सरकारी नौकरी के मामले में नौजवानों का भविष्य कैसे दाँव पर लग गया

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- Author, अभिनव गोयल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
बाइस साल के लखन कुमार सिंह बिहार के सीवान ज़िले के रहने वाले हैं. नौकरी की तैयारी के लिए पिछले चार साल से पटना में हैं. उनके घर की माली हालत ठीक नहीं है. बड़े भाई बीटेक करने के बाद भी बेरोज़गार हैं, वहीं छोटे भाई पढ़ाई कर रहे हैं. ऐसे में घर की उम्मीदें लखन सिंह पर टिकी हैं.
पटना में किराए के एक कमरे में रह रहे लखन के हर महीने का ख़र्च करीब 6 हज़ार है लेकिन दिक़्क़त सिर्फ़ ये नहीं है. असली समस्या है कि लखन सिंह जिस सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहे हैं, वो अभी कोसों दूर है.
लखन सिंह, 23 फ़रवरी को होने वाली रेलवे की ग्रुप 'डी' परीक्षा देने वाले हैं. इस परीक्षा के लिए उन्होंने 2019 में फ़ॉर्म भरा था, लेकिन रेलवे भर्ती बोर्ड ने आख़िरी समय पर नियम बदल दिया.
लखन सिंह बताते हैं, ''भर्ती के नोटिफ़िकेशन में सिर्फ़ एक ही परीक्षा सीबीटी 1 (कंप्यूटर बेस्ड टेस्ट) की बात कही गई थी. अब 24 जनवरी को नोटिफ़िकेशन निकालकर कहा गया कि सीबीटी 1 पास करने के बाद सीबीटी 2 परीक्षा भी देनी होगी. पहले ग्रुप-डी की नौकरी के लिए सिर्फ सीबीटी 1 ही होती थी. सरकार ने जब एक परीक्षा लेने में तीन साल लगा दिए तो सोचिए कि अगली परीक्षा में कितना समय लगेगा? ये छात्रों के साथ धोखा है.''
बिहार के कटिहार ज़िले के रहने वाले तारिक़ अनवर की कहानी इससे थोड़ी अलग है. पटना में सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहे तारिक़ अनवर ने 2019 में रेलवे भर्ती बोर्ड की ग़ैर तकनीकी लोकप्रिय श्रेणी (RRB-NTPC) की परीक्षा दी थी. परीक्षा फ़ॉर्म भरने के दो साल बाद हुई थी. हालांकि तारिक इस परीक्षा में पास नहीं कर सके.
तारिक़ इसकी वजह बताते हैं, ''रेलवे भर्ती बोर्ड ने इंटर और स्नातक पास दोनों तरह के छात्रों को इस परीक्षा में शामिल होने की अनुमति दी थी. नतीज़ा ये हुआ कि स्नातक पास छात्रों के सामने इंटर के छात्र टिक नहीं पाए. सिर्फ़ यही नहीं जिन छात्रों ने ये परीक्षा पास की, उनके नाम कई पदों के लिए चुने गए हैं. रेलवे भर्ती बोर्ड ने पहले कहा था कि सात लाख से ज्यादा छात्र चुने जाएंगे, लेकिन इसके आधे भी नहीं चुने गए.''
बहरहाल बात लखन और तारिक़ जैसे छात्रों की नहीं है और न ही रेलवे भर्ती बोर्ड की है. बिहार और दूसरे राज्यों के लाखों ऐसे छात्र हैं, जो सालों से सरकारी नौकरी के भरोसे बैठे हैं. सवाल ये है कि क्या इन छात्रों के सपने कभी पूरे हो पाएंगे? क्या सरकार के पास इतनी नौकरियां हैं कि लाखों छात्रों को नौकरी मिल पाए?

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बढ़ती बेरोज़गारी के आंकड़े
सेंटर फ़ॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी के मुताबिक़, दिसंबर 2021 में भारत में बेरोज़गारी दर 7.9 प्रतिशत थी. वहीं अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी के सेंटर फ़ॉर सस्टेनेबल एंप्लॉयमेंट रिसर्च सेंटर के मुताबिक़, बिहार में बेरोज़गारी की दर 40 फ़ीसदी और उत्तर प्रदेश में 22 फ़ीसदी है. जानकारों का मानना है कि ज़मीनी हालात आंकड़ों से भी बदतर हैं.
अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी में सेंटर फ़ॉर सस्टेनेबल एम्प्लॉयमेंट सेंटर के प्रमुख अजीत बसोले देश में बढ़ती बेरोज़गारी पर सालों से काम कर रहे हैं.
उनके मुताबिक़, ''2005 में 18 से 23 साल के क़रीब 15 प्रतिशत छात्र हायर एजुकेशन यानी कॉलेज में जा रहे थे, जो आज बढ़कर क़रीब 25 प्रतिशत हो गए हैं. दूसरी तरफ़, सरकारी नौकरियों में पिछले दो दशकों में लगातार कमी आई है. मांग और पूर्ति में काफ़ी फ़र्क है, जिसके चलते देश में बेरोज़गारी बढ़ रही है.''
देश में आबादी के साथ बेरोज़गारी का भी आंकड़ा तेज़ी से बढ़ रहा है. बिहार में पटना के 'एएन सिन्हा इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल स्टडीज़' के पूर्व निर्देशक डीएम दिवाकर बताते हैं, ''हर साल 80 लाख नए लोग नौकरी के तैयार हो रहे हैं, जबकि हम एक लाख भी नौकरी नहीं दे पा रहे हैं. ये आंकड़ा 2013 तक का है, इसके बाद सरकार ने आंकड़े देने बंद कर दिए. सरकार रिटायरमेंट के बाद खाली हुई नौकरियों पर भी भर्ती नहीं कर पा रही. देश के कई संस्थानों में पद खाली पड़े हैं.''

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सरकारी नौकरी के लिए लोग कर रहे समझौते
हरियाणा के रोहतक ज़िले के रहने वाले अजीत ने साल 2014 में भूगोल से एमए किया था. असिस्टेंट प्रोफ़ेसर बनने के लिए उन्होंने यूजीसी की 'नेट' परीक्षा भी पास की. इसके साथ ही हरियाणा टीचर एलिजिबिलिटी टेस्ट में प्राइमरी और टीजीटी लेवल की परीक्षा में भी सफल रहे.
लेकिन घर की माली हालत देखते हुए अजीत ने थक हारकर अपने सपने से बड़ा समझौता कर लिया. उन्होंने साल 2018 में हरियाणा के सिंचाई विभाग में चतुर्थ वर्ग की नौकरी के लिए फ़ॉर्म भरा. आख़िरकार उन्हें 2019 में ग्रुप 'डी' में सरकारी नौकरी मिली.
अजीत बताते हैं, ''कई सालों तक मैंने असिस्टेंट प्रोफ़ेसर की नौकरी के लिए कोशिश की, लेकिन नहीं मिली. चतुर्थ वर्ग की नौकरी मिली तो उसे ही ज्वाइन कर लिया. अब मेरा काम फ़ाइलों को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने का है.''
अजीत की तरह लाखों छात्र नौकरी सरकारी ही चाहते हैं. इसकी बड़ी वजह भविष्य की सुरक्षा है.
अजीत बताते हैं, ''प्राइवेट नौकरी में कभी भी निकाल देते हैं. सरकारी नौकरी में कम से कम ये डर नहीं होता. यहां 25 हज़ार तनख़्वाह मिलती है, लेकिन प्राइवेट में कोई इतने पैसे नहीं देगा. यहां उम्मीद भी है कि आने वाले समय में क्लर्क बन जाऊंगा.''

प्राइवेट नौकरी का क्या हाल है?
जानकारों का मानना है कि पिछले कुछ सालों से सिर्फ़ सरकारी ही नहीं, बल्कि प्राइवेट नौकरियां भी सिमट रही हैं. डीएम दिवाकर इसके लिए सरकार की नीतियों को ज़िम्मेदार मानते हैं.
उनका कहना है, ''रेलवे, डाक सेवा, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे बड़े क्षेत्र में नौकरियां ज़्यादा हैं, लेकिन मिलती नहीं हैं. सरकारी क्षेत्र निजीकरण की तरफ़ बढ़ रहे हैं, जिसकी वजह से नौकरियां रुकी हुई हैं. सरकार की आर्थिक स्थिति ख़राब है.''
अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी के एसोसिएट प्रोफ़ेसर अजीत बसोले के मुताबिक़, ''1991 के बाद उदारीकरण की वजह से सरकारी नौकरियां कम होनी शुरू हो गईं. सरकार फुल टाइम या पे-कमीशन पर नौकरी देने के बदले कॉन्ट्रैक्ट पर नौकरियां दे रही है. उदाहरण के लिए, सरकार आंगनवाड़ी वर्करों से काम तो करवाना चाहती है, लेकिन उन्हें नौकरी नहीं देना चाहती.''

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सरकार के पास क्या रास्ते हैं ?
नौकरी सरकारी हो या प्राइवेट, युवाओं को सुरक्षित भविष्य और तय आमदनी की ज़रूरत है. इसके कई रास्ते भी हो सकते हैं.
एसोसिएट प्रोफ़ेसर अजीत बसोले का मानना है, ''पढ़ाई पूरी करने के बाद छात्रों को प्राइवेट सेक्टर में नौकरी मिलने में काफ़ी दिक़्क़त आती है. उन्हें इंडस्ट्री में काम करने के हिसाब से ट्रेनिंग नहीं दी जाती. सरकार को छात्रों और इंडस्ट्री के बीच में पुल तैयार करने की ज़रूरत है. छात्रों को अलग से इंडस्ट्री के हिसाब से ट्रेनिंग मुहैया करवाई जाए, जिससे आसानी से उन्हें नौकरी मिल जाए.''
अजीत बसोले बताते हैं, ''पिछले कुछ सालों में सरकार ने सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग को बढ़ावा देने के लिए कई प्रयास किए हैं. सस्ती दरों पर ब्याज़, सब्सिडी जैसे कई क़दम उठाए हैं. लेकिन ये काफ़ी नहीं है.
ज़्यादा टैक्स, बिजली कटौती, टूटी सड़कों जैसे कई कारण हैं, जिनकी वजह से उनका विकास नहीं हो पा रहा है. सरकार को उन्हें 'इज़ ऑफ़ डूइंग बिज़नेस' देना होगा.''

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नौकरी न मिलने से युवाओं में हताशा
सालों की तैयारी के बाद भी नौकरी न मिलने से युवाओं के मन में निराशा घर कर रही है. पटना में तैयारी कर रहे ललन सिंह और तारिक़ अनवर जैसे छात्र मानसिक दबाव में हैं.
ललन सिंह कहते हैं, ''मेरे पिता किसान हैं. हर महीने 6 हज़ार रुपये भेजना उनके लिए काफ़ी मुश्किल है. बिहार में प्राइवेट नौकरियां नहीं है. मुझ पर सरकारी नौकरी लेना का दबाव है.''
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक़, बेरोज़गारी की वजह से 2018 में 2,741 लोगों ने आत्महत्या की थी. 2014 की तुलना में 2018 में आत्महत्या के मामले क़रीब 24 फ़ीसद बढ़े. देश में बेरोज़गारी की वजह से 2018 में सबसे ज़्यादा मामले कर्नाटक से आए थे.
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