मूनलाइटिंग क्या है और ये क्यों है भारत की आईटी इंडस्ट्री के लिए ख़तरा

कोडिंग करती महिला

इमेज स्रोत, Getty Images

    • Author, अनंत प्रकाश
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

मूनलाइटिंग करनी चाहिए या नहीं?

ये एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब एक हद तक आपके मासिक वेतन और उम्र पर टिका है.

क्योंकि जहां एक ओर आईटी क्षेत्र के शीर्ष अधिकारी इसे अनैतिक करार दे रहे हैं. वहीं, दूसरी ओर युवाओं के बीच छिपकर मूनलाइटिंग करने के तरीकों की तलाश जारी है.

ये संभवत: पहला मौका है जब भारत की सॉफ़्टवेयर इंडस्ट्री दो भागों में बंटती दिख रही है. और दोनों पक्षों में खींचतान का सिलसिला जारी है.

कीबोर्ड, मूनलाइटिंग
Getty Images
क्या आप जानते हैं?

  • मूनलाइटिंगका अर्थ मौजूदा कंपनी को बताए बिना अपने काम करने के घंटों के बाद दूसरी कंपनियों के लिए काम करके पैसे कमाना है.

कॉर्नेल यूनिवर्सिटी

आईटी कंपनियों ने कड़े कदम उठाते हुए मूनलाइटिंग करने वाले कर्मचारियों को सज़ा देना भी शुरू कर दिया है.

विप्रो ने पिछले दिनों मूनलाइटिंग करने वाले तीन सौ कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया है.

इसके बाद इंफोसिस ने भी अपने कर्मचारियों को निकालने की बात स्वीकार की है.

सलिल पारिख
Getty Images
पिछले 12 महीनों में हमने ऐसे कई कर्मचारियों को निकाला है जो एक साथ दो कंपनियों के लिए काम कर रहे थे और वो भी गोपनीयता की शर्तों का उल्लंघन करते हुए.
सलिल पारेख
सीईओ, इन्फोसिस

मूनलाइट क्यों करते हैं युवा?

इस सवाल का एक आसान जवाब है - पैसा.

इस एक जवाब से उन तमाम सवालों के जवाब मिलते हैं जिनसे इस समय भारत की युवा पीढ़ी जूझ रही है.

ये मुद्दे हैं - नौकरियों की कमी, महंगाई की तुलना में तनख़्वाहें न बढ़ना और भारी अनिश्चितता का दौर.

मैनेज़मेंट कंसल्टिंग फर्म डेलोइट ने अपने सर्वे में पाया है कि भारत में 'मिलेनियल्स' और 'जेनरेशन ज़ी' के क्रमश: तीस और चालीस फीसद से ज़्यादा युवा अपने ख़र्चे पूरे करने के लिए 'साइड जॉब' करने को मजबूर हैं.

साल भर पहले इसी सर्वे में दोनों पीढ़ियों के आधे से ज़्यादा युवाओं ने बताया था कि उनके हमेशा तनाव में रहने की मुख्य वजह नौकरी, निजी आर्थिक हालात, पारिवारिक ज़रूरतें और नौकरी की कम संभावनाएं होती हैं.

महिला
Getty Images
दो साल में नौकरी छोड़ने को तैयार युवा

  • 56%1995 से 2003 के बीच जन्म लेने वाले युवा

  • 26%1983 से 1994 के बीच जन्म लेने वाले युवा

    स्रोत: डेलोइट मिलेनियल्स जेन ज़ी सर्वे 2022

    यही नहीं, साल 2022 के सर्वे में सामने आया है कि युवाओं के नौकरी छोड़ने की सबसे बड़ी वजहों में तनख़्वाह का पर्याप्त न होना है.

    मिलेनियल्स से आशय उन युवाओं से है जिनका जन्म 1983 से 1994 के बीच हुआ है. वहीं, जेनरेशन ज़ी से आशय 1995 से 2003 के बीच जन्म लेने वाले युवाओं से है.

    काम करता हुआ एक शख़्स

    इमेज स्रोत, Getty Images

    क्या बदलती प्राथमिकताएं बड़ी वजह?

    पिछले तीन दशकों से मीडिया और आईटी क्षेत्र में शीर्ष भूमिकाएं निभा रहे एचआर विशेषज्ञ सात्यकी भट्टाचार्य मानते हैं कि इस मुद्दे को सामाजिक और आर्थिक दुनिया में होते बदलावों के नज़रिए से देखने की ज़रूरत है.

    वे कहते हैं, "मूनलाइटिंग में कुछ भी नया नहीं है. कोविड-19 महामारी के दौरान ये ज़्यादा चर्चा में ज़रूर आया है. लेकिन इस मसले को समाज में होते बदलावों के नज़रिए से देखने की ज़रूरत है. सामाजिक मूल्यों में बदलाव आ रहे हैं. अब वो दौर नहीं रहा जब कोई युवा एक कंपनी में नौकरी शुरू करके उससे ही रिटायर होना चाहे. अब युवा वो काम करना चाहते हैं जिसमें उनका दिल लगता है. वे ज़्यादा पैसे कमाने वाले काम करना चाहते हैं.'

    ऑफ़िस में काम करती महिला

    इमेज स्रोत, Getty Images

    वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, महामारी के दौरान कंपनियों के प्रति कर्मचारियों के समर्पण में काफ़ी कमी आई लेकिन इसमें गिरावट पिछले दो दशक से जारी थी.

    इसके साथ ही विवाह और परिवार बढ़ाने जैसे सामाजिक मसलों पर भी आर्थिक समस्याओं का असर देखा जा रहा है.

    अंग्रेजी अख़बार मिंट में प्रकाशित ख़बर के मुताबिक़, मिलेनियल्स पीढ़ी के युवा शादी और परिवार बढ़ाने को लगातार टाल रहे हैं. और इन फ़ैसलों के लिए एक हद तक आर्थिक कारण ज़िम्मेदार हैं.

    विप्रो में प्रोजेक्ट मैनेज़र के रूप में काम करने वाले नवीन बताते हैं, "मूनलाइटिंग कौन करता है, ये इस बात से तय होता है कि उसकी मासिक तनख़्वाह और नौकरी का स्तर क्या है. अगर कोई फ्रैशर है जिसकी शुरुआती तनख़्वाह बहुत कम है और वो दिल्ली, बेंगलुरु जैसे बड़े शहरों के ख़र्चे वहन नहीं कर सकता तो ये लाज़मी है कि वो इधर-उधर से जुगाड़ करेगा.

    इसमें चौंकने वाली कोई बात नहीं है. दिक्कत सिर्फ़ इतनी है कि कभी कभी लोग एक साथ कई नौकरियां करने लगते हैं. कोविड के दौरान लोगों ने साइड जॉब ही नहीं, एक बार में तीन - तीन नौकरियां की हैं."

    पुरुष

    इमेज स्रोत, Getty Images

    तनख़्वाहों में भारी फर्क क्यों?

    मूनलाइटिंग की मदद से युवा हर महीने अपनी तनख़्वाह से दुगना-तिगुना पैसा कमा सकते हैं. ये पैसा उन्हें उस दौर में सुरक्षा का अहसास देता है जब एक झटके में सैकड़ों कर्मचारियों को निकाला जाना आम हो गया है.

    यही नहीं, कोविड - 19 महामारी के दौरान भारी संख्या कर्मचारियों की छंटनी और तनख़्वाहों में भारी कटौती ने युवाओं में असुरक्षा का भाव पैदा किया है.

    बिज़नेस जगत से जुड़ी ख़बरें देने वाली वेबसाइट मनी कंट्रोल के मुताबिक़, महामारी के शुरुआती छह महीनों में आईटी क्षेत्र के लगभग 1.5 लाख कर्मचारियों को नौकरी से निकाला गया था.

    लेकिन सवाल ये उठता है कि क्या कोविड - 19 महामारी से पहले हालात बेहतर थे.

    आईटी क्षेत्र की बात करें तो पिछले कई सालों से आईटी कंपनियों के फ्रैशर्स और शीर्ष अधिकारियों की तनख़्वाहों के वृद्धि दर में ज़मीन आसमान का अंतर देखा गया है.

    सॉफ़्टवेयर डेवलपर
    Getty Images
    आईटी क्षेत्र के वेतन में बढ़त

    (पिछले दस साल)

    • 835%शीर्ष अधिकारियों का वेतन

    • 45%फ्रैशर्स का वेतन

      स्रोत: मनीकंट्रोल रिसर्च, टीम-लीज़ डिजिटल

      नवीन मानते हैं, "ये संभव नहीं है कि कंपनियां पूरी तरह से मूनलाइटिंग को रोक सकें. वे एक स्तर पर कर्मचारियों को घेरने की कोशिश करेंगी तो कर्मचारी दूसरे रास्ते निकाल लेंगे. मूल समस्याओं का हल निकाला जाना ज़रूरी है."

      महिला

      इमेज स्रोत, Getty Images

      कानूनी ढंग से मूनलाइटिंग रुक सकती है?

      लेकिन क्या इन मूल समस्याओं का हल निकाले बग़ैर कानून की मदद से कंपनियां मूनलाइटिंग रोक सकती हैं.

      भारतीय कानूनों में मूनलाइटिंग की कोई स्पष्ट परिभाषा नहीं है. ऐसे में इसे रोकने के लिए भी स्पष्ट कानून नहीं हैं.

      हालांकि, कंपनियां अलग-अलग कानूनों के ज़रिए कर्मचारियों के ख़िलाफ़ कानूनी कदम उठा सकती है.

      उदाहरण के लिए, फैक्ट्रीज़ एक्ट - 1948 के तहत एक नियोक्ता किसी व्यस्क कर्मचारी को एक दिन में दो जगह काम करने की इजाज़त नहीं दे सकता.

      आईटी कंपनियों पर लागू होने वाले शॉप्स एंड स्टैब्लिशमेंट एक्ट के तहत भी एक साथ दो जगह नौकरी करना प्रतिबंधित है.

      लेकिन सात्यिकी भट्टाचार्य मानते हैं कि कानूनी ढंग से इसे रोकना मुश्किल है.

      वे कहते हैं, "अगर कोई कंपनी अदालत जाकर मूनलाइटिंग रुकवाने की गुहार लगाएगी तो उसके लिए ये साबित करना बहुत मुश्किल हो जाएगा कि मूनलाइटिंग उसके हितों के ख़िलाफ़ है."

      काम करते लोग

      इमेज स्रोत, Getty Images

      कंपनियों के रुख में क्यों आई नरमी?

      लेकिन नौकरी छीनने जैसे कड़े कदम उठाने के बाद आईटी कंपनियां अपने रुख में परिवर्तन लाती दिख रही हैं.

      इन्फ़ोसिस के सीईओ सलिल पारेख ने कहा है कि उनकी कंपनी को कर्मचारियों के छोटे-मोटे काम करने से एतराज़ नहीं है, बशर्ते इसके लिए वे अपने मैनेज़र की इजाज़त लें.

      विप्रो के सीईओ ने थियरी डेलापोर्टे ने भी कहा है कि जॉब के साथ छोटे-मोटे काम से उन्हें कोई दिक़्क़त नहीं थी.

      दिलचस्प बात ये है कि आईटी क्षेत्र के दिग्गज इस मसले को नैतिकता के नज़रिए से देखने की अपील कर रहे हैं.

      एन गणपति सुब्रमण्यम
      TCS
      नौकरी देने वालों के नज़रिए से देखें तो मूनलाइटिंग अनैतिक और अस्वीकार्य है. मेरे क्लाइंट्स के लिए भी ये अस्वीकार्य है. ये पूरी आईटी इंडस्ट्री बर्बाद कर सकता है.
      एन गणपति सुब्रमण्यम
      सीओओ, टीसीएस

      विप्रो के सीईओ डेलापोर्टे ने इस पर कहा है कि 'ये मसला मूनलाइटिंग के कानूनी या ग़ैर-कानूनी होने का नहीं है, बल्कि नैतिकता का मसला है.

      टीसीएस ने भी मूनलाइटिंग को नैतिकता का मुद्दा बताते हुए इसे कंपनी की नीतियों के ख़िलाफ़ बताया था.

      इकोनॉमिक टाइम्स को दिए इंटरव्यू में टीसीएस के सीइओ एन गणपति सुब्रमण्यम ने कहा है कि 'नौकरी देने वालों के नज़रिए से देखें तो मूनलाइटिंग अनैतिक और अस्वीकार्य है. मेरे क्लाइंट्स के लिए भी ये अस्वीकार्य है. ये पूरी आईटी इंडस्ट्री बर्बाद कर सकता है. आप ज़्यादा पैसे कमाने के लिए इस तरह का काम नहीं कर सकते.'

      पुरुष

      इमेज स्रोत, Getty Images

      कंपनी और कर्मचारी के बीच शक़ की दीवार क्यों?

      लेकिन सवाल ये उठता है कि अगर कंपनियों ने मूनलाइटिंग करने की वजह से सैकड़ों कर्मचारियों को नौकरी से निकाला है तो उन्होंने किन तरीकों से कितने कर्मचारियों की जांच की.

      ये सवाल कर्मचारियों के लिए चिंता का विषय बना हुआ है.

      तक्षशिला इंस्टीट्यूट से जुड़ीं कॉरपोरेट मामलों की जानकार सुमन जोशी मानती हैं कि इस पूरे विवाद के केंद्र में कंपनियों और कर्मचारियों के बीच भरोसे का टूटना है.

      ऑल इंडिया पॉलिसी के पॉडकास्ट पर बात करते हुए जोशी कहती हैं, "इस विवाद के केंद्र में कर्मचारियों और कंपनियों के बीच बदलता हुआ रिश्ता है. तमाम दूसरे रिश्तों की तरह ये रिश्ता भी आपसी भरोसे पर टिका है.

      इस भरोसे का टूटना दोनों पक्षों के लिए नकारात्मक है. क्योंकि ऐसे में कंपनियां अपने कर्मचारियों पर निगरानी बढ़ा सकती हैं. वे डिजिटल माध्यमों से काम के घंटों को ट्रैक कर सकती हैं. उन्होंने ये करना शुरू कर दिया है. और ये बेहद संवेदनशील क्षेत्र की ओर बढ़ना है. वे काफ़ी सख़्त अनुबंधों पर हस्ताक्षर कराएंगे और फिर उन्हें लागू करवाने पर जोर देंगे. और आख़िरकार इससे आपसी भरोसे का हनन होगा. अब इससे कंपनियां और कर्मचारी कैसे निपटते हैं. ये इस मुद्दे का केंद्र बिंदू है."

      भट्टाचार्य भी इस ओर इशारा करते हुए कहते हैं कि 'इस समय कंपनियां ये जताने की कोशिश कर रही हैं कि वे ब्रांड हैं, और उन्हें ज़रूरत नहीं है लेकिन अब कर्मचारियों ने ये जताना शुरू कर दिया है कि अगर कंपनियों को उनकी ज़रूरत नहीं है तो वे भी काम चला सकते हैं. देखना ये होगा कि आईटी इंडस्ट्री इस स्थिति से कैसे निपटती है."

      राजीव चंद्रशेखर
      Rajiv.in
      ऐसी कंपनियां जो अपने कर्मचारियों पर दबाव डालकर उन्हें दूसरी जगह काम करने से रोकना चाहती हैं और कहती हैं कि वे अपने स्टार्टअप पर काम नहीं कर सकते, उनका तबाह होना तय है.
      राजीव चंद्रशेखर
      केंद्रीय मंत्री

      इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के राज्य मंत्री राजीव चंद्रशेखर ने इस मुद्दे पर आईटी क्षेत्र की दिग्गज कंपनियों को सीधी सलाह दी है.

      उन्होंने कहा है कि 'वो दिन चले गए हैं जब लोग तकनीक क्षेत्र की बड़ी कंपनियों के साथ नौकरी करते हुए अपनी ज़िंदगियां गुज़ार दें. आज के जमाने में हर युवा चाहता है कि वह अपनी काबिलियत का भरपूर उपयोग कर इसे आर्थिक फायदे में बदले.'

      (आईटीसी में कार्यरत शख़्स का नाम बदला गया है)

      ये भी पढ़ें -

      (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)