भारत में कम महिलाएँ खोज रही हैं नौकरियाँ, क्या है वजह?

- Author, शादाब नज़्मी
- पदनाम, बीबीसी विजुअल जर्नलिज़्म टीम
भारत में महिलाएं नौकरी नहीं तलाश रही हैं. पिछले कुछ वर्षों की तुलना में सक्रियता से नौकरी तलाशने वाली महिलाओं की तादाद में भारी गिरावट आई है. और ये बहुत चिंता की बात है.
भारत के कामगार वर्ग से कितनी महिलाएं दूर हो चुकी हैं?
साल 2017 से 2022 के बीच लगभग 2.1 करोड़ महिलाओं ने स्थायी तौर पर रोज़गार छोड़ दिया. इसका मतलब है कि या तो ये महिलाएं बेरोज़गार हैं या फिर नौकरी की तलाश ही नहीं कर रही हैं.
और, महिलाओं के नौकरी से दूरी बनाने का एक नतीजा ये हुआ है कि देश की अर्थव्यवस्था में कामगारों की भागीदारी में गिरावट आ रही है.
सेंटर फ़ॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनमी (CMIE) की ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक़, 2017 में जहां 46 फ़ीसद आबादी अर्थव्यवस्था के कामगारों में शामिल थी, वहीं 2022 में ये हिस्सेदारी घटकर 40 प्रतिशत ही रह गई.
इसका मतलब है कि पिछले पांच वर्षों के दौरान देश की अर्थव्यवस्था में कामगारों की भागीदार में छह फ़ीसद की भारी गिरावट दर्ज की गई है.
हालांकि ये आंकड़े बहुत चौंकाने वाले हैं नहीं. जैसा कि आंकड़े ही बताते हैं, देश के कामगारों में महिलाओं की भागीदारी में पिछले कई वर्षों से लगातार कमी आ रही है.
वर्ष 2004-5 में युवा (15-29 वर्ष) ग्रामीण महिलाओं की कामगारों में भागीदारी की दर (LFPR) 42.8 प्रतिशत थी. उसके बाद से ही इसमें लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है और 2018-19 में ये दर गिरकर 15.8 फ़ीसद ही रह गई थी.

बेगारी और बेरोज़गारी
क्या आपको पता है कि महिलाएं घरेलू कामों में कितने घंटों की बेगारी करती हैं?
भारत में महिलाएं हर दिन औसतन चार घंटे का समय बिना पैसे के घर के दूसरे सदस्यों के काम करने में ख़र्च करती हैं. इसमें बच्चों और बुज़ुर्ग सदस्यों की देखभाल, खाना पकाना और साफ़-सफ़ाई जैसे काम शामिल हैं. और महिलाओं के इस वक़्त का सबसे ज़्यादा हिस्सा बच्चों की देख-भाल में लग जाता है.
सांख्यिकी मंत्रालय की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, महिलाओं की तुलना में मर्द, बिना पैसे के घर के कामों में अपने दिन का महज़ 25 मिनट हिस्सा ख़र्च करते हैं. पुरुष अपने दिन का ज़्यादातर हिस्सा रोज़गार और उससे जुड़ी गतिविधियों में ख़र्च करते हैं.
महिलाओं के घर से काम के लिए न निकलने की तमाम वजहों में से सबसे बड़ी तो उनके नौकरी करने में घर के लोगों की राय का शामिल होना है. और महामारी के चलते ये भी हो सकता है कि महिलाओं के दोबारा काम करने की संभावना पर पूर्ण विराम लग गया हो.

पीरियॉडिक लेबर फ़ोर्स सर्वे (PLFS) के मुताबिक़ 2018-19 में शहरी युवा महिलाओं (15-29 वर्ष) की बेरोज़गारी की दर 25.7 फ़ीसद थी. जबकि इसी उम्र के शहरी पुरुषों के बीच बेरोज़गारी की दर 18.7 प्रतिशत ही थी.
CMIE के ताज़ा आंकड़े तो और भी चिंताजनक हैं. जनवरी से अप्रैल 2016 के बीच 2.8 करोड़ महिलाएं बेरोज़गार थीं और काम करना चाहती थीं. जबकि दिसंबर 2021 तक ऐसी महिलाओं की संख्या घटकर 80 लाख ही रह गई थी.
जबकि ग्रामीण इलाक़ों में पुरुषों की तुलना में महिलाएं कम तादाद में ही बेरोज़गार थीं. लेकिन, इसे हम उम्मीद की रौशनी के तौर पर नहीं देख सकते हैं. ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाएं हों या पुरुष, दोनों के बीच बेरोज़गारी की दर में इज़ाफ़ा हो रहा है. शहरी इलाक़ों में बेरोज़गारी की दर महिलाओं के बीच ज़्यादा स्थायी तौर पर बढ़ रही है.

आवाजाही की दिक़्क़त
तेलंगाना की रहने वाली आंगनबाड़ी कार्यकर्ता बालम्मा कहती हैं कि, "न तो मेरा पति है और न ही पिता हैं कि वो मुझे नौकरी की जगह तक छोड़ आएं और वापसले आएं अगर कोई गाड़ी/ बस हो तो हम वहां चले जाएंगे. अगर ये सुविधा नहीं है, तो मैं कैसे सफ़र करूंगी?"
बालम्मा उन महिलाओं में शामिल हैं जो कोविड-19 महामारी के दौरान फ्रंटलाइन वर्कर्स में शामिल थीं.
बिहार और तेलंगाना पर केंद्रित, अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी के एक पेपर के मुताबिक़, ज़्यादातर विवाहित आंगनबाड़ी और आशा कार्यकर्ता अपने नौकरी पर या कहीं और आने जाने के लिए अपने पतियों या ससुर के भरोसे थीं.
शहरों की आधी महिलाएं नियमित रूप से काम करती हैं या तनख़्वाह पर नौकरी करती हैं और उनकी राह की तमाम चुनौतियों में आवाजाही का मसला भी शामिल है. सामाजिक सुरक्षा का फ़ायदा न होने और तनख़्वाह में अंतर के चलते भी महिलाओं के घर से बाहर निकलने और काम करने पर असर पड़ता है.

अपराध और महिलाएं
क्या महिलाओं के ख़िलाफ़ होने वाले अपराधों के चलते उनके घर से बाहर निकलना और काम पर जाना प्रभावित होता है?
इनिशिएटिव फ़ॉर व्हाट वर्क्स टू एडवांस वुमेन ऐंड गर्ल्स इन द इकॉनमी (IWWAGE) द्वारा किए गए एक सर्वे में ये पाया गया है कि जिन राज्यों में कामगारों में महिलाओं की भागीदारी कम है, वहां पर महिलाओं और लड़कियों से होने वाले अपराध की दर ज़्यादा होती है.
अगर हम नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के साल 2011 से 2017 के बीच राज्य स्तरीय अपराध के आंकड़ों का विश्लेषण करें, तो बिहार और दिल्ली जैसे राज्यों में महिलाओं के खिलाफ़ अपराध में मामूली बढ़ोत्तरी आई है और इसी बीच में कामगारों में महिलाओं की भागीदारी भी घटती दर्ज की गई.

हालांकि ये कोई ठोस सुबूत नहीं है और ये रिसर्च सिर्फ़ ये जताता है कि अपराध और कामगारों के बीच नकारात्मक संबंध होता है. लेकिन, ये पाया गया है कि महिलाओं के काम करने की राह में आने वाली तमाम दिक़्क़तों में महिलाओं से होने वाले अपराध भी बड़ी वजह हैं, जिनके चलते महिलाएं घर से नहीं निकलतीं और काम पर नहीं जाती हैं.

शहरों और गांवों के बीच का अंतर
साल 2021 में भारत के शहरों में महिलाओं के रोज़गार की औसत दर, वर्ष 2020 की तुलना में 6.9 फ़ीसद कम पायी गई है. 2021 की तुलना में वर्ष 2019 में 22.1 प्रतिशत ज़्यादा महिलाएं काम कर रही थीं.
हालांकि ये चलन ग्रामीण महिलाओं में नहीं देखने को मिलता है. सच तो ये है कि 2021 में ग्रामीण महिलाओं के रोज़गार की दर 2019 की तुलना में महज़ 0.1 फ़ीसद कम थी. ये आंकड़े बताते हैं कि महामारी के बाद महिलाओं के रोज़गार न हासिल कर पाने की दिक़्क़त सबसे ज़्यादा शहरी महिलाएं झेल रही हैं.
2019 में औसतन 95.2 लाख महिलाएं हर महीने सक्रियता से नौकरी तलाश करती देखी गई थीं. 2020 में ये आंकड़ा घटकर 83.2 लाख ही रह गया. और 2021 में तो हर महीने नौकरी तलाशने वाली महिलाओं की तादाद और भी घटकर महज़ 65.2 लाख ही रह गई. वहीं, 2019 की तुलना में नौकरी तलाश करने वाले पुरुषों की तादाद 2021 में बढ़ गई.
ये आंकड़े बताते हैं कि महामारी के बाद महिलाएं न केवल कम तादाद में नौकरी कर रही हैं, बल्कि उससे भी कम संख्या में महिलाएं नौकरी तलाश रही हैं.
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