चीन से बड़ा होना पड़ेगा, निर्भर हुए तो उसके सामने झुकना पड़ेगा: मोहन भागवत

मोहन भागवत

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने 15 अगस्त के मौके पर मुंबई के एक स्कूल में झंडातोलन के दौरान कहा कि वक़्त आ गया है कि भारत अपनी आर्थिक आज़ादी को लेकर सुदृढ़ता से आगे बढ़े.

इस दौरान संघ प्रमुख ने कहा कि हमें चीन पर निर्भरता कम से कम करनी होगी.

उन्होंने कहा, "चीन पर निर्भरता बढ़ेगी तो हमें उसके सामने झुकना पड़ेगा."

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चीन को लेकर मोहन भागवत पहले भी कई बातें कह चुके हैं.

बीते वर्ष उन्होंने चीन को लेकर सजग रहने की सलाह दी थी. उन्होंने कहा था, "चीन का स्वभाव विस्तारवादी है. हमें अंतरराष्ट्रीय संबंधों और पड़ोसियों के साथ संबंधों में चीन से हमें बड़ा होना पड़ेगा. दूसरा उपाय नहीं है."

चीन पर संघ प्रमुख यह भी कहा, "हम इंटरनेट और टेक्नोलॉजी का बहुत इस्तेमाल करते हैं. हमारे देश में उसकी मूल टेक्नोलॉजी नहीं है. वो बाहर से आती है. तो हम जितना भी चीन के बारे में चिल्लाएंगे और चीन के सामान का बहिष्कार करेंगे लेकिन आपके मोबाइल में जो कुछ है वो कहां से आया है."

भागवत ने कहा, "तथाकथित महाशक्तियों के आर्थिक चंगुल से बाहर निकल कर देश को सच्चे मायने में स्वतंत्र बनाने का दायित्व भारत का है."

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"स्वनिर्भर बनना होगा"

इस दौरान वे भारतीय अर्थव्यवस्था में रोज़गार कैसे उत्पन्न हों, स्वदेशी और आर्थिक स्वनिर्भरता जैसे मुद्दों की बात भी की.

उन्होंने कहा, "स्वदेशी का मतलब दुनिया में सब को छोड़ देना नहीं है. अंतरराष्ट्रीय व्यापार रहेगा, लेना देना रहेगा लेकिन शर्तें अपनी रहेंगी. भारत की शर्तों पर बिजनेस. मन की हमारी चलेगी. हमारी मर्जी को कोई दबा नहीं सकेगा. उसके लिए स्वावलंबी होना पड़ेगा. और स्वावलंबन से हमारे रोज़गार बनते हैं. नहीं तो हमारे रोज़गार चले जाते हैं, भूख उत्पन्न होती है और हिंसा होती है. तो स्वदेशी का अर्थ है स्वावलंबन और अहिंसा."

इस दौरान भागवत ने आर्थिक सुरक्षा को ज़रूरी बताया. उन्होंने कहा, "स्वतंत्र देश को स्वनिर्भर होना है. जितना स्वनिर्भर होंगे उतना सुरक्षित रहेंगे. आर्थिक सुरक्षा पर बाकी सभी सुरक्षा निर्भर है. और सुरक्षा इसी में है."

भागवत ने ज़ोर देकर कहा, "जो चीज़ें हम घर पर बना सकते हैं उसे बाज़ार से नहीं लाना चाहिए."

उन्होंने कहा, "हम अंतरराष्ट्रीय व्यापार और वाणिज्य के ख़िलाफ़ नहीं हैं लेकिन उत्पादन गांवों में होना चाहिए. बड़े पैमाने पर उत्पादन नहीं बल्कि जनता के ज़रिए उत्पादन होना चाहिए. स्थानीय स्तर पर उत्पादन करने से भारतीय अर्थव्यवस्था में रोज़गार और स्वरोज़गार के अवसर पैदा होंगे. और जितने उत्पादक बढ़ेंगे, स्वनिर्भर लोगों की संख्या भी बढ़ेगी."

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रहन-सहन के स्तर पर क्या बोले भागवत?

इस दौरान संघ प्रमुख मोहन भागवत ने राजस्व को समान रूप से वितरित किए जाने पर भी ज़ोर दिया.

उन्होंने कहा, "उद्योगों को सरकार से प्रोत्साहन मिलना चाहिए. सरकार को नियामक की तरह काम करना चाहिए, उसे ख़ुद अपना कारोबार नहीं करना चाहिए. सरकार को विकास के लिए ज़रूरी वस्तुओं के निर्माण के लिए उद्योगों से अपील करना चाहिए. उन्हें ऐसी नीतियां बनानी चाहिए जो उद्योगों को प्रोत्साहित करे."

"हम पूरी तरह से राष्ट्रीयकरण में विश्वास नहीं करते लेकिन सच यह भी नहीं है कि देश का उद्योगों से कोई लेना देना भी नहीं है. इन सभी को एक पारिवारिक इकाई के रूप में साथ काम करना चाहिए."

"लघु उद्योग को बड़े उद्योगों का पूरक होना चाहिए. उनका फ़ोकस जनकेंद्रित बनने का होना चाहिए न कि मुनाफ़ा केंद्रित. आर्थिक इकाई को एक परिवार मानने से अर्थव्यवस्था को रोज़गार पैदा करने में मदद मिलेगी."

इस दौरान संघ प्रमुख ने यह भी कहा कि आपके जीवन यापन का स्तर इस बात से नहीं तय होना चाहिए कि आप कितना कमाते हैं बल्कि इससे तय होना चाहिए कि आप समाज को वापस कितना देते हैं.

(कॉपी: अभिजीत श्रीवास्तव)

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