मोहन भागवत ने दशहरा संबोधन में आंबेडकर और मुसलमानों पर क्या कहा?

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आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने विजयादशमी के अपने संबोधन में सामाजिक समरसता की अपील की है. नागपुर में आरएसएस के मुख्यालय में अपने वार्षिक संबोधन के दौरान उन्होंने महिलाओं के सशक्तीकरण, जनसंख्या नीति, रोज़गार बढ़ाने और दलितों के साथ भेदभाव बंद करने के साथ ही अल्पसंख्यकों को लेकर विचार ज़ाहिर किए.
भागवत ने कहा कि देश में एक समग्र जनसंख्या नीति बननी चाहिए. ये सब पर समान रूप से लागू होना चाहिए.
भागवत ने बीआर आंबेडकर और महर्षि अरविंदो के विचारों का हवाला दिया और कहा, ''कथित अल्पसंख्यकों में यह डर पैदा किया जा रहा है कि उन्हें हमसे या संगठित हिंदुओं से ख़तरा है.''
उदयपुर और अमरावती में हुई हत्याओं का ज़िक्र करते हुए भागवत बोले, ''यह ख़तरनाक प्रवृति है. इसका अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों ने भी विरोध किया. लेकिन ये सिर्फ़ अपवाद बन कर ना रह जाए, बल्कि अधिकांश मुस्लिम समाज का ये स्वभाव बनना चाहिए. ''
उन्होंने कहा, ''आरएसएस की ओर से अल्पसंख्यकों से बातचीत कोई पहली बार नहीं है. संघ ने पहले भी ऐसा किया है. डॉ. हेडगेवार के समय से ऐसा चला आ रहा है और गुरुजी ने जिलानी से मुलाक़ात की थी. तब से ही हमारा सभी वर्गों के साथ संवाद चलता रहा है.''
सामाजिक समरसता
उन्होंने कहा- संविधान के कारण राजनीतिक तथा आर्थिक समता का पथ प्रशस्त हो गया, लेकिन सामाजिक समता को लाए बगैर वास्तविक और टिकाऊ बदलाव नहीं आएगा. डॉ. आंबेडकर ने कहा था कि हमें राजनीतिक स्वतंत्रा तो मिल गई, लेकिन सामाजिक आज़ादी नहीं मिली है.
भागवत ने कहा, ''मंदिर, पानी, श्मशान सबके लिए समान हो, इसकी व्यवस्था तो सुनिश्चित करनी ही होगी. ये घोड़ी चढ़ सकता है, वो घोड़ी नहीं चढ़ सकता, ऐसी मूर्खतापूर्ण बातें तो हमें ख़त्म करनी होंगी. सबको एक-दूसरे का सम्मान करना होगा. हमें समाज का सोचना होगा, सिर्फ़ स्वयं का नहीं.
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जनसंख्या नीति
भागवत ने कहा कि देश में एक समग्र जनसंख्या नीति बननी चाहिए. ये सब पर समान रूप से लागू होना चाहिए. उन्होंने देश के डेमोग्राफिक डिविडेंड का ज़िक्र करते हुए कहा, ''70 करोड़ से ज़्यादा युवा हैं हमारे देश में. चीन को जब लगा कि जनसंख्या बोझ बन रही है तो उसने रोक लगा दी. हमारे समाज को भी जागरूक होना पड़ेगा. नौकरी-चाकरी में भी अकेली सरकार और प्रशासन कितना रोज़गार बढ़ा सकती है?"

रोज़गार
भागवत ने रोज़गार का सवाल उठाते हुए कहा, ''रोज़गार मतलब नौकरी और नौकरी के पीछे ही भागेंगे और वह भी सरकारी. अगर ऐसे सब लोग दौड़ेंगे तो नौकरी कितनी दे सकते हैं? किसी भी समाज में सरकारी और प्राइवेट मिलाकर ज़्यादा से ज़्यादा 10, 20, 30 प्रतिशत नौकरी होती है. बाक़ी सबको अपना काम करना पड़ता है. इसलिए उद्यमिता की प्रवृति बढ़नी चाहिए. देश में स्टार्ट-अप बढ़ रहा है और इसे सरकार भी मदद दे रही है.''
महिलाओं का सशक्तीकरण
भागवत ने अपने भाषण के शुरुआत समाज में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की अपील की.
उन्होंने कहा, ''हमें महिलाओं के साथ समानता का व्यवहार करने और उन्हें अपने निर्णय स्वयं लेने की स्वतंत्रता देकर सशक्त बनाने की आवश्यकता है. जो सब काम मातृ शक्ति कर सकती है वह सब काम पुरुष नहीं कर सकते, इतनी उनकी शक्ति है और इसलिए उनको इस प्रकार प्रबुद्ध, सशक्त बनाना, उनका सशक्तीकरण करना और उनको काम करने की स्वतंत्रता देना और कार्यों में बराबरी की सहभागिता देना अहम है."

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भारत की तारीफ़
भागवत ने कहा, ''दुनिया में भारत की प्रतिष्ठा बढ़ी है. हमने श्रीलंका को उसके आर्थिक संकट में मदद की. यूक्रेन में अमेरिका और रूस की लड़ाई में हमने अपने हित को सबसे आगे रखा. राष्ट्रीय सुरक्षा में हम लगातार सफल होते जा रहे हैं और स्वावलंबी होते जा रहे हैं. इस नवोत्थान की आहट हम सुन रहे हैं.''
सनातन संस्कृति
संघ प्रमुख ने कहा-सनातन संस्कृति-मेरे भारत की पवित्र भूमि पर जन्मी है, हिमालय से लेकर सागर तक. इसलिए हम सब भारतीयों की ज़िम्मेदारी है कि सनातन संस्कृति उद्घोष, इसका प्रचार पूरे विश्व में, पूरी जागृत अवस्था के साथ स्वयं अपनाएं और मानवकल्याण के लिए इसके प्रचार-प्रसार में जुटना चाहिए.

मातृभाषा में शिक्षा
उन्होंने शिक्षा का ज़िक्र करते हुए कहा, ''मातृभाषा में शिक्षा को बढ़ावा देने वाली नीति बननी चाहिए यह अत्यंत उचित विचार है, और नई शिक्षा नीति के तहत उस ओर शासन/ प्रशासन पर्याप्त ध्यान भी दे रहा है. नई शिक्षा नीति के कारण छात्र एक अच्छा मनुष्य बने, उसमें देशभक्ति की भावना जगे, वह सुसंस्कृत नागरिक बने यह सभी चाहते हैं.''
संघ ने इस बार अपने वार्षिक दशहरा कार्यक्रम में पर्वतारोही संतोष यादव को मुख्य अतिथि बनाया था. दो महीने पहले 'कृषि और समृद्धि' पर संघ के एक कार्यक्रम में इसके सर कार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने इसकी बैठकों में महिलाओं की कम भागीदारी पर निराशा ज़ाहिर की थी.
माना जा रहा है कि संघ ने महिलाओं को ख़ुद से जोड़ने के लिए यह क़दम उठाया है.

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संतोष यादव को इस कार्यक्रम का मुख्य अतिथि बनाने के सवाल पर भागवत ने कहा ''आरएसएस के कार्यक्रम में महिलाओं की भागीदारी डॉक्टर साहब (डॉक्टर हेडगेवार) के वक्त से ही हो रही है. अनसूइया काले से लेकर कई महिलाओं ने आरएसएस के कार्यक्रमों में हिस्सेदारी ली. वैसे भी हमें आधी आबादी को सम्मान और उचित भागीदारी तो देनी ही होगी.''
संतोष यादव ने क्या कहा?
संतोष यादव ने कहा कि पहले संघ के काम के बारे में जानें फिर उसके बारे में राय बनाएं. '' पूरे विश्व के समाज से मैं अनुरोध करना चाहती हूं कि वह आए और आरएसएस की कार्यप्रणाली को उनके द्वारा किए जा रहे कार्यों को समझे. कल से जब से मैं नागपुर में आई हूं आरएसएस के एक-एक कार्य को देख रही हूं. वह इतना शोभनीय है और इतना प्रभावित करने वाला है कि सनातन संस्कृति को लेकर विश्वास और पुख्ता हो जाता है. ''
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उन्होंने कहा,'' कई बार हम किसी चीज़ के बारे में बिना जाने उसके विरोध में बातें करते हैं. मुझे याद है एक बार मैं जेएनयू में पर्यावरण के उद्बोधन में बच्चों से बात कर रही थी. तब एक बच्चे ने सवाल किया कि हमें रामचरित मानस या भगवत गीता पढ़ने के लिए क्यों कहा जाता है? तब मैंने कहा कि - किसने कहा? मैंने तो चर्चा नहीं की. फिर मेरे मन में एक सवाल उठा. मैंने उनसे पूछा कि क्या आपने इसे पढ़ा है उसने कहा - नहीं. तब मैंने कहा कि जब आपने पढ़ा ही नहीं है तो इसके प्रति द्वेष क्यों. सनातन संस्कृति ये नहीं सिखाती बिना किसी चीज़ को जाने उसके विरोध में राय बनाई जाए.''
उन्होंने कहा, ''जो काम पुरुष कर सकता है, वो सब काम मातृशक्ति भी कर सकती है. लेकिन जो काम महिलाएँ कर सकती हैं, वो सब काम पुरुष नहीं कर सकते. उन्होंने कहा कि महिलाओं के बिना समाज की पूर्ण शक्ति सामने नहीं आएगी.''
हरियाणा के रेवाड़ी ज़िले की रहने वाली संतोष यादव दो बार एवरेस्ट फ़तह करने वाली पहली महिला हैं. संतोष यादव की आधिकारिक वेबसाइट के मुताबिक़ उनकी इस उपलब्धि को 1994 के गिनीज़ बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकार्ड्स में शमिल किया गया था. 54 साल की यादव को साल 2000 में पद्मश्री से सम्मानित किया जा चुका है.
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