बिलकिस बानो गैंगरेप केस में क्या इंसाफ़ हो गया है?

बिलकिस बानो

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    • Author, राघवेंद्र राव
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

"ये फ़ैसला रेप के क़ानून का रेप होने जैसा है."

"अगर न्याय को ठीक से लागू नहीं किया जा सकता है, तो यह न्याय का मज़ाक़ बनाने जैसा है."

"इस फ़ैसले पर पहुँचने में दिमाग़ का इस्तेमाल नहीं किया गया है."

"ये एक मानवीय मामला है. इसका फ़ैसला किसी तकनीकी बिंदु के आधार पर नहीं किया जा सकता."

"इस फ़ैसले से रेप सर्वाइवर के लिए एक नया ख़तरा पैदा हो गया है."

बिलकिस बानो मामले में हाल ही में 11 सज़ायाफ़्ता मुजरिमों की सज़ा-माफ़ी के मामले पर ये प्रतिक्रियाएं भारतीय न्याय व्यवस्था में काम कर चुके कुछ वरिष्ठ सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की है.

कुछ ही दिन पहले 15 अगस्त को इन 11 दोषियों को गोधरा जेल से रिहा कर दिया गया. रिहा होने के बाद इन दोषियों को मिठाई खिलाने और उनका अभिनन्दन किए जाने की कई तस्वीरें सामने आईं.

ये 11 लोग साल 2002 के गुजरात दंगों के दौरान बिलकिस बानो के सामूहिक बलात्कार और उनके परिवार के सात सदस्यों की हत्या के मामले में उम्रक़ैद की सज़ा काट रहे थे. साल 2008 में मुंबई की एक विशेष सीबीआई अदालत ने इस मामले में इन 11 लोगों को उम्रक़ैद की सज़ा सुनाई थी. इस सज़ा को बाद में बॉम्बे हाई कोर्ट ने भी बरक़रार रखा था.

इन दोषियों की रिहाई का फ़ैसला गुजरात सरकार की बनाई गई एक समिति ने 'सर्वसम्मति' से लिया है.

बिलकिस बानो

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किस आधार पर लिया फ़ैसला?

इस फ़ैसले पर पहुँचने के लिए इस समिति ने गुजरात सरकार की 1992 की उस सज़ा-माफ़ी नीति को आधार बनाया है जिसमें किसी भी श्रेणी के दोषियों को रिहा करने पर कोई रोक नहीं थी.

साल 1992 की नीति को आधार बनाने की वजह ये थी कि इन दोषियों में से एक राधेश्याम भगवानदास शाह की सज़ा-माफ़ी की अर्ज़ी का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा और अपने फ़ैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सज़ा-माफ़ी पर विचार साल 1992 की नीति के आधार पर किया जाए क्योंकि अभियुक्तों को जिस समय सज़ा सुनाई गई थी उस समय 1992 की नीति लागू थी.

वहीं गुजरात सरकार ने साल 2014 में सज़ा-माफ़ी की एक नई नीति बनायी जिसमें कई श्रेणी के दोषियों की रिहाई पर रोक लगाने के प्रावधान हैं. इस नीति में कहा गया है कि बलात्कार और हत्या के लिए दोषी पाए गए लोगों को सज़ा-माफ़ी नहीं दी जायेगी.

इस नीति में ये भी कहा गया कि अगर किसी दोषी के मामले की जांच सीबीआई ने की है तो केंद्र सरकार की सहमति के बिना राज्य सरकार सज़ा-माफ़ी नहीं कर सकती. अगर सज़ा-माफ़ी के लिए इस समिति के प्रावधानों को आधार बनाया गया होता तो ये साफ़ है कि इस मामले के दोषियों को सज़ा-माफ़ी नहीं मिल सकती थी.

तो ये सवाल उठना लाज़मी है कि क्या इस मामले में 2014 की नीति के बजाय 1992 की नीति के आधार पर फ़ैसला लेना सही था?

एक और रहस्योद्घाटन ने इस सज़ा-माफ़ी पर विचार करने वाली समिति की निष्पक्षता पर सवाल उठा दिए हैं. दोषियों की रिहाई के बाद ये बात सामने आई है कि जिस समिति ने इन 11 दोषियों को सर्वसम्मति से रिहा करने का फ़ैसला लिया, उसके दो सदस्य भारतीय जनता पार्टी के विधायक हैं, एक सदस्य बीजेपी के पूर्व निगम पार्षद हैं और एक बीजेपी की महिला विंग की सदस्य हैं.

राधेश्याम शाह जिन्होंने रिहाई की अपील की थी

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दोषियों की रिहाई के कुछ वक़्त बाद इस कमिटी में रहे बीजेपी के गोधरा से विधायक सीके राउलजी का एक बयान आया जिसमें उन्होंने इन दोषियों के बारे में कहा कि "वैसे भी वो ब्राह्मण लोग थे, उनका संस्कार भी बड़ा अच्छा था" और "हो सकता है सज़ा करवाने के पीछे बद-इरादा हो."

सज़ा-माफ़ी के फ़ैसले पर बीबीसी गुजराती के तेजस वैद्य से बात करते हुए विधायक सीके राउलजी ने कहा कि समिति में "किसी की अलग राय नहीं थी" और "सभी को लगा कि उन्हें मुक्त कर दिया जाना चाहिए."

साथ ही उन्होंने कहा, "नियम के अनुसार सभी दोषियों का व्यवहार अच्छा था. उन्हें जो भी सज़ा दी गई, इन बेबस दोषियों ने उसे झेला है. जेल के अंदर उनका व्यवहार अच्छा था और इतना ही नहीं, उनका कोई आपराधिक रिकॉर्ड भी नहीं है".

तो क्या बिलकिस बानो मामले में न्याय हुआ?

इस पूरे घटनाक्रम को समझने के लिए हमने वरिष्ठ सेवानिवृत न्यायधीशों से बात की.

बिलकिस बानो को न्याय के लिए लंबी लड़ाई लड़नी पड़ी

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'ये फ़ैसला रेप के क़ानून का रेप होने जैसा है'

बीबीसी से बात करते हुए जम्मू और कश्मीर हाई कोर्ट के पूर्व चीफ़ जस्टिस बशीर अहमद ख़ान ने कहा कि इस मामले में "दोषियों की सज़ा-माफ़ी का फ़ैसला रेप के क़ानून का रेप होने जैसा है."

उनके मुताबिक़ ये फ़ैसला "दुर्भावनापूर्ण, अनुचित, प्रेरित, मनमाना और न्याय के सभी मानदंडों के विपरीत है."

जस्टिस बशीर अहमद ख़ान कहते हैं, "ये फ़ैसला बदनीयती से दिया गया है. यह एक पक्षपाती निर्णय है क्योंकि निर्णय लेने के लिए गठित समिति में एक ही राजनीतिक दल के लोग हैं और ऐसे सरकारी कर्मचारी शामिल हैं जो उस पार्टी की सत्ताधारी सरकार के अधीनस्थ हैं."

गुजरात सरकार ने कहा है कि इस मामले के दोषियों की सज़ा 1992 की नीति के आधार पर माफ़ की गई है.

इस पर जस्टिस बशीर अहमद ख़ान कहते हैं, "एक क़ानूनी प्रावधान की आप कई व्याख्याएं कर सकते हैं. उसमें ये भी कहा जा सकता है कि 1992 की पॉलिसी को देखा गया जो उस समय लागू थी जब अपराध हुआ था. दूसरा तर्क ये है कि जब सज़ा-माफ़ी का फ़ैसला लिया जा रहा है उस वक़्त जो पॉलिसी लागू है उसे देखा जाना चाहिए. मेरी नज़र में ये ऐसा मामला नहीं है जिसका फ़ैसला किसी तकनीकी बिंदु के आधार पर होना चाहिए. ये एक मानवीय मामला है. इस फ़ैसले से एक बार फिर पीड़ितों की जान को ख़तरा पैदा हो गया है. अब आप उनकी रक्षा कैसे करते हैं, यह सवाल है".

जस्टिस बशीर अहमद ख़ान कहते हैं कि गुजरात सरकार को एक ऐसी समिति बनानी चाहिए थी जो निष्पक्ष हो. "यह एक चौंकाने वाला फ़ैसला है. ये फ़ैसला लेकर आप ये तर्क दें कि ये 1992 की पॉलिसी के आधार पर लिया गया है, तो मेरी नज़र में यह बहुत ही बेतुका तर्क है."

याक़ूब रसूल, बिलकिस बानो के पति
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जस्टिस बशीर कहते हैं, "निर्भया मामले के बाद क़ानून को और सख़्त बनाया गया और बलात्कार को लेकर जो वर्तमान सोच है उसके हिसाब से भी ये एक उचित निर्णय नहीं है और ये मानवीय तक़ाज़ों को पूरा नहीं करता है."

उनके मुताबिक़ इस सज़ा-माफ़ी पर विचार करते हुए ये देखा जाना चाहिए था कि क्या ऐसे फ़ैसले से पीड़ितों के साथ इंसाफ़ किया जा रहा है? "यह निर्णय भेदभावपूर्ण और दुर्भावनापूर्ण है. ये फ़ैसला मनमाना इसलिए है क्योंकि ये पीड़ितों के पीठ पीछे लिया गया है जिसकी वजह से उनके लिए एक नया ख़तरा पैदा हो गया है. अच्छा ये होता कि फ़ैसला लेने से पहले पीड़ितों की बात सुनी जाती."

जस्टिस बशीर अहमद ख़ान कहते हैं कि महत्वपूर्ण बात यह है कि ये फ़ैसला इंसाफ़ के हित में किया गया फ़ैसला नहीं है. वो कहते हैं, "अगर कोई समझदारी बची है, तो केंद्र सरकार को हस्तक्षेप करना चाहिए और इस फ़ैसले को रद्द करना चाहिए."

अपने परिवार के साथ बिलकिस

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'दिमाग़ का इस्तेमाल नहीं किया गया'

दिल्ली हाई कोर्ट से सेवानिवृत न्यायाधीश जस्टिस आरएस सोढ़ी इस फ़ैसले को मनमाना बताते हुए कहते हैं कि "सवाल ये है कि सज़ा-माफ़ी पर विचार करते वक़्त किन बातों पर विचार किया गया."

वो कहते हैं, "14 साल जेल में बिताने से आपको केवल सज़ा-माफ़ी के लिए आवेदन करने का अधिकार मिलता है, यह आपको छूट पाने का अधिकार नहीं देता है. सज़ा-माफ़ी मनमाने ढंग से नहीं हो सकती. इस हिसाब से तो क्या बलात्कार के दोषी सभी लोग रिहाई के हक़दार हैं? अगर न्याय को ठीक से लागू नहीं किया जा सकता है, तो यह न्याय का मज़ाक़ है."

जस्टिस सोढ़ी ने ये भी इशारा किया कि इस मामले में 'पक्षपात की बू आ रही है.' साथ ही वो कहते हैं, "ये फ़ैसला बिल्कुल मनमाना है और साफ़ है कि इसमें दिमाग़ का इस्तेमाल नहीं किया गया है. उन्हें अपना दिमाग़ लगाना चाहिए था. जब एक नीति है कि बलात्कारियों को सज़ा-माफ़ी नहीं दी जाती है, फिर भी उन्होंने बलात्कार के दोषियों को रिहा करने का फ़ैसला किया है."

बिलकिस बानो मामले के दोषी राधेश्याम शाम

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1992 या 2014: कि नीति को देखा जाना चाहिए था?

इस मामले में बहस का बड़ा विषय ये बनकर उभरा है कि सज़ा-माफ़ी पर विचार करते हुए किस साल की नीति को देखा जाना चाहिए था: 1992 की या 2014 की?

दिल्ली हाई कोर्ट से सेवानिवृत न्यायाधीश जस्टिस एस एन ढींगरा कहते हैं, "जब सज़ा-माफ़ी पर विचार किया जाता है तो वर्तमान में लागू नीति के आधार पर फ़ैसला किया जाता है. सज़ा-माफ़ी के समय पर जो पॉलिसी लागू है, आप वही देखेंगे न? जो पॉलिसी अपराध होने के वक़्त लागू थी, उसे नहीं देखा जाता".

वो कहते हैं, "मेरा मानना है कि अगर आप आज सज़ा-माफ़ी कर रहे हैं तो आप 20 या 30 साल पहले की ऐसी पॉलिसी को आधार नहीं बना सकते जो रद्द हो चुकी है. जो पॉलिसी एक बार निरस्त हो जाती है वो फिर लागू नहीं होती. जो नवीनतम पॉलिसी है वही लागू होनी चाहिए, मेरी ये राय है."

इलाहाबाद हाई कोर्ट से सेवानिवृत न्यायाधीश जस्टिस गिरिधर मालवीय कहते हैं, "हमेशा से ऐसा रहा है कि बाद में लागू की गई नीति को वरीयता दी जाती है और पुरानी नीति को अनदेखा कर दिया जाता है".

वो कहते हैं, "इस मामले में उसी पॉलिसी को देखा जाना चाहिए था जो आज लागू है. तो 2014 की पॉलिसी लागू होगी न कि 1992 की."

बिलकिस बानो

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'स्थापित कानून के मुताबिक़ 1992 की नीति को आधार बनाना सही'

इस मामले में 11 दोषियों में से एक राधेश्याम भगवानदास शाह ने सज़ा-माफ़ी के लिए आवेदन किया था.

राधेश्याम भगवानदास शाह के वकील ऋषि मल्होत्रा से बीबीसी ने बात की.

ऋषि मल्होत्रा कहते हैं, "साल 2008 में जब सज़ा सुनाई गई तब 2014 की सज़ा-माफ़ी की नीति का जन्म भी नहीं हुआ था. साल 2003 के बाद से सुप्रीम कोर्ट कई मामलों में लगातार ये मानता रहा है कि जो नीति एक ट्रायल कोर्ट द्वारा कन्विक्शन के समय लागू होती है उस नीति को ही सज़ा-माफ़ी पर विचार करते समय लागू करने की ज़रूरत होती है, न कि किसी ऐसी नीति की जो कन्विक्शन के बाद बनी हो. ये एक स्थापित क़ानून है जिसे सुप्रीम कोर्ट ने इस फ़ैसले में दोहराया है."

क़ानूनी हलक़ों में इस बात पर भी बहस चल रही है कि क्या इस मामले में दोषियों की सज़ा-माफ़ी पर विचार करते हुए गुजरात की 2014 की नीति को नहीं देखा जाना चाहिए था?

ऋषि मल्होत्रा कहते हैं, "ये तर्क सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसलों के बिल्कुल विपरीत है. इस बारे में हरियाणा राज्य बनाम जगदीश मामले में तीन-न्यायाधीशों की पीठ का फ़ैसला है जिसका सुप्रीम कोर्ट ने लगातार पालन किया है. उस पर कोई विवाद नहीं है."

वीडियो कैप्शन, बिलकिस बानोः गैंगरेप के आरोपियों की रिहाई पर क्या बोला परिवार

'कमिटी पर पक्षपात का आरोप बेतुका'

इन दोषियों की सज़ा-माफ़ी पर विचार करने के लिए गुजरात में जो जेल समिति बनी उस पर लग रहे पक्षपात के आरोपों पर ऋषि मल्होत्रा कहते हैं, "यह बेतुकी बात है. जेल सलाहकार समिति में ज़िलाधिकारी, एक सत्र न्यायाधीश, तीन समाजसेवी, दो विधायक और जेल अधीक्षक सहित कुल 10 सदस्य थे. ये 10 सदस्य इस मुद्दे पर फ़ैसला कर रहे थे. सिर्फ़ ये कहना काफ़ी नहीं है कि इस समिति में भाजपा के दो सदस्य थे क्योंकि इस समिति में दो-तीन न्यायाधीश भी बैठे थे. क्या हम डीएम या सत्र न्यायाधीश की बुद्धिमत्ता पर सवाल उठा रहे हैं?"

वकील ऋषि मल्होत्रा के मुताबिक़ इस समिति के सभी सदस्यों ने 1992 की नीति की समीक्षा के बाद एक सचेत निर्णय लिया और ये भी देखा कि दोषी 15 साल से अधिक की सज़ा काट चुके थे.

वो कहते हैं, "ऐसा नहीं है कि दो लोगों ने पिछले दरवाज़े से फ़ैसला किया है. दस-सदस्यीय कमेटी ने फ़ैसला किया है."

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'जब मौत की सज़ा नहीं हुई तब कोई हो-हल्ला क्यों नहीं हुआ?'

ऋषि मल्होत्रा का कहना है कि ये पूरा विवाद राजनीति से जुड़ा हुआ लगता है.

वो कहते हैं, "इस मामले में दोषियों को लेकर काफ़ी हो-हल्ला हो चुका है. जब ट्रायल कोर्ट ने इन आरोपियों को उम्रक़ैद की सज़ा सुनाई थी तब सीबीआई ने हाईकोर्ट में अपील दायर कर मौत की सज़ा की माँग की थी. इसे बर्खास्त कर दिया गया था. अंतत: सुप्रीम कोर्ट ने भी आजीवन कारावास को बरक़रार रखा. तो उस समय यह शोर क्यों नहीं था कि इन दोषियों को मौत की सज़ा मिलनी चाहिए थी? उस वक़्त सब चुप क्यों रहे? अब जब उन्होंने 15 साल की सज़ा काट ली है तो हंगामा क्यों हो रहा है? यह हो-हल्ला तब होना चाहिए था जब हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने मौत की सज़ा नहीं सुनाई थी."

उनका कहना है कि इस मामले पर हो रहा हो-हल्ला "जजों पर दबाव डालने जैसा है."

वे कहते हैं, "क्या वे सुप्रीम कोर्ट के जज की बुद्धिमता पर सवाल उठा रहे हैं कि उन्हें क़ानून की जानकारी नहीं है या उन्होंने दोनों नीतियों को नहीं देखा है?"

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