सेमीकंडक्टर का सूरमा बनने की चाहत, क्या भारत के पास है ये ताक़त?

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    • Author, दीपक मंडल
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

मोबाइल से पेमेंट करते, गाड़ी चलाते या फिर फ्लाइट से चंद घंटों में हज़ारों किलोमीटर की दूरियां नापते हुए हमें शायद ही इस आधे इंच की चीज़ का ख़याल आता है. लेकिन तेज़ी से डिजिटल होती हमारी दुनिया में हर तरफ इसका ही दखल है. लैपटॉप से लेकर फिटनेस बैंड तक और महीन कंप्यूटिंग मशीन से लेकर मिसाइल तक में आज एक ही चीज धड़क रही है- दुनिया इसे सेमीकंडक्टर या माइक्रोचिप कहती है.

सिलिकॉन से बनी इस बेहद छोटी चिप की अहमियत का अहसास तब होता है, जब दुनिया भर में गाड़ियों का प्रोडक्शन थम जाता है, मोबाइल, लैपटॉप, टैबलेट महंगे हो जाते हैं, डेटा सेंटर डगमगाने लगते हैं, घरेलू अप्लायंस के दाम आसमान छूने लगते हैं, नए एटीएम लगने बंद हो जाते हैं और अस्पतालों में ज़िंदगी बचाने वाली टेस्टिंग मशीनों का आयात रुक जाता है.

कोविड के उफान के दिनों में जब इन सेमीकंडक्टर्स या माइक्रोचिप्स की सप्लाई धीमी हो गई थी तो दुनिया भर के लगभग 169 उद्योगों में हड़कंप मच गया था. दिग्गज कंपनियों के अरबों डॉलरों का नुकसान उठाना पड़ा था. चीन, अमेरिका और ताइवान जैसे माइक्रोचिप्स के सबसे बड़े निर्यातक देशों की कंपनियों को भी प्रोडक्शन रोकना पड़ा था.

इसी महीने (मई 2022) कार बनाने वाली भारत की सबसे बड़ी कंपनी मारुति सुज़ुकी ने बताया कि सेमीकंडक्टर की कमी से अप्रैल महीने में उसे डेढ़ लाख कारें कम बनानी पड़ीं.

'न्यू ऑयल' है सेमीकंडक्टर

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रुस और यूक्रेन की जंग ने इस संकट को और गहरा कर दिया है क्योंकि रूस सेमीकंडक्टर माइक्रोचिप्स बनाने में इस्तेमाल होने वाली धातु पैलेडियम का सबसे बड़े सप्लायरों में शुमार है, जबकि यूक्रेन नियोन गैस के सबसे बड़े सप्लायरों में से एक है. सेमीकंडक्टर को 'न्यू ऑयल' कहा जा रहा है. भारत डिजिटलाइजेशन के हाई वे पर दौड़ रहा है लेकिन इसके लिए ज़रूरी 'ऑयल' बाहर से मंगाया जाता है.

भारत में तेज़ डिजिटलाइज़ेशन का दौर है. लिहाजा माइक्रोचिप्स की मांग भी तूफ़ानी रफ्तार से बढ़ रही है.

प्रधानमंत्री मोदी ने सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री के निवेशकों को आमंत्रित करते हुए कहा, '' भारत में 2026 तक 80 अरब डॉलर के सेमीकंडक्टर की खपत होने लगेगी और 2030 तक ये आंकड़ा 110 अरब डॉलर तक पहुंच जाएगा. ''

भारत की विडंबना ये है कि दुनिया की लगभग सभी नामी-गिरामी चिप कंपनियों के यहां डिज़ाइन और आरएंडडी सेंटर हैं. लेकिन चिप बनाने वाले फैब्रिकेशन प्लांट या फैब यूनिट नहीं हैं.

भारत के इंजीनियर इंटेल, टीएसएमसी और माइक्रोन जैसी दिग्गज चिप कंपनियों के लिए चिप डिज़ाइन करते हैं. सेमीकंडक्टर प्रोडक्ट की पैकेजिंग और टेस्टिंग भी होती है. लेकिन चिप बनाए जाते हैं अमेरिका, ताइवान, चीन और यूरोपीय देशों में.

चिप्स बनाने वाली फैब्रिकेशन प्लांट यानी फैब यूनिट्स (इक्का-दुक्का कंपनियों को छोड़ कर) का यहां न होना भारत के सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन की सबसे कमज़ोर कड़ी है.

भारत का सेमीकंडक्टर मिशन

नरेंद्र मोदी

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इलेक्ट्रॉनिक्स गैजेट के एक बड़े उपभोक्ता देश के तौर पर उभर रहे भारत के लिए माइक्रोचिप के लिए पूरी तरह आयात पर निर्भरता कम चिंताजनक नहीं है.

देश में पेट्रोल और गोल्ड के बाद सबसे ज़्यादा आयात इलेक्ट्रॉनिक्स का होता है. फरवरी 2021 से अप्रैल 2022 के बीच इसके 550 अरब डॉलर के आयात बिल में अकेले इलेक्ट्रॉनिक्स आइटम की हिस्सेदारी 62.7 अरब डॉलर की थी.

इसमें से लगभग 15 अरब डॉलर यानी 1.20 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का आयात सिर्फ सेमीकंडक्टर का ही होता है.

भारत के विदेशी मुद्रा भंडार के लिए ये एक बड़ा बोझ है, जो पहले ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल और गैस के बढ़ते दाम की वजह से भारी दबाव में है.

लिहाजा भारत सेमीकंडक्टर के मामले में अब पूरी तरह आत्मनिर्भर बनने की कोशिश में लग गया है.

मोदी सरकार सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन का एक हिस्सा ( जैसे चिप डिज़ाइन) भर बन कर संतुष्ट नहीं है. वो देश में पूरा सेमीकंडक्टर इको-सिस्टम खड़ा करना चाहती है.

लेकिन बड़ा सवाल ये है कि क्या भारत के पास अपने सेमीकंडक्टर मिशन को पूरा करने की क्षमता है?

अश्विनी वैष्णव

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बेंगलुरू में हाल में हुए सेमीकंडक्टर कॉन्फ्रेंस सेमीकॉन में इंटेल, माइक्रोन, ग्लोबल फाउंड्रीज, टीएसएमसी और केडेंस जैसी दिग्गज चिप कंपनियां मौजूद थीं.

सबने माना कि भारत में एक ग्लोबल चिप पावरहाउस बनने की क्षमता है. लेकिन अभी तक इनमें से किसी भी कंपनी ने यहां निवेश का औपचारिक एलान नहीं किया है.

माइक्रो चिप की बढ़ती अहमियत और इसकी कमी को देखते हुए पूरी दुनिया में इस वक्त ग्लोबल चिप कंपनियों को इंसेंटिव देने की होड़ मची है.

अमेरिका ने 52 अरब डॉलर के इंसेंटिव का एलान है. पिछले साल इसने तीन साल में 55 से 65 अरब डॉलर के इंसेंटिव देने का एलान किया.

चीन 2025 तक 150 अरब डॉलर और यूरोपीय संघ 20 से 35 अरब डॉलर का इंसेंटिव देगा.

ऐसे में भारत का 10 अरब डॉलर का इंसेंटिव कहां टिकता है? इस साल ग्लोबल चिप कंपनियां लगभग 150 अरब डॉलर का निवेश कर रही हैं. इन्सेंटिव के इन आंकड़ों से आप अंदाजा लगा सकते हैं कि ये कंपनियां कहां पैसा लगाएंगीं.

भारत रेस में नया खिलाड़ी

राजीव चंद्रशेखर

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भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स और आईटी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने हाल में बेंगलुरू में हुए सेमीकंडक्टर कॉन्फ्रेंस में माना कि सेमीकंडक्टर इको-सिस्टम 100 मीटर की रेस नहीं एक मैराथन है. भारत का 10 अरब डॉलर का इन्सेंटिव कोई कम नहीं है.

एक ऐसे देश के लिए जो इस मैराथन में देर से शामिल हो रहा है और जिसमें कई दिग्गज दौड़ने वाले पहले से मौजूद हों, उसके लिए ये अच्छी शुरुआत है.

सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग के लिए अरबों डॉलर के निवेश के भारी-भरकम निवेश, प्राकृतिक संसाधन और बेहद कुशल मैनपावर की जरूरत है.

भारत इन तीनों मोर्चों पर कमजोर दिख रहा है. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या भारत इन तीनों चुनौतियों से निपटते हुए खुद को एक सेमीकंडक्टर ताकत के तौर पर खड़ा कर पाएगा?

बीबीसी हिंदी के इस सवाल पर इंडियन इलेक्ट्रॉनिक्स एंड सेमीकंडक्टर एसोसिएशन के सलाहकार डॉक्टर सत्या गुप्ता कहते हैं, '' देखिये, चुनौतियाँ हैं. हमने पहले भी देश में सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग की एक-दो कोशिश की हैं. लेकिन वे नाकाम रही हैं. लेकिन इस बार काफी सोच-समझ कर प्लान तैयार किया गया है. राजनीतिक नेतृत्व का पूरा समर्थन है. सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग, प्रोडक्ट, स्किलिंग और टैलेंट यानी सभी पहलुओं को ध्यान में रख कर प्लान बनाया गया है.''

डॉ. गुप्ता आगे कहते हैं, '' भारत के सेमीकंडक्टर प्लान को लेकर दुनिया भर के निवेशकों में उत्सुकता और दिलचस्पी है. भारतीय निवेशकों में भी उत्साह है. अहम बात ये है कि भारत पीएलआई स्कीम के तहत सेमीकंडक्टर सेक्टर के लिए जो इन्सेंटिव दे रहा है और वो दूसरे देशों की तुलना में काफी अच्छा है. मैं तो कहूंगा कि भारत का इन्सेंटिव दुनिया में इस समय दिए जा रहे सबसे अच्छे ऑफ़रों में से एक है. ''

क्षमता और चुनौतियों का फासला

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लेकिन पिछले साल सेमीकंडक्टर मिशन के एलान के बाद से ही भारत की सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग क्षमताओं पर सवाल उठाए जा रहे हैं. इसके जवाब में गुप्ता कहते हैं, '' देखिए, भारत का सेमीकंडक्टर का मार्केट बहुत बड़ा है. अगले पांच साल में हमारी सेमीकंडक्टर खपत बढ़ कर 100 अरब डॉलर तक की हो जाएगी. हम 10 अरब डॉलर का निवेश कर रहे हैं. कंपनियां भी निवेश कर रही हैं. हमें लग रहा है कि इन्हें मिला कर ये निवेश 25 अरब डॉलर तक पहुंच जाएगा. सरकार को निवेश के पांच प्रस्ताव मिल चुके हैं. "

इलेक्ट्रॉनिक्स और आईटी मंत्री अश्विनी वैष्णव का कहना है कि अगले साल मई जून में देश में पहली सेमीकंडक्टर फैब यूनिट तैयार हो जाएगी.

अबु धाबी की कंपनी ऑर्बिट वेंचर्स और इसराइल की टावर सेमीकंडक्टर के नेतृत्व वाली इंटरनेशनल सेमीकंडक्टर कंसोर्टियम कर्नाटक के मैसूर में 3 अरब डॉलर का सेमीकंडक्टर लगाएगी.

सेमीकंडक्टर की फैब यूनिट लगाने और मैन्युफैक्चरिंग शुरू करने में चार-पांच साल लग जाते हैं. इसके अलावा मेटल कंपनी वेदांता ने 20 अरब डॉलर का निवेश का लक्ष्य रखा है.

भारत में पहले भी फैब यूनिट लगाने की कोशिश हुई, लेकिन ये नाकाम रहीं. इस बार सेमीकंडक्टर प्लांट लगाने कीड सरकार की कोशिश में नया क्या है?

देश की शीर्ष आईटी कंपनी एचसीएल टेक्नोलॉजिज़ के फाउंडर रहे अजय चौधरी इस सवाल पर कहते हैं, '' पहले की स्कीमों में सरकार की ओर से 20 से 30 फीसदी तक इन्सेंटिव मिल रहा था. लेकिन मौजूदा स्कीम में शुरू में ही सरकार 50 फीसदी तक बेनिफिट दे रही हैं. इससे निवेशकों को काफी सहूलियत होगी."

डॉ अजय चौधरी

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चौधरी आगे कहते हैं, '' फिलहाल भारत में दो तरह से सेमीकंडक्टर प्लांट लगेंगे. सिलिकन फैब यूनिट और कंपाउंड सेमीकंडक्टर प्लांट. सिलिकन फैब प्लांट बनने में तीन-चार साल लगेंगे लेकिन कंपाउंड सेमीकंडक्टर प्लांट तो अगले साल तक तैयार हो सकते हैं. ''

भरत में जिस तेज़ी से सेमीकंडक्टर की मांग बढ़ रही है. अगले कुछ साल में भारत का सेमीकंडक्टर बाज़ार 80 से 100 अरब डॉलर तक पहुँच जाएगा.

देश में सेमीकंडक्टर की खपत की एक मिसाल देते हुए अजय चौधरी कहते हैं, '' भारत में हर साल 70 करोड़ एलईडी बल्ब बनते हैं. उसमें एक ड्राइवर चिप लगती है. ये पूरी चिप चीन से मंगाई जाती है. अगले कुछ साल में एलईडी बल्ब की खपत एक अरब का आँकड़ा पार कर लेगी. इससे आप यहां चिप की खपत का अंदाजा लगा सकते हैं.''

अजय चौधरी करते हैं, '' जैसे-जैसे हमारे यहां इलेक्ट्रॉनिक्स की खपत बढ़ेगी, चिप की अहमियत भी बढ़ेगी. हमें इलेक्ट्रॉनिक्स, टैबलेट, लैपटॉप वगैरह की खपत भी बढ़ानी होगी. एजुकेशन सेक्टर में टैबलेट की काफी अहमियत है. ये टैबलेट चीन, ताइवान जैसे देशों से बन कर आते हैं. अगर हम यहां इन्हें बनाने लगें तो हमारी काफी विदेशी मुद्रा बच सकती है. साथ ही हम सेमीकंडक्टर क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ेंगे. ''

सेमीकंडक्टर इको-सिस्टम खड़ा करने के लिए जिस बड़े पैमाने पर निवेश, वक्त और प्राकृतिक संसाधन लगते हैं, उसमें भारत की कमज़ोरियों को देखते हुए कई विश्लेषक सरकार को ये सलाह देने में लगे हैं कि वह पूरी सप्लाई चेन के बजाय किसी एक हिस्से पर फोकस करे.

चिप डिज़ाइनिंग बनाम मैन्युफैक्चरिंग

डॉ. गुप्ता

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अमेरिका के इलिनॉय यूनिवर्सिटी में इलेक्ट्रिकल और कंप्यूटर इंजीनियरिंग के प्रोफेसर और '' रिलक्टेंट टेक्नोफाइल्स : इंडियाज कॉम्पलिकेटेड रिलेशनशिप विद टेक्नोलॉजी'' के लेखक राकेश कुमार का मानना है कि भारत को चिप मैन्युफैक्चरिंग की मरीचिका के पीछे भागने के बजाय चिप डिजाइन करने की अपनी ताकत पर फोकस करना चाहिए.

भारतीय कंपनियां फिलहाल थर्ड पार्टी के लिए लो-एंड चिप डिज़ाइन कर रही हैं. भारत में हर साल 2000 चिप डिजाइन होते हैं और इसके डिज़ाइन और वेरिफिकेशन में 20 हज़ार इंजीनियर लगे हैं. ''

कुमार कहते हैं, '' पूरी चिप सप्लाई चेन के रेवेन्यू में चिप डिजाइनिंग, असेंबलिंग, टेस्टिंग, पैकेजिंग और मार्किंग की 50 फीसदी हिस्सेदारी है. भारत को इसराइल की तरह इसी पर फोकस करना चाहिए. ''

'फॉर्च्यून इंडिया' के लिए लिखे एक लेख में वह कहते हैं, '' चिप राष्ट्रवाद के चक्कर में भारत पहले भी अपना बहुत सारा पैसा, वक्त और फोकस खो चुका है. भारत को इस तरह के जोखिम में दोबारा फंसने से बचना चाहिए. सेमीकंडक्टर जंग में उसे सिर्फ उन मोर्चों पर फोकस करना चाहिए, जहां वो जीत सके. ''

लेकिन डॉ. सत्या गुप्ता और डॉ. अजय चौधरी दोनों कुमार की इस राय से इत्तेफाक नहीं रखते. दोनों का कहना है कि इस बार भारत की प्रतिबद्धता इस मामले में काफी ऊंची है. सेमीकंडक्टर मिशन की रणनीति काफी सोच-समझ कर बनाई गई है. भारत सेमीकंडक्टर कंपनियों को दुनिया में सबसे अच्छा इन्सेंटिव दे रहा है. भारत के पास टैलेंट है और संसाधन की भी कमी नहीं है. भारत में दुनिया का सबसे बड़ी रिफाइनरी लग सकती है. सबसे बड़ा सोलर प्लांट बना सकता है तो सेमीकंडक्टर प्लांट क्यों नहीं. ''

वीडियो कैप्शन, दुनिया भर में कारों की कीमतें बढ़ने की वजह

डॉ. गुप्ता कहते हैं, '' मैं पिछले लगभग 20 साल से सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री से जुड़ा हुआ हैं. लेकिन इस बार भारत सेमीकंडक्टर मिशन को लेकर जिस तरह की प्रतिबद्धता और तैयारी दिखा रहा है, वैसा पहले कभी नहीं दिखा था.''

डॉ. सत्या गुप्ता सिर्फ चिप डिजाइनिंग , टेस्टिंग, असेंबलिंग और मार्किंग की रणनीति को खारिज करते हुए कहते हैं, '' भारत को सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन के लिए इन्फ्रास्ट्रक्चर की कमी नहीं होगी. मैन्युफैक्चरिंग के लिए हमारे पास न पानी की कमी होगी और न गैस की और न मशीनरी की. हम लगभग 25 अरब डॉलर खर्च करने जा रहे हैं. ''

वो कहते हैं, '' दुनिया के छोटे-छोटे देश भी फैब यूनिट लगाने पर काम कर रहे हैं. ये बिल्कुल सही वक्त है फैब यूनिट लगाने का. हमें सारी चीजें एक साथ करनी चाहिए मैन्युफैक्चरिंग से लेकर असेंबलिंग, टेस्टिंग, पैकेजिंग से लेकर मार्किंग तक. वरना हम काफी पिछड़ जाएंगे.भारत इसे मिशन मोड में लेकर चल रहा है. हमने जिस तरह की रणनीति बनाई है उसमें अगले तीन-चार साल में नतीजे दिखने लगेंगे ''

सही शुरुआत की दरकार

सैमसंग

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भारत में इंटरनेट और मोबाइल क्रांति के बाद डिजिटलाइजेशन ने ज़बरदस्त रफ्तार पकड़ी है.

मोदी सरकार के पहले दौर में जनधन-आधार-मोबाइल ( जैम) और दूसरे दौर में डाइरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर ( लोगों को सरकार की ओर से दी जाने वाली सब्सिडी और नकद सहायता) की कामयाबी में देश के डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर ने बड़ी भूमिका निभाई है.

यूपीआई इसका एक बड़ा उदाहरण. इसे दुनिया की बेहतरीन डिजिटल पेमेंट इन्फ्रास्ट्रक्चर में शुमार किया जाता है. इसे भारत की डिजिटल क्रांति के शानदार उदाहरण के तौर पर पेश किया जा रहा है.

लिहाजा सरकार के नीति-निर्माताओं में सेमीकंडक्टर मिशन को अंजाम तक पहुंचाने का पूरा उत्साह दिख रहा है.

हालांकि सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन की एक बड़ी ताकत बनने के भारत के सपने में चुनौतियां भी कम नहीं हैं. सेमीकंडक्टर के दिग्गज देशों ने बड़ी चिप मेकर्स कंपनियों को इन्सेंटिव देने के लिए जिस तरह से अपना ख़ज़ाना खोल दिया है, उसमें भारत जैसे नए खिलाड़ी के लिए खेल और मुश्किल हो गया है.

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