बिलकिस मामलाः दोषियों को ब्राह्मण बताने वाले बीजेपी विधायक राउलजी ने सफ़ाई दी?

विधायक सी के राउलजी

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    • Author, तेजस वैद्य
    • पदनाम, बीबीसी गुजराती
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गुजरात में बीजेपी के विधायक सीके राउलजी की एक टिप्पणी को लेकर विवाद खड़ा हो गया है. राउलजी उस समिति में शामिल थे जिसने बिलकिस बानो गैंगरेप मामले में सज़ा काट रहे 11 दोषियों की सज़ा माफ़ करने का फ़ैसला किया.

राउलजी ने एक ऑनलाइन न्यूज़ प्लेटफ़ॉर्म को दिए इंटरव्यू में ये टिप्पणी करते हुए कहा- "दोषी ब्राह्मण और संस्कारी थे. जेल में उनका व्यवहार अच्छा था."

इस टिप्पणी पर विवाद के बाद बीबीसी ने विधायक से बात की. क्या कहा उन्होंने? पढ़िये ये रिपोर्ट

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15 अगस्त, 2022 को बिलकिस बानो सामूहिक बलात्कार मामले के सभी 11 दोषियों की सज़ा माफ़ कर दी गई और वे जेल से बाहर आ गए.

ये सभी 2002 के गुजरात दंगों के दौरान बिलकिस बानो के परिवार के सदस्यों की हत्या और उनके साथ सामूहिक बलात्कार के आरोप में गोधरा जेल में उम्रकै़द की सज़ा काट रहे थे.

15 साल से अधिक जेल की सज़ा काटने के बाद, 11 दोषियों में से एक, राधेश्याम शाह ने सज़ा माफी के लिए सर्वोच्च न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया. सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात सरकार को मामले में निर्णय लेने का निर्देश दिया.

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद गुजरात सरकार ने एक कमेटी का गठन किया.

कमेटी ने सर्वसम्मति से सभी 11 दोषियों को सज़ा माफी देने का फ़ैसला किया और उनकी रिहाई की सिफ़ारिश की.

इस मामले में उम्रकै़द की सज़ा काट रहे सभी दोषियों को 15 अगस्त को जेल से रिहा कर दिया गया.

समिति में गोधरा के ज़िला कलेक्टर, ज़िला न्यायाधीश, गोधरा विधायक सीके राउलजी सहित अन्य सदस्य शामिल थे.

सीके राउलजी

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'माफ़ी नियम से दी गई'

सज़ा माफ़ी के फ़ैसले पर बीबीसी गुजराती से बात करते हुए, गुजरात के बीजेपी विधायक सीके राउलजी ने कहा, "14 साल की क़ैद के संदर्भ में, राज्य सरकार का एक नियम है जिसमें एक कै़दी जिसका जेल में अच्छे व्यवहार का रिकॉर्ड है, कैदी ने रचनात्मक कार्य किया है और उसके ख़िलाफ़ किसी भी तरह का विवाद न हो, उसकी सज़ा माफ़ की जा सकती है. उच्च न्यायालय और राज्य सरकार के दस्तावेज़ों के अनुसार इसके लिए एक नियम है.''

''नियम के अनुसार सभी दोषियों का व्यवहार अच्छा था. उन्हें जो भी सज़ा दी गई, उसे दोषियों ने झेला है. जेल के अंदर उनका व्यवहार अच्छा था. इतना ही नहीं उनका कोई आपराधिक रिकॉर्ड भी नहीं है. यह सब और सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों को ध्यान में रखते हुए समिति ने सर्वसम्मति से सभी अभियुक्तों को सज़ा माफ़ी देने का फ़ैसला किया. मेरे साथ ज़िला कलेक्टर, ज़िला न्यायाधीश और जेलर भी समिति का हिस्सा थे. जून से सितंबर 2022 के बीच कमेटी की चार बार बैठक हुई. सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात सरकार से इस मामले पर फ़ैसला लेने को कहा था. समिति ने सज़ा माफ़ी पर निर्णय लेते समय 1992 में जारी दिशा-निर्देशों का संदर्भ लिया."

जब बीबीसी ने राउलजी से पूछा कि सज़ा माफी को लेकर क्या समिति के सदस्यों के बीच कोई मतभेद था क्योंकि सभी 11 सामूहिक बलात्कार के मामले में दोषी हैं, तो उनका जवाब था, ''नहीं. किसी की अलग राय नहीं थी. सभी को लगा कि उन्हें मुक्त कर दिया जाना चाहिए."

यह पूछे जाने पर कि क्या सामूहिक बलात्कार के दोषी को जेल में उसके अच्छे व्यवहार के कारण जेल से रिहा किया जा सकता है, सी के राउलजी ने कहा, ''11 दोषियों में कुछ निर्दोष हैं, जो अपराध के समय घटनास्थल पर मौजूद नहीं थे. मुझे पता चला कि एक 'भट्ट' थे जो घटना के वक्त मौजूद ही नहीं थे."

लेकिन कोर्ट ने उन्हें दोषी पाया. सिर्फ़ इसलिए कि जेल में उनका अच्छा ट्रैक रिकॉर्ड है, क्या उन्हें छूट दी जा सकती है?

इस पर राउलजी कहते हैं, ''अदालत के कागज़ातों में गुण-दोषों की फिर से जांच की गई. उस पुन:परीक्षा के बाद मामला स्थानांतरित कर दिया गया था. जब घटना हुई तब केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी. उन्होंने केस को गुजरात से मुंबई ट्रांसफ़र कर दिया. तबादला एवं निर्णय पत्रों के आधार पर न्यायाधीश एवं कलेक्टर ने कहा कि इस मामले में नियमानुसार रिहाई की व्यवस्था की जा सकती है. जो कुछ हुआ वह नियम के अनुसार हुआ."

कै़दियों की रिहाई के संबंध में उन्होंने एक साक्षात्कार में कहा है कि वे ब्राह्मण थे और सभी के पास अच्छे संस्कार हैं.

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इस पर वे कहते हैं, ''हमने फ़ैसले लेते समय किसी की जाति नहीं देखी. मैंने ब्राह्मण के बारे में जो बताया वह समग्र रूप से जाति के संदर्भ में नहीं है. मैंने एक ब्राह्मण व्यक्ति के बारे में बात की है जो (बलात्कार) घटना के समय मौजूद नहीं था. हालांकि वह वहां नहीं था, लेकिन उस पर अपराध का आरोप लगाया गया था. यही मुझे पता चला.''

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