडी कमिश्नर आशुतोष डंबरे ने अख़बार के सवालों पर टिप्पणी नहीं की.
हिंदुओं को अल्पसंख्यक का दर्जा देने के लिए केंद्र ने मांगा और समय

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केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि जिन राज्यों में हिंदुओं की संख्या कम है, वहां उन्हें अल्पसंख्यक का दर्जा देने के फैसले में अभी और समय लगेगा. अंग्रेज़ी अख़बार हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, केंद्र सरकार ने शीर्ष न्यायालय को बताया है कि अभी तक केवल 14 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने ही इस मामले पर अपने विचार बताए हैं.
अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में दायर हलफ़नामे में कहा है कि अभी भी 19 राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों में इस मुद्दे पर विभिन्न संबंधित पक्षों से राय-विमर्श जारी है.
ये हलफ़नामा वकील और भारतीय जनता पार्टी के नेता अश्विनी कुमार उपाध्याय की ओर से सुप्रीम कोर्ट में डाली गई जनहित याचिका के जवाब में दायर किया गया है. याचिका में उपाध्याय ने मांग की थी कि अल्पसंख्यक का दर्जा हर राज्य में विभिन्न धर्मों की आबादी के आधार पर दिया जाना चाहिए.
इस मामले पर मंगलवार को जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस एएस ओका की पीठ को सुनवाई करनी थी लेकिन दोनों जजों के एक संवैधानिक पीठ में शामिल होने की वजह से सुनवाई हो नहीं सकी.
हलफ़नामे में मंत्रालय की ओर से कहा गया है, "चूंकि ये मामला संवेदनशील है और इसके दूरगामी परिणाम होंगे, इसलिए ये अदालत सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को और समय देने पर विचार करे."
इससे पहले अगस्त महीने में हुई सुनवाई के दौरान भी केंद्र ने इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट से समय मांहा था. उस समय केंद्र ने कहा था कि राय-विमर्श जारी है और राज्य सरकारों ने अभी तक जवाब नहीं दिया है.
ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार मंत्रालय ने बताया है कि पंजाब, मिज़ोरम, मेघालय, मणिपुर, ओडिशा, उत्तराखंड, नगालैंड, हिमाचल प्रदेश, गुजरात, गोवा, पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा, उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु ने अपने-अपने जवाब केंद्र को सौंप दिए हैं और इसके अलावा लद्दाख, दादरा और नगर हवेली, दमन और दीव, चंडीगढ़ जैसे केंद्र शासित प्रदेशों के जवाब भी सरकार तक पहुँच चुके हैं.
केंद्र ने बाकी बचे 19 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को भी रिमाइंडर भेजा है ताकि वे जल्द से जल्द अपने जवाब दाखिल करें.
अपनी याचिका में अश्विनी उपाध्याय ने सवाल किया था कि शैक्षिक संस्थान स्थापित करने के लिए अल्पसंख्यकों को मिलने वाले अधिकारों का लाभ केवल ईसाई, मुस्लिम, सिख, बौद्ध, पारसी और जैनियों के पास ही क्यों है.
उन्होंने कहा था कि हिंदुओं को भी ऐसे ही अधिकार मिलने चाहिए. उन्होंने बताया कि लद्दाख, मिज़ोरम, लक्ष्द्वीप, जम्मू-कश्मीर, नगालैंड, मेघालाय, अरुणाचल प्रदेश, पंजाब और मणिपुर में हिंदुओं की संख्या कम है.
बॉर्डर से सटे इलाकों में सुरक्षा एजेंसियां कराएंगी हर नागरिक का सर्वे

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देश की सुरक्षा एजेंसियां अंतरराष्ट्रीय सीमा से सटे इलाकों में रहने वाले हर नागरिक का डेटा जुटाने के लिए सर्वे कराएंगी. इसकी शुरुआत राजस्थान से होगी.
हिंदी अख़बार 'दैनिक भास्कर' ने अपनी एक्सक्लूसिव रिपोर्ट में बताया है कि ये सभी जानकारियां केंद्रीय स्तर पर इकट्ठी की जाएंगी. सुरक्षा एजेंसियों ने ये फ़ैसला सैन्य गतिविधियों और ख़ुफ़िया जानकारियां लीक होने की घटनाओं को देखते हुए लिया है.
अख़बार के अनुसार, सुरक्षा एजेंसियों ने साल 2020 में भी ऐसा ही एक सर्वे पश्चिम बंगाल के मुस्लिम बहुल इलाकों में कराया था. हालाँकि, ये छोटे स्तर पर था. अख़बार के अनुसार, सर्वे में उस समय ऐसे कई तथ्य सामने आए थे, जो राष्ट्रीय सुरक्षा के नज़रिए से ख़तरनाक साबित हो सकते हैं.
दैनिक भास्कर के अनुसार, इसलिए अब फ़ैसला लिया गया है कि सीमाई इलाकों में रहने वाले हर नगारिक की प्रोफ़ाइलिंग कराई जाएगी. पश्चिम बंगाल में किए गए सर्वे पर राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया था. तृणमूल कांग्रेस और वामदलों ने तीखी प्रतिक्रिया दी थी. इसे विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक ध्रुवीकरण की चाल भी बताया गया था.
अख़बार के अनुसार, इस तरह के आरोपों से बचने के लिए सरकार ने इस बार सर्वे सीमा से सटे सभी राज्यों में कराने का फैसला किया है. सीमा से 50 या 100 किलोमीटर के दायरे में रहने वाले हर धर्म के लोगों को सर्वे में शामिल किया जाएगा.
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