इमरान मसूदः अखिलेश ने नहीं दिया टिकट, फिर भी 'समाजवादी सिपाही' क्यों?

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- Author, दिलनवाज़ पाशा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
"दुआ करो अल्लाह से. बहुत मना लिया. अबे दूसरों के पैर पकड़वा रहे हो, तुम मुसलमान-मुसलमान सीधे हो जाए, मेरे से क्यों पैर पकड़वा रहे हो, तो सारे मेरे पकड़ते फिरेंगे. मुझे पैर पकड़वा दिए, मेरा कुत्ता बना दिया. कुत्ता बना दिया कुत्ता."
17 जनवरी को सामने आए 18 सेकंड के एक वायरल वीडियो में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का चेहरा रहे इमरान मसूद ये कहते हुए दिखाई दिए. इससे एक सप्ताह पहले 11 जनवरी को ही उन्होंने कांग्रेस छोड़कर समाजवादी पार्टी में जाने का फ़ैसला लिया था.
इस वीडियो के मायने ये निकाले गए कि इमरान मसूद समाजवादी पार्टी और आरएलडी गठबंधन के टिकट वितरण में नज़रअंदाज़ किए जाने से नाराज़ हैं और समाजवादी पार्टी से उनकी बात बिगड़ गई है.
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लेकिन अब इमरान मसूद का कहना है कि वो समाजवादी पार्टी के सिपाही हैं और वो टिकट लेने के लिए समाजवादी पार्टी में नहीं गए थे. इमरान मसूद ने गुरुवार को लखनऊ में अखिलेश यादव से मुलाक़ात भी की है.
इमरान मसूद ने बीबीसी से बात करते हुए कहा, "ना मैं सौदेबाज़ी करने की बात करता हूं, ना ही मैं सौदेबाज़ हूं. एक बड़ा मक़सद था. उत्तर प्रदेश में किसानों, नौजवानों के मुद्दों के समाधान का. हम चाहते हैं कि उत्तर प्रदेश में एक ऊर्जावान युवा नेतृत्व में सरकार बनें, जिसके लिए हमें अखिलेश के अलावा और कोई विकल्प नज़र नहीं आता है. इसलिए ही मैं उनके साथ गया हूं और मैं पूरी तरह उनके साथ हूं."
इमरान मसूद का कहना है कि जो वीडियो सामने आया है उसे संदर्भ से अलग हटकर पेश किया जा रहा है. उन्होंने कहा, "वो जिस कंटेक्स्ट में बोला गया है, उसे पूरा नहीं दिखाया गया है, वो एक छोटे स्थानीय मुद्दे पर बात हो रही थी. वो वीडियो पूरा नहीं है ना ही पूरे संदर्भ को दर्शाता है. हम एक स्थानीय मुद्दे पर बात कर रहे थे, किसी ने उस आधी बात को पीछे से रिकॉर्ड करके जारी कर दिया. उस वीडियो को किसी और चीज़ से जोड़ना बेईमानी होगा.
इमरान कहते हैं, "मैंने वो बात पार्टी नेतृत्व के लिए नहीं की है. वो बात पार्टी से नाराज़गी को लेकर नहीं थी, उसका संदर्भ दूसरा था."

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तो क्या अब ये माना जाए कि इमरान मसूद मान गए हैं, भले ही उन्हें टिकट मिले या ना मिले? इस सवाल पर मसूद कहते हैं, "मैं नाराज़ था ही नहीं. ना ही मैंने टिकट मांगा. मैंने कभी नहीं कहा कि मैं चुनाव लड़ने के लिए बहुत उत्सुक हूं. या पार्टी मुझे चुनाव लड़ाएगी तो मैं पार्टी में रहूंगा, नहीं लड़ाएगी तो नहीं रहूंगा. मैं मानता हूं कि ये बहुत लंबी लड़ाई है और इसमें चुनाव बहुत छोटी चीज़ है."
इमरान मसूद का वीडियो वायरल होने के बाद ये सवाल भी उठा कि उन्हें पार्टी में पूरा सम्मान नहीं मिला. इस मसूद कहते हैं, "ऐसा नहीं है, यदि मेरे समर्थकों में कोई संदेश गया भी है तो मैं अपने समर्थकों को समझा लूंगा. ये लंबी लड़ाई है, हमारा पहला मक़सद उत्तर प्रदेश में सरकार बनाना है. एक बार सरकार बन जाएगी तो हम अपने मसलों को भी सुलझा लेंगे."
मसूद चुनाव लड़ेंगे या नहीं ये अभी स्पष्ट नहीं है. वो कहते हैं, "मैं अपनी उम्मीदवारी पेश नहीं कर रहा हूं. मैं चुनाव नहीं लड़ रहा हूं. मैं समाजवादी पार्टी के उम्मीदवारों को चुनाव लड़ाऊंगी, उनके लिए प्रचार करूंगा. मैं अब एक समाजवादी सिपाही हूं."
कांग्रेस छोड़ी पर 'नाराज़ नहीं'
इमरान मसूद पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का बड़ा चेहरा रहे हैं और वो प्रियंका गांधी के सलाहकार भी थे. कांग्रेस छोड़ने के सवाल पर मसूद कहते हैं, "प्रियंका गांधी चीज़ों को बहुत गंभीरता से लेती हैं और पूरी गंभीरता के साथ उत्तर प्रदेश में प्रयास कर रही हैं. लेकिन सच ये है कि तमाम कोशिशों के बावजूद उत्तर प्रदेश की चुनावी लड़ाई में कांग्रेस कहीं हैं नहीं. मौजूदा परिस्थिति में भारतीय जनता पार्टी को अखिलेश यादव ही चुनौती दे सकते हैं, और इसलिए ही मैं अब उनके साथ हूं. मेरी कांग्रेस से कोई नाराज़गी नहीं है."

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कांग्रेस के राष्ट्रीय सचिव रहे इमरान मसूद का सहारनपुर ज़िले में अपना जनाधार है. 2017 चुनाव में कांग्रेस ने पूरे प्रदेश में सिर्फ़ 6 सीटें जीती थीं. इनमें सो दो सहारनपुर ज़िले में थी. हालांकि इमरान मसूद इस चुनाव में नकुड़ विधानसभा से नज़दीकी मुक़ाबले में चार हज़ार वोटों से हार गए थे. ये चुनाव कांग्रेस ने समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन में लड़ा था.
इमरान मसूद ने पूर्व कैबिनेट मंत्री और कांग्रेस के बड़े नेता रहे काजी राशिद मसूद की राजनीतिक विरासत को संभाला है. मसूद काजी परिवार से ही हैं.
सहारनपुर में अपनी राजनीतिक शक्ति का अहसास मसूद ने 2007 में कराया था जब उन्होंने निर्दलीय मैदान में उतरकर समाजवादी पार्टी सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे जगदीश राणा को मात दी थी.
2013 के मुज़फ़्फ़रनगर दंगों के बाद हुए 2014 के लोकसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश में भाजपा मज़बूत दिख रही थी. इस चुनाव में इमरान मसूद सहारनपुर से चुनाव हार गए लेकिन चार लाख से अधिक वोट हासिल करके दूसरे नंबर पर रहे.
इसके बाद 2019 लोकसभा चुनावों में बसपा-सपा-रालोद का गठबंधन था और जीत बसपा उम्मीदवार की हुई. तब कांग्रेस के टिकट पर चुनाव में उतरे इमरान मसूद बीजेपी के बाद तीसरे नंबर पर रहे और दो लाख वोट हासिल किए.
इमरान मसूद 2007 के बाद से कोई चुनाव नहीं जीत पाए हैं लेकिन सहारनपुर की राजनीति में उनका प्रभाव माना जाता है.
अखिलेश ने किया नज़रअंदाज़?

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इमरान मसूद समाजवादी पार्टी में शामिल तो हो गए हैं लेकिन अभी गठबंधन ने उन्हें टिकट नहीं दिया है. तो क्या अखिलेश यादव उन्हें नज़रअंदाज़ कर रहे हैं.
इस विषय पर वरिष्ठ पत्रकार रामदत्त त्रिपाठी कहते हैं, "समाजवादी पार्टी को लगा होगा कि इनके साथ रहने से फ़ायदा कम है नुक़सान ज़्यादा है. क्योंकि उत्तर प्रदेश में मौजूदा परिस्थितियों में समाजवादी पार्टी को लग रहा है कि अल्पसंख्यक मुसलमानों को वोट तो उसे मिल ही रहे हैं. लेकिन इमरान मसूद जैसे नेताओं की मौज़ूदगी से धार्मिक ध्रुवीकरण हो सकता है जिसका फ़ायदा बीजेपी उठा सकती है. इसलिए ही अखिलेश ने उन्हें टिकट नहीं दिया है."
लेकिन इमरान मसूद ने अब साफ़ कर दिया है कि वो समाजवादी पार्टी के ही साथ रहेंगे और गठबंधन को चुनाव जिताने में पूरा ज़ोर लगाएंगे.
रामदत्त त्रिपाठी कहते हैं कि मसूद के पास अब बहुत विकल्प बचे नहीं थे. कांग्रेस वो छोड़ चुके हैं और कहीं और जाकर चुनाव लड़ें भी तो आगे बहुत संभावना नहीं है. ऐसे में अपनी राजनीति को प्रासंगिक रखने के लिए वो समाजवादी पार्टी के साथ हो गए हैं.
रामदत्त त्रिपाठी कहते हैं, "इमरान मसूद कांग्रेस छोड़ चुके हैं और समाजवादी पार्टी में नज़रअंदाज़ किए जाने के बाद उनके सामने सवाल ये था कि वो अब कहां जाएं. उन पर अपने समुदाय का दबाव भी होगा. उन्हें राजनीतिक और सामाजिक रूप से प्रासंगिक भी बने रहना है, इसलिए ही उन्होंने समाजवादी पार्टी के दामन को थामे रखा होगा."
ध्रुवीकरण होगा?
इमरान मसूद अपने बयानों को लेकर भी चर्चा में रहे हैं. 2014 के लोकसभा चुनाव के प्रचार के दौरान भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के बारे में उनके एक बयान को लेकर काफ़ी विवाद हुआ था. कथित भड़काऊ भाषण देने के आरोप में उन्हें गिरफ़्तार भी किया गया था. कांग्रेस ने तब पार्टी को अपने उम्मीदवार मसूद की टिप्पणी से ख़ुद को अलग रखा था. बाद में इमरान मसूद ने भी अपने बयान के लिए माफ़ी माँग ली थी.
2013 में मुज़फ़्फ़रनगर में हुए सांप्रदायिक दंगों की चर्चा पिछले चुनावों में होती रही है और पश्चिमी उत्तर प्रदेश पर उसका असर भी रहा है.
हालांकि मसूद मानते हैं कि अब हालात और समीकरण बदल चुके हैं. वो कहते हैं, "किसान आंदोलन ने दंगों के असर को खत्म कर दिया है. अतीत की बातें अतीत में रह गई हैं. भारतीय जनता पार्टी दंगों को मुद्दा बना रही है, सांप्रदायिकता की बात कर रही है. इसके अलावा उनके पास कोई मुद्दा नहीं है."
रामदत्त त्रिपाठी मानते हैं कि मसूद जैसे नेताओं की अति-सक्रियता चुनावी माहौल को सांप्रदायिक कर सकती है. त्रिपाठी कहते हैं, "इमरान मसूद का अपना राजनीतिक वजूद और जनाधार है. समाजवादी पार्टी को इससे मदद तो मिलेगी ही. लेकिन बीजेपी की रणनीति ये है कि धार्मिक आधार पर वोटों का ध्रुवीकरण किया जाए. वो इमरान मसूद का नाम लेकर हिंदू वोट को एकजुट करने की कोशिश करेंगे ही. योगी आदित्यनाथ ऐसे ही नेताओं का नाम बार-बार ले रहे हैं. ऐसे में समाजवादी पार्टी को थोड़ा सावधानी भी बरतनी होगी और पार्टी ऐसा कर रही है."
त्रिपाठी कहते हैं, "समाजवादी पार्टी इमरान मसूद को लो प्रोफ़ाइल इसलिए रख रही है क्योंकि इनकी अति सक्रियता से ध्रुवीकरण हो सकता है. इमरान मसूद के लिए अपने आप को प्रासंगिक रखने के लिए ज़रूरी है कि वो समाजवादी पार्टी के साथ रहें."
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