बिलकिस मामला: दोषियों की रिहाई पर बीजेपी की चुप्पी और सियासी सवाल

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- Author, मयूरेश कुण्णूर
- पदनाम, बीबीसी मराठी
इस साल स्वतंत्रता दिवस के भाषण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत के लोगों से महिलाओं के प्रति अपना रवैया बदलने की गुज़ारिश की. उन्होंने कहा कि महिला सशक्तीकरण के लिए महिलाओं को इज़्ज़त देना बहुत ज़रूरी है. उन्होंने कहा, "नारी का गौरव राष्ट्र के सपने पूरे करने में बहुत बड़ी पूंजी बनने वाला है. ये सामर्थ्य मैं देख रहा हूं."
पीएम मोदी के इस बयान की बहुत तारीफ़ की गई और महिला आधिकारों के लिए इसे एक ठोस बयान बताया गया.
लेकिन इस बयान के कुछ ही देर बाद, उसी दिन बिलकिस बानो गैंगरेप मामले के 11 दोषियों को गुजरात सरकार की एक कमेटी ने गोधरा जेल से रिहा कर दिया. साल 2002 में गोधरा ट्रेन जलाए जाने के बाद ये केस काफ़ी चर्चा में था.
27 फ़रवरी 2002 को भीड़ ने बिलकिस बानो और उनके परिवार पर तब हमला किया था जब वो भाग रहे थे. उन्होंने बिलकिस का गैंगरेप किया और उनकी तीन साल की बेटी समेत परिवार के 14 लोगों की हत्या कर दी.
उस वक्त राज्य में बीजेपी की सरकार थी, अभी भी बीजेपी सत्ता में है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तब गुजरात के मुख्यमंत्री थे.
विपक्षी पार्टियों ने दोषियों की रिहाई को लेकर सरकार की काफ़ी आलोचना की है, लेकिन बीजेपी ने इस पर अभी तक कुछ नहीं कहा है, न गुजरात में और न ही केंद्र में.

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उम्रक़ैद की सज़ा काट रहे 11 दोषियों को छोड़ने के गुजरात सरकार के फ़ैसले की देशभर में आलोचना हो रही है.
सज़ायाफ़्ता दोषियों के जेल से बाहर आने के बाद माला और मिठाइयों से उनके स्वागत के वीडियो वायरल हो गए हैं जिनकी आलोचना हो रही है.
क़ानूनी, सामाजिक और राजनीतिक दृष्टिकोण से भी इस फ़ैसले की व्यापक रूप से निंदा की जा रही है.
6000 से अधिक प्रतिष्ठित नागरिकों ने भारत के मुख्य न्यायाधीश को क़दम उठाने और रिहाई को रद्द करने के लिए एक पत्र का मसौदा तैयार किया है.
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग से भी संपर्क किया जा रहा है. सुप्रीम कोर्ट ने भी रिहाई के ख़िलाफ़ डाली गई याचिकाओं पर सुनवाई की है और गुजरात तथा केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है.

क्या जान-बूझ कर चुप है सरकार?

दिल्ली में 2012 के निर्भया गैंगरेप की घटना के बाद हुए विरोध प्रदर्शन लोगों को अभी भी याद हैं. लेकिन बिलकिस बानो मामले में दोषियों की रिहाई पर सार्वजनिक रूप से कम ही आक्रोश नज़र आ रहा है. जानकार सत्तारूढ़ पार्टी की चुप्पी पर सवाल उठा रहे हैं.
बीबीसी ने गुजरात बीजेपी के प्रवक्ता यगनेश दवे से इस पर सवाल किया तो उन्होंने कहा, "हम इस मुद्दे पर कोई कॉमेंट नहीं करना चाहते." बीजेपी के राज्य और केंद्र का नेतृत्व इस मामले पर पूरी तरह से चुप है.
एकमात्र अपवाद महाराष्ट्र के उप-मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस हैं जिन्हें हाल ही में पार्टी की केंद्रीय चुनाव समिति में शामिल किया गया है. फडणवीस ने सदन में कहा, "दोषियों ने अपनी सज़ा काट ली है और सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद रिहाई की प्रक्रिया का पालन किया गया. लेकिन अभियुक्त या दोषी का सम्मान ग़लत है, इसे सही नहीं ठहराया जा सकता."
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आख़िर बीजेपी चुप क्यों है?

गुजरात सरकार के पैनल और बीजेपी की प्रतिक्रिया से पता चलता है कि वो राजनीतिक रूप से असहज स्थिति में है. माना जाता है कि धार्मिक ध्रुवीकरण से गुजरात और उसके बाहर बीजेपी को चुनावी फ़ायदा होता है. जानकार दोषियों को छोड़ने के समय को इस साल दिसंबर में होने वाले गुजरात विधानसभा चुनाव से जोड़ कर भी देख रहे हैं.
दिल्ली की वरिष्ठ राजनीतिक पत्रकार राधिका रामाशेषन कहती हैं, "पहली बार लगता है कि बीजेपी इस पूरे विवाद को लेकर रक्षात्मक हो गई है, उस फ़ैसले पर जो कार्यकारी आदेश के माध्यम से लिया गया है."
वो कहती हैं, "गुजरात के बाहर बिलकिस बानो मामले पर निश्चित रूप से आक्रोश है. निजी तौर पर मैंने गुजरात बीजेपी के जिन सूत्रों से बात की उनके मुताबिक़, ये मुद्दा सिर्फ़ गुजरात के बाहर बन रहा है, गुजरात में हम 2002 को पीछे रख आगे बढ़ना चाहते हैं. लेकिन कोई कुछ भी कहे 2002 को गुजरात या भारत में भुलाया नहीं जा सकता है. यह किसी न किसी तरह से सामने आएगा ही."

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सालों तक न्याय के लिए संघर्ष करने वाली बिलकिस गुजरात दंगों में अल्पसंख्यकों और महिलाओं के साथ होने वाले अत्याचारों का चेहरा बन गई थीं. ऐसा लगता है कि दो दशक बाद भी 'दंगे और ध्रुवीकरण' गुजरात की राजनीति को प्रभावित कर रहे हैं.
दिल्ली स्थित राजनीतिक पत्रकार अशोक वानखेड़े के मुताबिक़, "भले ही बीजेपी इसके बारे में एक शब्द भी नहीं बोल रही है, लेकिन वो इस तथ्य को नहीं छिपा सकती है कि सभी 11 दोषियों का हीरो की तरह स्वागत हुआ है. उस आयोजन के पीछे बीजेपी का हाथ था क्योंकि बीजेपी के समर्थन के बिना कोई भी ऐसा नहीं कर सकता. इसलिए ये गुजरात में हिंदुत्व कार्ड खेलने की एक रणनीति है. लेकिन केंद्र और राष्ट्रीय स्तर पर धर्मनिरपेक्ष छवि को बनाए रखने के लिए वे इसके बारे में सार्वजनिक रूप से नहीं बोलेंगे. कोई पार्टी का अधिकारी इसके बारे में बात नहीं करता है, लेकिन ज़मीन पर सब कुछ करता है, "

हिंदुत्व या कुछ और?

लेकिन क्या इन घटनाओं को हिंदुत्व और धार्मिक ध्रुवीकरण के नज़रिए से ही देखा जाना चाहिए ? अहमदाबाद के वरिष्ठ पत्रकार प्रशांत दयाल को भी लगता है कि फ़ैसला चुनाव को देखते लिया गया है.
दयाल कहते हैं, "जब आनंदीबेन पटेल 2014 में गुजरात की मुख्यमंत्री थीं तो उन्होंने महिलाओं से जुड़े किसी भी अपराध में रियायत नहीं देने का फ़ैसला किया था. उसके बाद ऐसे अपराधों में दोषी पाए गए वो लोग जो 20 साल से अधिक जेल में बिता चुके थे, उन्हें नहीं छोड़ा गया. लेकिन बिलकिस बानो मामले में, 1992 और 2014 दोनों के सर्कुलर को नज़रअंदाज करते हुए दोषियों को रिहा कर दिया गया. गुजरात की जेलों में आज महिला संबंधित अपराधों में लगभग 450 दोषी बंद हैं. उन सभी को रिहा किया जा सकता था. लेकिन ऐसा नहीं हुआ, सिर्फ़ इन 11 लोगों को छोड़ा गया.''

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लेकिन दयाल का मानना है कि इसके पीछे सिर्फ़ हिंदुत्व की राजनीति ही नहीं हैं, जाति से जुड़े स्थानीय कारण भी हैं. वो कहते हैं, "यह मामला गोधरा का है जो एक आदिवासी बहुल क्षेत्र है. बीजेपी को लगता है कि आदिवासी इलाके में उनकी ताक़त कमज़ोर हुई है. आदिवासी उनसे दूर जा रहे हैं. उस वोट बैंक को फिर से पाने के लिए इन्हें रिहा किया गया है."
दयाल के मुताबिक़, "इन 11 दोषियों में कुछ आदिवासी समुदाय से आते हैं. बीजेपी असुरक्षित महसूस कर रही है क्योंकि छोटू वसावा की पार्टी और आम आदमी पार्टी- दोनों ही अपनी पैठ बना रही हैं. कांग्रेस भी आदिवासी इलाके में आक्रामक तरीके से काम कर रही है. बीजेपी को लगता है कि अगर आदिवासी वोट चले गए तो उन्हें विधानसभा में 20 से 25 सीटों का नुक़सान हो सकता है."
दयाल के अनुसार, गुजरात की राजनीतिक लड़ाई में धार्मिक रेखाएं लंबे समय से तय हैं और बीजेपी को इसे फिर से परिभाषित करने के लिए बिलकिस मामले की ज़रूरत नहीं है.
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कांग्रेस की मजबूरियां और 'आप' की ख़ामोशी

कांग्रेस और 'आप' पर भी नज़रें हैं. कांग्रेस सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर बीजेपी पर लगातार हमले कर रही है.
राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री से सवाल पूछते हुए ट्वीट किया. "उन्नाव - भाजपा विधायक को बचाने के लिए क़दम उठाए. कठुआ - बलात्कारियों के पक्ष में रैली. हाथरस - बलात्कारियों के पक्ष में सरकार. गुजरात - बलात्कारियों की रिहाई और सम्मान. अपराधियों को समर्थन महिलाओं के प्रति बीजेपी की छोटी मानसिकता को दिखाता है. प्रधानमंत्री जी, क्या आपको ऐसी राजनीति पर शर्म नहीं आती है?"
लेकिन कई लोगों का मानना है कि सोशल मीडिया और प्रेस कॉन्फ़्रेंस में ग़ुस्सा ज़ाहिर करने के अलावा कांग्रेस ज़मीन पर रफ़्तार नहीं पकड़ पा रही है.
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रामाशेषन कहती हैं, "ऐसा लगता है कि 2002 के मुद्दे को उठाकर कांग्रेस अपना काफ़ी नुक़सान कर चुकी है. चुनाव के क़रीब क्या होता है, ये देखना दिलचस्प होगा. मान लीजिए कि कांग्रेस ऐसा एक बयान देती है जो बीजेपी के लिए हिंदुत्व का केंद्र में रास्ता साफ़ कर दे. हिंदुत्व गुजरात की राजनीति के बिल्कुल केंद्र में है."
दूसरी ओर, अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी, जो अब राज्य में बीजेपी का मुख्य विपक्ष होने का दावा करती है, वो भी चुप है. नरम हिंदुत्व का स्टैंड लेने के लिए कई बार इस पार्टी की आलोचना हो चुकी है.
रामाशेषन कहती हैं, "दिल्ली में 2020 में दंगे हुए थे और इस पर आम आदमी पार्टी ने कभी कोई स्टैंड नहीं लिया या एक शब्द नहीं कहा. 'आप' हिंदुत्व से संबंधित कोई भी स्टैंड न लेकर बहुत सावधानी बरतती है. बिलकिस बानो मामले में भी ऐसा ही है.
आम आदमी पार्टी ने गुजरात में विपक्ष के रूप में कांग्रेस की जगह ले ली है. उसे पता है कि हिंदुत्व के मामले में भाजपा से लड़कर कांग्रेस अपना काफ़ी नुक़सान कर चुकी है. इसलिए वो केवल विकास के मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करती है. यह एक स्पष्ट रणनीति है. आम आदमी पार्टी को शहरी मध्यम वर्ग का समर्थन हासिल है जो सांप्रदायिक मुद्दे को लेकर बहुत संवेदनशील है. इसलिए हिंदुत्व के मुद्दे पर केजरीवाल ख़ुद को दूर ही रखे हुए हैं."

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गुजरात के अलावा देश के अन्य हिस्सों में क्षेत्रीय और राष्ट्रीय राजनीति पर बिलकिस बानो के दोषियों को रिहा करने का मुद्दा चर्चा में है.
नागरिकता (संशोधन) अधिनियम के विरोध के बाद नूपुर शर्मा विवाद में सोशल मीडिया और सड़क दोनों ही जगह ध्रुवीकरण नज़र आ रहा था. गुजरात के बाद जल्द ही एक और बीजेपी शासित राज्य कर्नाटक में चुनाव होने वाले हैं.
इस साल की शुरुआत में हिजाब विवाद के बाद राज्य में ध्रुवीकरण का माहौल बन गया था. बिलकिस मामले पर राष्ट्रीय स्तर पर बहस इन हिस्सों में भी प्रभाव डाल सकती है. बिलकिस मामले पर चर्चा भले ही कम हो, राजनीति अपनी चरम पर है.
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