बिलकिस बानो के गांव रणधीकपुर से बहुत से मुसलमान घर छोड़कर क्यों जा रहे हैं? -ग्राउंड रिपोर्ट

बिलकिस बानो

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    • Author, तेजस वैद्य
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • बिलकिस बानो मामले में दोषियों की रिहाई के बाद क़रीब 500 मुसलमान रणधीकपुर छोड़कर जा चुके हैं.
  • बिलकिस बानो मामले में अगर आप यहां किसी से दोषियों की रिहाई के बारे में कुछ पूछना चाहें या उनकी राय जानना चाहें तो यहां कोई भी उस बारे में बात करने को तैयार नहीं है.
  • बिलकिस बानो मामले में रिहा हुए 11 दोषियों में से ज़्यादातर सिंहवड़ गांव में रहते हैं. यह गांव बिलकिस बानो के गांव रणधीकपुर के काफी नज़दीक है.
  • 22 अगस्त को जब बीबीसी की टीम गांव के मुसलमान मोहल्ले में पहुंची तो ज़्यादातर घरों पर ताले लटक रहे थे.
  • हर घर तिरंगा अभियान के तहत शायद एक घर के ऊपर तिरंगा फहराया गया था, जो अभी भी वहां लहरा रहा था.
  • साल 2002 के बाद से रणधीकपुर में कथित तौर पर कोई बड़ी घटना नहीं हुई है लेकिन हिंदुओं और मुसलमानों के बीच अविश्वास को महसूस किया जा सकता है.
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जब हम इस गांव में पहुंचे तो मुस्लिम मोहल्लों के बहुत से घरों के बाहर ताले लटके मिले. यहीं पर हमें बिलकिस बानो के चचेरे भाई इमरान मिले. वह इसी गांव में रहते हैं.

उन्होंने हमसे कहा, "यहां पर पहले से ही डर तो था ही, लेकिन अब जब से बिलकिस बानो के मामले में 11 दोषी रिहा हुए हैं, डर और बढ़ गया है. दोषियों के रिहा होने के बाद से क़रीब 500-600 मुसलमान हमारा गांव रणधीकपुर छोड़कर जा चुके हैं."

दाहोद ज़िले का रणधीकपुर गांव गोधरा से क़रीब 50 किलोमीटर की दूरी पर है. 27 फ़रवरी 2002 को बिलकिस अपने इसी गांव में थीं, जब गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस को कुछ लोगों ने आग के हवाले कर दिया था. इसके बाद जो दंगे भड़के उसके ज़ख़्म आज भी हरे हैं.

दंगे भड़कने के साथ ही हर तरफ़ अफ़रा-तफ़री का माहौल था. बिलकिस अपने गांव में थीं लेकिन जैसे ही दंगे भड़कने की ख़बर गांव तक पहुंची, उनके परिवार ने जान बचाने के लिए गांव से भागने का फ़ैसला किया. वे गांव से ज़्यादा दूर नहीं भाग सके थे...क़रीब 10 किलोमीटर दूर ही चपरवाड़ गांव के पानीवेला इलाक़े में पहाड़ियों के पास ही उन्हें रोक लिया गया.

यहीं पर बिलकिस बानो के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया और उनके परिवार वालों की हत्या भी. बिलकिस के परिवार के साथ जो कुछ हुआ वो काफी लंबे समय तक क्षेत्रीय और राष्ट्रीय मीडिया में छाया रहा.

इस घटना के इतने साल बीत जाने के बावजूद भी ज़ख़्म हरे हैं और जब से दोषियों को रिहाई मिली है, तब से गांव के लोगों में ख़ौफ़ का माहौल है. कोई भी इन दोषियों के बारे में बात नहीं करना चाहता है. कोई उनकी रिहाई पर कोई राय नहीं देना चाहता है. हालांकि कुछ-एक मुस्लिमों इस बारे में बात की लेकिन ज़्यादातर ने चुप्पी ही साधे रखी.

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रणधीकपुर

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क्या बिलकिस नरेंद्र मोदी की बेटी नहीं?

बिलकिस के पिता का घर रणधीकपुर में चुंदड़ी रोड के पास एक मुस्लिम मोहल्ले में था. उसी मोहल्ले में रहने वाले इक़बाल मोहम्मद ने हमसे इस बारे में बात की.

उन्होंने सवालिया अंदाज़ में हमसे कहा, "मोदी जी कहते हैं कि देश की बेटियां उनकी बेटियों की तरह हैं तो क्या बिलकिस उकी बेटी नहीं है? क्या वो बिलकिस को न्याय नहीं दे सकते हैं? 11 दोषियों को रिहा कर दिया गया है. वो किसी छोटे-मोटे अपराध में दोषी नहीं थे, वो एक जघन्य अपराध के दोषी थे. क्या हमारे देश का संविधान ऐसे जघन्य अपराध में ऐसी छूट और रिहाई की अनुमति देता है?"

बिलकिस बानो मामले में जिन 11 दोषियों को रिहा किया गया है, उनमें से ज़्यादातर रणधीकपुर गांव से लगे सिंहवाड़ गांव के ही हैं.

कुछ दोषियों के घर तो बिलकिस बानो के घर से आधा किलोमीटर से भी कम दायरे में हैं.

रणधीकपुर में चुंदड़ी रोड के अलावा बिलवाल मोहल्ले में भी मुसलमान आबादी है. यहां के स्थानीय लोगों का कहना है कि 15 अगस्त बिलकिस मामले के दोषियों की रिहाई के बाद से ही इलाक़े में मुसलमानों का पलायन शुरू हो गया है.

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वीडियो कैप्शन, क्यों ख़ौफ़ में हैं गुजरात दंगों के चश्मदीद

बीबीसी की टीम ने क्या देखा?

22 अगस्त को बीबीसी की टीम जब रणधीकपुर पहुंची तो हम उन मोहल्लों में भी गए. ज़्यादातर घरों के बाहर ताले लटके हुए थे और जिन घरों के बाहर ताले नहीं थे उनमें ताले लगने की तैयारी हो रही थी. जो लोग अभी भी उन मोहल्लों में हैं, उनमें से ज़ायादातर अपना सामान बांधते दिखे.

इसे विडंबना ही कहेंगे कि यह मोहल्ला पुलिस थाने के ठीक पीछे है, बावजूद लोग घर छोड़कर जा रहे हैं.

हालांकि इस मोहल्ले ने ऐसा ही एक पलायन पहले भी देख रखा है.वो साल 2002 का दौर था, जब गुजरात में दंगे भड़के थे और मुसलमान परिवार के परिवार रणधीकपुर छोड़कर चले गए थे.

23 अगस्त को जब बीबीसी की टीम यहां पहुंची तो हम चुंदड़ी रोड के पीछे के मोहल्ले में गए. हमें शायद ही कोई ऐसा घर दिखा हो, जिस पर ताला ना पड़ा हो. खाली गलियों और संकरे रास्तों के बीच आवारा कुत्ते और पीछे छूट गए जानवर चलते-चरते दिखाई दिए.

हालांकि मोहल्ला पूरी तरह से खाली नहीं हुआ है. कुछ मुसलमान युवक अभी मोहल्लों में हैं. जिनमें से कोई बिलकिस का चाचा है, कोई चचेरा भाई. लेकिन ऐसा नहीं है कि वे यहीं रह जाएंगे. उन्होंने हमें बताया कि एक-दो दिन के भीतर वे भी इस जगह को छोड़कर निकल जाएंगे.

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रणधीकपुर

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लहराता दिखा तिरंगा

जब हम बिलवाल मोहल्ला में अमीना बानो के घर पहुंचे तो उन्होंने अपना लगभग सामान बांध लिया था.

'हर घर तिरंगा' अभियान के तहत उन्होंने भी अपने घर पर तिरंगा फहराया था, जो अब भी हवा के साथ लहरा रहा था.

बीबीसी से बात करते हुए उन्होंने कहा, "इन 11 लोगों की रिहाई से हमारे अंदर डर है. मेरा अपना बेटा साल 2002 के दंगे के दौरान मारा गया. हम भूखे-प्यासे कई दिनों तक जंगल में भटकते रहे थे. अब हमारे अंदर एकबार फिर डर है कि अगर दंगे हो गए तो क्या होगा..?"

अमीना बानो की पड़ोसी मदीना बानो भी अपना सामान बांध रही थीं.

उन्होंने हमसे कहा, "हमारे आस-पड़ोस में जब सभी घर छोड़कर जा रहे हैं तो हम यहां कैसे रह सकते हैं? मेरी छोटी-छोटी बेटियां हैं. हमारा छह लोगों का परिवार है. अब हम रणधीकपुर छोड़कर देवगढ़बारिया जा रहे हैं."

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रणधीकपुर

भरोसा किस पर करें?

रणधीकपुर गांव के मुसलमानों ने ज़िलाधिकारी को आवेदन दिया है. बीबीसी से बात करते हुए दाहोद के ज़िलाधिकारी हर्षित गोसावी ने कहा, "हां, गांववालों की ओर से आवेदन मिला है. मैं उन्हें आश्वस्त करना चाहता हूं कि डरने जैसी कोई बात नहीं है."

ज़िलाधिकारी गोसावी ने बताया कि उन्होंने आवेदन देने वाले से ये भी पूछा कि क्या उन्हें किसी तरह की धमकी मिली है? जिसके जवाब में आवेदकों ने बताया कि उन्हें धमकी तो नहीं मिली है लेकिन वे डरे हुए हैं.

गोसावी ने कहा कि अगर उन्हें कोई धमका रहा है या ऐसा कुछ भी मामला है तो हमने उन्हें आश्वस्त किया है कि हम कार्रवाई करेंगे. उन्होंने बताया कि इस मामले पर इलाके के एसपी से चर्चा हो चुकी है.

इस इलाक़े में रात के समय पुलिस की तैनाती दिखाई देती है. लेकिन यहां रहने वाले अयूबभाई कहते हैं, "2002 में पुलिस के होते हुए भी हमारे घरों को जला दिया गया था, तो अब हम भरोसा किस पर करें?"

दोषियों की रिहाई पर नाराज़गी जताते हुए इक़बाल मोहम्मद कहते हैं, "जब देश आज़ादी के 75 साल पूरे होने का जश्न मना रहा था, तब बलात्कार के इस जघन्य अपराध के दोषियों को रिहा कर दिया गया."

वो आगे कहते हैं, "जब वे जेल से छूटकर आए तो गांव में जश्न मनाने के लिए पटाखे फोड़े गए. जिस तरह से हमारे घर बाहर आने का जश्न मनाया गया, उससे हम और डरे हुए हैं. विभिन्न समुदायों के क़ैदी देश की अलग-अलग जेलों में 20-30 साल से सज़ा काट रहे हैं फिर इस रेयर ऑफ़ द रेयरेस्ट मामले में दोषियों को रिहाई कैसे दी जा सकती है?"

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रणधीकपुर

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हिंदू-मुसलमान के बीच अविश्वास

रणधीकपुर में मौजूद एक मेडिकल स्टोर की दुकान पर काम कर रहे एक शख़्स से हमने बिलकिस बानो केस और दोषियों की रिहाई के बारे में सवाल किया तो उन्होंने कहा, "मैं इस दुकान पर हेल्पर का काम करता हूं. आप दुकान के मालिक से इस बारे में पूछ सकते हैं."

मुख्य बाज़ार में पान की दुकान चलाने वाले एक शख़्स ने कहा, "साल 2002 में मैं काफी छोटा था, मुझे इस बारे में नहीं पता."

साल 2002 में रणधीकपुर गांव में हुए दंगों के बाद से हिंदुओं और मुसलमानों के बीच पैदा हुए अविश्वास को महसूस किया जा सकता है. दोनों समुदायों के लोग रहते तो साथ-साथ ही हैं लेकिन अविश्वास महसूस होता है.

वे एक-दूसरे से व्यापार के माध्यम से जुड़े हुए दिखते हैं लेकिन उनके बीच मन का जुड़ाव नहीं दिखता. कई बार ये औपचारिकता साफ़ झलकती सी है.

बिलकिस बानो मामले में जो 11 लोग रिहा हुए हैं, उन्हें कोर्ट ने दोषी माना था और सज़ा सुनाई थी लेकिन रणधीकपुर और सिंहवाड़ा में एक वर्ग ऐसा भी है जो यह मानता है कि कुछ लोग निर्दोष हैं.

वीडियो कैप्शन, बिलकिस बानो के गांव से मुस्लिम परिवारों का पलायन

जेल से रिहा होकर आए इन दोषियों की रिहाई पर हुए स्वागत कार्यक्रम के बारे में जब हमने कुछ लोगों से पूछा तो दर्जी टीनाबेन ने कहा, "उनका स्वागत करने में ग़लत क्या है? वे निर्दोष थे."

रणधीकपुर के बाहरी इलाके में एक पेट्रोल पंप पर काम करने वाले युवक ने कहा, "उनमें से कुछ निर्दोष थे, अगर उनका स्वागत किया जाता है तो इसमें कुछ भी गलत नहीं है."

हमने युवक से पूछा कि वो कैसे निर्दोष हैं, जबकि अदालत ने उन्हें दोषी ठहराया है. युवक ने कहा कि कुछ लोगों सच में निर्दोष थे, उन्हें झूठा फंसाया गया था.

हमने जब रणधीकपुर गांव की महिला सरपंच से इस बारे में बात करने की कोशिश की तो उन्होंने बात करने से मना कर दिया.

2011 की जनगणना के मुताबिक रणधीकपुर गांव की जनसंख्या 3 हजार 177 थी, जो अब भले ही बढ़ गई हो लेकिन गांव बहुत छोटा दिखाई देता है.

रणधीकपुर और सिंगवाड़ में मुख्य रूप से आदिवासी, कोली और मुस्लिम समुदाय के लोग रहते हैं. ये लोग खेती, मजदूरी के साथ साथ छोटी दुकानें और व्यवसायों में लगे हुए हैं.

अयूब भाई
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बिलकिस बानो का घर

बिलकिस बानो के पिता का घर चुंदडी रोड के पास था, जो साल 2002 के दंगों में तबाह हो गया था. अब यहां पर रेडीमेड कपड़ा व्यापारी सुभाष भाई की दुकान है.

सुभाष भाई मूल रूप से राजस्थान के रहने वाले हैं. जब हम उनकी दुकान पर पहुंचे तो वे चाय-नाश्ते की जिद करने लगे.

सुभाष भाई ने कहा, "यह दुकान हमारे पास 2003-04 से किराए पर है. हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों के लोग हमारी दुकान से कपड़े खरीदने के लिए आते हैं."

सुभाष भाई का बिजनेस अच्छा चल रहा है. सड़क पर उनकी एक और दुकान है.

रणधीकपुर

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सजायाफ़्ता मंदिरों में जा रहे हैं

हमने जेल से रिहा हुए कुछ बिलकिस बानो गैंगरेप केस के कुछ दोषियों से संपर्क करने की कोशिश की लेकिन उन्होंने बात करने से इनकार कर दिया.

हमने स्थानीय पत्रकार की मदद से फोन पर राधेश्याम शाह से बात की. उन्होंने कहा, "मैं अभी इस मामले के बारे में कुछ नहीं कहना चाहता. अभी मैं राजस्थान में हूं और यहीं रहना चाहता हूं."

राधेश्याम शाह ने कहा, "मैं अपने जीवन में कभी भी पनिवेला इलाके (जहां बिलकिस बानो के साथ गैंगरेप हुआ था) की पहाड़ियों पर नहीं गया. मैं कहूंगा कि मैं निर्दोष हूं."

हम मामले में एक और दोषी गोविंद रावल के घर भी पहुंचे. उनके घर पहुंचे पर हमें कहा गया कि गोविंद घर पर नहीं हैं.

गोविंद के परिवार के एक सदस्य ने कहा, "उनकी इच्छा पूरी हो गई है और वे अलग अलग मंदिरों में दर्शन के लिए गए हैं."

परिवार के सदस्यों ने भी इस मामले पर बात करने से इनकार कर दिया.

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