रूस-यूक्रेन जंग से भागी गर्भवती मां अपने बच्चे को बुलाएंगी 'गंगा'

- Author, दिव्या आर्य
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, पोलैंड से लौटकर
"डर था कि कहीं रास्ते में लेबर पेन ना शुरू हो जाए पर जंग से भी निकलना ज़रूरी था. ये हमारा पहला बच्चा है. हमने बहुत सपने देखे हैं. मैं बस इसे बचाना चाहती थी, इसीलिए इतना खतरा मोल लिया."
राजधानी कीएव में रह रहीं नीतू की प्रेग्नेन्सी का नवां महीना शुरू हो गया था जब रूस ने यूक्रेन पर हमला कर दिया.
ज़िंदगी एकदम खुशहाल चल रही थी. चार साल से यूक्रेन में रह रहे उनके पति अभिजीत एक छोटी सी फास्ट फूड शॉप चलाने लगे थे.
पति-पत्नी ने अपने होनेवाले बच्चे की ज़रूरत का सारा सामान जुटाया था. छोटे-छोटे कपड़े, खिलौने, डायपर और वो सब कुछ जो बच्चे के पैदा होने के फौरन बाद चाहिए.
जंग छिड़ने पर वो सब बदल गया. पांच दिन तक वो अपने अपार्टमेंट के नीचे के बंकर में रहे.

नीतू बताती हैं, "नवां महीना होने की वजह से मुझे बार-बार टॉयलेट जाने की ज़रूरत पड़ती, कितनी ही बार वो ऊंची-ऊंची सीढ़ी चढ़कर डरते-डरते अपने फ्लैट जाती और नीचे आती."
धीरे-धीरे माहौल बिगड़ता चला गया. नीतू की उसी नाज़ुक हालत में अपना घर-व्यापार और सब कुछ छोड़, एक छोटे से बैग में बच्चे का सामान और ज़रूरी कागज़ात के साथ, उन्हें राजधानी से पोलैंड के लिए भागना पड़ा.
अभिजीत बताते हैं, "हम सर्दी के कपड़ों से इतना लदे थे कि यूक्रेनी अधिकारियों को ये समझाने में दिक्कत आती थी कि मेरी पत्नी गर्भवती है तो उसे ट्रेन या बस में पहले चढ़ने दिया जाए. यूक्रेन की औरतें, बच्चे और बुज़ुर्ग पहले, हमारी बारी आखिर में ही आती थी."
लंबे सफर के बाद जब वो पोलैंड पहुंचे तो नीतू दहशत में थीं.

भारतीय परिवार ने खोले अपने घर के दरवाज़े
नीतू और अभिजीत भारतीय दूतावास की ओर से यूक्रेन-पोलैंड बॉर्डर से सटे शहर ज़िशॉफ में चलाए जा रहे एक राहत शिविर में थे.
नीतू की इस हालत में भारत तक की हवाई यात्रा करना मुमकिन नहीं था और पोलैंड में उनका कोई जाननेवाला भी नहीं. नाउम्मीदी और घबराहट के मारे नीतू रोती रहतीं.
इसी हालत में उनकी मुलाकात राजेश एस नय्यर से हुई. पोलैंड की राजधानी वॉरसो में कुछ साल से काम कर रहे राजेश राहत शिविर में मदद कर रहे थे.
राजेश याद करते हैं, "जब मैं उनसे मिला तो वो सदमे में थीं. उन्हें रोता देख हम उन्हें छोड़कर जा नहीं सके. रुक गए. उनकी आंखों में बहुत मजबूरी थी."
राजेश और उनकी पत्नी अंजना ने कुछ ही महीने पहले 'केरल एसोसिएशन ऑफ पोलैंड' नाम का संगठन बनाया था और उसी के तहत और मलयाली मूल के लोगों के साथ राहत शिविर में मदद कर रहे थे.
अंजना बताती हैं, "अपनी ज़बान में किसी और औरत से बात करने से वो सहज महसूस करेंगी. ऐसा सोचकर ही ये मुझे नीतू से मिलाने ले गए. उनसे मिलकर हमें बहुत दुख हुआ और हमने फैसला कर लिया."
अजनबी होते हुए भी राजेश और अंजना, नीतू और अभिजीत को अपने घर ले आए.

राजेश के मुताबिक जब जंग छिड़ी हो तो और कुछ मायने नहीं रखता.
वो कहते हैं, "लोगों की अपनी सीमाएं होती हैं और उन्हें तोड़ने के लिए मुझे लगता है कि हमें अपने दिल खोलने होंगे. हम जितना सोचेंगे उतना उलझते जाएंगे तो कम सोचें और जो बन पड़े, कर दें."
ना नौकरी, ना घर, ना पैसे
फिलहाल सर पर छत होने के बावजूद अभिजीत और नीतू के सामने चुनौतियों का अंबार लगा है.
नीतू को अब भी सुरक्षित महसूस नहीं होता.

वो रुंआसी हो जाती हैं और कहती हैं, "हमारे पास रहने की अपनी जगह नहीं है. सिर्फ दूसरों की मदद से हम यहां रह रहे हैं. इनके पास कोई नौकरी नहीं है. ज़िंदगी चलाने के लिए पैसे नहीं हैं. मुझे नहीं पता कि हम क्या करेंगे."
अभिजीत के सर पर फास्ट फूड शॉप के लिए लिया गया काफी कर्ज़ा भी है. अब ना दुकान है और ना ही कमाई का कोई और ज़रिया.
इस सबके बीच भी वो अपनी पत्नी की बहादुरी की तारीफ करते नहीं थकते. वो कुछ ही महीने पहले भारत से यूक्रेन आईं थीं और गर्भवती होने के दौरान जंग की परिस्थितियों से सामना हो गया.
नीतू कहती हैं, "गर्भवती होने से पहले मैं इतनी बहादुर नहीं थी. पर अब मैं मां बन गई हूं, अपने बच्चे का खयाल रखना चाहती हूं. इसलिए बहादुर हो गई हूं."
ज़िंदगी और मौत के खतरों से बचकर पोलैंड पहुंच पाने में ये दंपत्ति ऑपरेशन गंगा की अहम् भूमिका मानते हैं.

अभिजीत कहते हैं, "ऑपरेशन गंगा मिशन की बदौलत ये संगठन बॉर्डर पहुंचे और हमारी मदद की. मैं इनका कितना शुक्रगुज़ार हूं ये बताने के लिए शब्द कम पड़ रहे हैं. इस ज़िंदगी में मैं राजेश और अंजना को कभी नहीं भूल पाउंगा."
इसीलिए उन्होंने अपने पैदा होनेवाले बच्चे का नाम अभी से तय कर लिया है.
नीतू बताती हैं, "हम उसे गंगा बुलाएंगे."
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)



















