विधानसभा चुनावों में क्या 'मुफ़्त' के वादे दिला पाएंगे वोट

मायावती, योगी और अखिलेश

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    • Author, अभिनव गोयल
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के बीच एक बार फिर 'मुफ़्त' की राजनीति शुरू हो चुकी है. कहीं 'मुफ़्त'' की बिजली का एलान तो कहीं फ़्री में स्कूटी, सिलेंडर से लेकर लैपटॉप तक देने का एलान.

उत्तर प्रदेश से लेकर गोवा तक राजनीतिक पार्टियां लोकलुभावन घोषणाएं कर रही हैं.

इन 'मुफ़्त' की घोषणाओं को जनता के कल्याण के तौर पर पेश किया जा रहा है लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त क्या है? क्या 'मुफ़्त' के ऐसे वादे और इरादे वोट हासिल करने का शॉट कट हैं? ऐसी घोषणाओं से जनता का कितना भला होता है?

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'मुफ़्त' की सियासत पर सवाल

सुप्रीम कोर्ट मे एक जनहित याचिका दायर की गई है.

याचिकाकर्ता अश्विनी उपाध्याय बीजेपी से जुड़े हैं. उनके मुताबिक़, ''याचिका में दो मांगे की गई हैं. पहली मांग है कि केंद्र को निर्देश दिया जाए कि वो क़ानून लाकर मुफ़्त की घोषणाएं करने वाले राजनीतिक दलों को नियंत्रित करे. दूसरी मांग है कि जो पार्टियां मुफ़्तखोरी का वादा कर रही हैं उनका चुनाव चिह्न रद्द हो''.

याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई की है. याचिकाकर्ता अश्विनी उपाध्याय के मुताबिक़, ''सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और चुनाव आयोग से चार हफ़्तों के अंदर जवाब मांगा है''.

उत्तर प्रदेश में 'मुफ़्त' का बड़ा एलान समाजवादी पार्टी ने किया है.

सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने कहा कि अगर उनकी सरकार बनी तो लोगों को 300 यूनिट फ़्री बिजली दी जाएगी.

इसके लिए उन्होंने '300 यूनिट मुफ़्त पाओ, नाम लिखवाओ, छूट न जाओ' अभियान की शुरुआत भी की है. अखिलेश यादव के इस एलान के बाद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने ट्वीट करते हुए कहा था, ''जो लोग फ़्री में बिजली देने की बात करते हैं, उन्होंने उत्तर प्रदेश को 'अंधेरे' में रखा था. उनके समय में तो अंधेरा ही अंधेरा था, बाकी जो था, वह दंगा-फसाद और कर्फ़्यू पूरा कर देता था. जब बिजली ही नहीं देनी, तो 'फ़्री' क्या देंगे?''

फ़्री में बिजली देने की घोषणा पर बीजेपी लगातार अखिलेश यादव पर हमले कर रही है जबकि कुछ महीने पहले बीजेपी ने ख़ुद 'मुफ़्त' स्मार्टफोन और लैपटॉप बांटने की शुरुआत की थी.

'मुफ़्त' की घोषणाएं सिर्फ़ उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं हैं. चुनावी राज्य पंजाब, गोवा और उत्तराखंड में भी कुछ ऐसा ही हाल है.

पंजाब में शिरोमणि अकाली दल ने 400 यूनिट और आम आदमी पार्टी ने 300 यूनिट फ़्री बिजली देने का वादा किया है. वहीं कांग्रेस ने कॉलेज जाने वाली लड़कियों को 'मुफ़्त' में इलेक्ट्रिक स्कूटी देने की बात कही है.

उत्तराखंड में भाजपा ने 'मुफ़्त' टैबलेट, आम आदमी पार्टी 300 यूनिट और कांग्रेस ने 200 यूनिट फ़्री बिजली का वादा किया है.

गोवा का भी हाल कुछ ऐसा ही है. यहां आम आदमी पार्टी ने 18 साल से ज्यादा उम्र की महिलाओं को 1 हज़ार रुपये प्रति महीना देने की बात कही है. कुछ जानकार इसे भी मुफ़्त की घोषणा मानते हैं.

चुनाव 2022

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मतदाताओं पर कितना प्रभाव?

नेटफ्लिक्स की डॉक्यूमेंट्री 'सोशल डिलेमा' में एक बात कही गई है, 'अगर आप किसी प्रोडक्ट के लिए भुगतान नहीं कर रहे हैं तो आप ख़ुद एक प्रोडक्ट हैं'.

सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ़ डेवलपिंग सोसाइटीज़ से जुड़े एसोसिएट प्रोफ़ेसर हिलाल अहमद का मानना है, "चुनाव एक तरह का बाज़ार है. इस बाज़ार में राजनीतिक दल किसी फर्म की तरह काम कर रहे हैं. उन्होंने अपने मतदाताओं को उपभोक्ता बना दिया है. वे पैकेज की तरह 'मुफ़्त' की चीजों को लेकर उनके बीच जाते हैं और उनके वोट मांगते हैं''.

चुनावों में 'मुफ़्त' की घोषणाओं का मतदाताओं पर क्या असर पड़ता है? राजनीतिक पार्टियों में ये चलन क्यों आम हो चुका है? इस सवाल के जवाब में राजनीतिक विश्लेषक प्रोफ़ेसर अभय कुमार दुबे का कहना है, ''चुनावों में 'मुफ़्त' की घोषनाएं दो तरह की होती हैं. एक घोषणा सत्ताधारी पार्टी की होती है जिनके वादों का असर न के बराबर होता है, क्योंकि वे पांच साल सरकार में होते हैं. दूसरी घोषणा विपक्षी दल करते हैं जिससे लोगों में उम्मीद जगती है. इन्हें वोटर गंभीरता से लेता है और अपनी दिलचस्पी दिखाता है."

चुनावों में राजनीतिक पार्टियां 'मुफ़्त' की घोषणाओं को गेम चेंजर की तरह देखती हैं. प्रोफ़ेसर अभय कुमार दुबे कहते हैं, ''वोट देने की प्राथमिकता में जाति, धर्म जैसी कई चीज़ें मतदाताओं को प्रभावित करती हैं लेकिन हाल के सालों में 'मुफ़्त' के वादे एक नए फ़ैक्टर के तौर पर उभरे हैं. ख़ासकर 2014 के बाद मतदाताओं में 'लाभार्थी चेतना' पैदा हुई है''.

इसका मतलब है कि मतदाता अपने फायदे के बारे में सोचने लगे हैं.

एसोसिएट प्रोफ़ेसर हिलाल अहमद 'मुफ़्त' की घोषणाओँ की, एक बड़ी कमी की तरफ भी इशारा करते हैं.

वो कहते हैं, "राजनीतिक पार्टियों ने समाज को पूरी यूनिट के तौर पर देखना बंद कर दिया है. उनके लिए औरतें, बच्चे, मुसलमान, दलित सब अलग अलग हैं. सबके लिए अलग अलग 'मुफ़्त' की घोषणाएं हैं. पार्टियां सबको अलग अलग अप्रोच करती हैं. इससे समाज का सर्वांगीण विकास नहीं हो पाता."

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बजट पर 'मुफ़्त' का बोझ

चुनाव आते ही 'मुफ़्त' की घोषणाओं की बरसात शुरू हो जाती है. ये सिलसिला नया नहीं है.

पूर्व वित्त सचिव सीएम वासुदेव का कहना है, ''कोई भी चीज 'मुफ़्त' नहीं आती, उसके लिए कोई न कोई पैसा भर रहा होता है. 'मुफ़्त' की योजनाओं का सबसे ज्यादा भार राज्य के बजट पर पड़ता है."

चुनावी मैदान में उतरी पार्टियां इस बात की परवाह नहीं करती कि उनकी 'मुफ़्त' की घोषणाओं का पैसा कहां से आएगा?

मुश्किल तब शुरू होती है जब वादा करने वाली पार्टी सत्ता में आती है. सीएम वासुदेव कहते हैं, "मुफ़्त में चीज़ें बांटना किसी सरकार की ज़िम्मेदारी नहीं है. सरकार के पास सीमित धन होता है. राज्य सरकारें पहले ही बाज़ार से कर्ज़ लेकर ख़र्चे कर रही हैं. अगर आप उस पैसे को 'मुफ़्त' की योजनाओं में बांट देंगे तो कर्ज़ का ब्याज़ भी नहीं चुका पाएंगे. इससे ग्रोथ पर उल्टा असर पड़ता है."

रिजर्व बैंक ऑफ़ इंडिया के आंकड़ों से पता चलता है कि ज़्यादातर राज्य कर्ज़ से दबे हैं.

क़र्ज़ की कीमत पर मुफ़्त घोषणाएं

नैशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ पब्लिक फाइनेंस एंड पब्लिक पॉलिसी के एसोसिएट प्रोफ़ेसर एचके अमरनाथ बताते हैं, "जब सरकार अपनी कमाई से ज़्यादा ख़र्च करने लगती हैं तो राजस्व घाटा बढ़ जाता है. 'मुफ़्त' की घोषणाओं से राजस्व घाटे में बढ़ोतरी होगी जिसका राज्य के कामकाज पर सीधा प्रभाव पड़ता है."

'मुफ़्त' के वादे और कल्याणकारी योजनाओं में अंतर?

राजनीतिक पार्टियां जब भी कभी 'मुफ़्त' की घोषनाएं करती हैं तो वे इसे कल्याणकारी योजना की तरह पेश करती हैं. क्या वाक़ई में ऐसा है?

एसोसिएट प्रोफ़ेसर हिलाल अहमद का मानना है, "कल्याणकारी योजनाओं में एक नागरिक अपने हक़ के तौर पर उसका हिस्सा बनता है जबकि 'मुफ़्त' के वादों में वो एक उपभोक्ता की तरह शामिल होता है. अगर किसी राज्य में महिलाओं को एक हज़ार रुपये देने की बात है तो इसमें महिलाएं अपना हक नहीं समझ रही हैं. उन्हें ये रुपये राजनीतिक पार्टियां दान की तरह दे रही हैं."

जबकि राजनीतिक विश्लेषक प्रोफ़ेसर अभय कुमार दुबे ऐसा नहीं मानते. इनके मुताबिक, "मुफ़्त की सारी घोषणाएं असल में कल्याणकारी योजनाएं होती हैं. 'मुफ़्त' के वादों से नुक़सान होगा ये नेरेटिव बाज़ारवादी अर्थशास्त्रियों ने तैयार किया है. सरकार की ज़िम्मेदारी है कि वो लोगों को राहत पहुंचाए. ये राहत तरह-तरह की चीजें 'मुफ़्त' में देकर भी पहुंचाई जा सकती है."

मुफ़्त के वादे

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'मुफ़्त' के वादों का सिलसिला

तमिलनाडु में 'मुफ़्त' सामान बांटने की राजनीति 2006 में ही शुरू हो गई थी. तब फ़्री कलर टीवी के नाम पर लोगों से वोट मांगे गए थे. इसके बाद तमिलनाडु की मुख्यमंत्री रहीं जयललिता ने भी इसका खूब इस्तेमाल किया. उन्होंने फ़्री मिक्सर, ग्राइंडर, मंगलसूत्र के लिए सोना देने जैसी घोषणाएं की.

वहीं दिल्ली में फ़्री बिजली-पानी देने के नाम पर अरविंद केजरीवाल ने बहुमत से सरकार बनाई. अब वो 'मुफ़्त' बिजली देने का फॉर्मूला हर उस राज्य में आजमा रहे हैं जहां वे चुनावी मैदान में हैं.

अखिलेश यादव जब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे तब उन्होंने 'मुफ़्त' लैपटॉप बांटकर खूब सुर्खियां बटोरी थीं.

छत्तीसगढ़ में बीजेपी की रमन सिंह सरकार ने 'मुफ़्त' सिलाई मशीन, साइकिल और प्रेशर कुकर देने का वादा किया था और बांटा भी.

कर्नाटक में बीएस येदियुरप्पा ने ग़रीबी रेखा के तहत आने वाले परिवार की लड़कियों को शादी में 25 हज़ार और 3 ग्राम सोना देने का एलान किया था.

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