योगी आदित्यनाथ से ओबीसी नेता बग़ावत क्यों कर रहे हैं?- प्रेस रिव्यू

योगी आदित्यनाथ

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अंग्रेज़ी अख़बार द हिन्दू ने सोमवार को न्यूज़ विश्लेषण में उत्तर प्रदेश चुनाव से जुड़े मुद्दे को उठाया है. इसमें बीजेपी के भीतर उत्तर प्रदेश में पनप रहे विरोधी स्वरों की पड़ताल की है. आज की प्रेस रिव्यू की पहली लीड में इसे ही पढ़िए.

दिसंबर, 2019 में एक अप्रत्याशित वाक़या हुआ था. बीजेपी के क़रीब 100 विधायक लखनऊ स्थित विधानसभा परिसर में अपनी ही सरकार के ख़िलाफ़ धरने पर बैठ गए थे. इन विधायकों ने अपनी सरकार पर घमंड और मनमानी करने का आरोप लगाया था.

लोनी से बीजेपी के विधायक नंदकिशोर गुर्जर के ख़िलाफ़ ग़ाज़ियाबाद में हमले को लेकर मुक़दमा दर्ज किया गया था. गुर्जर का आरोप था कि उन्हें अपना पक्ष रखने का मौक़ा नहीं दिया गया. लेकिन योगी सरकार ने यह दिखाने की कोशिश की थी कि पार्टी का एक विधायक क़ानून-व्यवस्था से ऊपर नहीं है.

अब आते हैं स्वामी प्रसाद मौर्य के भाषण पर. मकर संक्रांति के दिन स्वामी प्रसाद मौर्य ने योगी सरकार को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि पिछले पाँच सालों में सत्ता की मलाई पिछड़े वर्गों से साझा नहीं की गई.

स्वामी प्रसाद मौर्य

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पिछड़ी जातियों की बग़ावत

नंदकिशोर गुर्जर और मौर्य दोनों पिछड़ी जाति से हैं. उत्तर प्रदेश में पिछड़ी जाति के वोटर क़रीब 44 फ़ीसदी हैं. मौर्य और गुर्जर में फ़र्क़ यह है कि गुर्ज़र छोटी मछली हैं जबकि मौर्य इलाक़ाई क्षत्रप हैं और वो हवा का रुख़ पहचानते हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि वो सियासी शतरंज में अपनी गोटी सेट करना बख़ूबी जानते हैं.

मौर्य के समर्थक चुनाव के मौक़े पर पाला बदलने को अनैतिक नहीं मानते हैं. राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि सत्ता की मलाई में हिस्सेदारी और उसकी गुणवत्ता ही चुनाव के दौरान राजनीतिक निष्ठा तय करती है.

राजनीतिक विज्ञानियों का मानना है कि सत्ता की मलाई का मतलब है- नौकरियों में आरक्षण, सरकारी कॉन्ट्रैक्ट में हिस्सा, अवैध लेन-देन की मंज़ूरी, सत्ता की अकड़ और पास का थाना उस नेता के कहे पर काम करे. पूर्वांचल में बीजेपी के भीतरी लोगों का कहना है कि एक कप चाय और मुख्यमंत्री के कुछ गर्मजोशी भरे शब्द कई बार काम करवाने से ज़्यादा अहम होते हैं. लेकिन मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इन तरीक़ों को नहीं अपनाया और यह इनके ख़िलाफ़ गया.

बीजेपी से एक व्यक्ति ने कहा, ''वह मोदी बनने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन भूल कर रहे हैं कि मोदी ने यह हैसियत अर्जित की है न कि थोपी है.'' मौर्य के इस्तीफ़े के एक दिन बाद मुख्यमंत्री योगी ने पार्टी के एक दलित सदस्य के घर खाना खाया. योगी की इस पहल को डैमेज कंट्रोल के तौर पर देखा जा रहा है. लेकिन कांग्रेस के नेता जब ये काम पहले करते थे तो बीजेपी इसे 'ग़रीबी पर्यटन' कहती थी.

अखिलेश यादव

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धर्म बनाम जाति

मौर्य ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के नैरेटिव को धर्म से जाति की ओर शिफ़्ट कर दिया है. समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव महीनों से इसी तरह की कोशिश कर रहे थे. वो एक ऐसा गठबंधन बनाने की कोशिश कर रहे थे, जिसमें सभी इलाक़ाई पार्टियां शामिल हो सकें. ऐसा उन्होंने किया भी है. समाजवादी पार्टी के साथ राष्ट्रीय लोकदल, सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी और महान दल हैं.

विशेषज्ञों का कहना है कि यादव और जाटव को मंडल राजनीति का फ़ायदा मिला लेकिन मौर्य, सैनी, कश्यप और कुशवाहा, जो कि ओबीसी में निचले पायदान पर हैं और वो अब भी अपने हिस्से से असंतुष्ट हैं.

पर्यवेक्षकों का कहना है कि जाट, यादव, गुर्जर बाक़ी पिछड़ी जातियों की तुलना में सामाजिक और आर्थिक रूप से मज़बूत थे, इसलिए उन्हें आरक्षण का फ़ायदा ज़्यादा मिला. सालों तक मौर्य, सैनी, कश्यप और कुशवाहा मयावाती की बहुजन समाज पार्टी के साथ रहे. इन्हें उम्मीद थी कि मायावती इनके लिए काम करेंगी. लेकिन कहा जाता है कि बीएसपी की सरकार में जाटव को सत्ता की मलाई सबसे ज़्यादा मिली.

इसके बाद इन समुदायों ने बीजेपी को चुना कि सत्ता में उनका हिस्सा मिले. हालांकि योगी आदित्यनाथ ने ओबीसी में हाशिए की जातियों को अनुसूचित जाति में डालने की कोशिश की, लेकिन क़ानूनी पेच से पार नहीं पा सके.

इसके अलावा बीजेपी राज में निजीकरण भी बहस का एक मुद्दा रहा. प्रदेश की बुनियादी शिक्षा में इन जातियों को शिक्षक बनने के मौक़े मिलते थे. लेकिन भविष्य में आरक्षण को लेकर इन जातियों में असुरक्षा बढ़ी है. अलीगढ़ में एक प्राथमिक विद्यालय के प्रधानाचार्य ने कहा, ''शिक्षा को छोड़कर सभी चीज़ों का निजीकरण किया जा चुका है. यहाँ तक कि हमारे काम की समीक्षा भी निजी संस्थानों के हाथ में है. अब लोगों को लगता है कि बीजेपी सत्ता में आई तो शिक्षण का काम भी निजी हाथों में चला जाएगा और इससे उनकी सैलरी कम हो जाएगी. 50 की उम्र में रिटायरमेंट की बात भी की जा रही है.''

स्वामी प्रसाद मौर्य

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ठाकुरवाद का आरोप

मौर्य के समर्थकों का कहना है कि 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने योगी आदित्यनाथ को थोप दिया क्योंकि चुनाव से पहले इन्होंने किसी ओबीसी को मुख्यमंत्री बनाने के लिए कहा था.

सहारनपुर के एक शिक्षक राकेश सैनी ने कहा, ''हमने योगीजी को इसलिए स्वीकार किया क्योंकि वे संत समाज से थे. लेकिन जब उन्होंने हिन्दुत्व की आड़ में ठाकुरवाद थोपना शुरू किया तो हमारे नेता नाराज़ हो गए. वाजपेयी के शासन काल में कल्याण सिंह के साथ भी दुर्व्यवहार हुआ था. अब योगी 80 बनाम 20 कर रहे हैं लेकिन ओबीसी अब इन एजेंडों को नक़ली मानने लगे हैं.''

राकेश सैनी ने कहा, ''हमारे नेता धरम सिंह सैनी ने योगी सरकार से इस्तीफ़ा देने के बाद कहा कि उन्हें जाति के कारण सरकार में उपेक्षा का शिकार होना पड़ा.''

हालांकि ग़ैर-यादव ओबीसी नेताओं के समाजवादी पार्टी में आने को अचानक नहीं देखा जा रहा है. व्हाट्सऐप मैसेज पर लंबे समय से शेयर हो रहा था कि प्रशासन में ठाकुरों का बोलबाला है. डीएम, एसपी और स्टेशन हाउस ऑफ़िसरों में ठाकुरों का दबदबा है जैसा मैसेज तेज़ी से शेयर हो रहा था. पर्यवेक्षकों का कहना है कि उप-मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य की भूमिका भी सवालों के घेरे में रही. योगी आदित्यनाथ के साथ पिछले कुछ सालों से उनके रिश्ते को लेकर सवाल उठते रहे.

मायावती

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समाजवादी पार्टी के नेता कह रहे हैं कि जो हालत 2017 में उनकी थी, वही अभी बीजेपी की है. बिजनौर के समाजवादी पार्टी के एक नेता ने कहा, ''2017 में चुनाव के पहले हमलोग पार्टी के भीतर सब कुछ नियंत्रित करने में नाकाम रहे थे. विपक्षी बीजेपी जाति आधारित पार्टियों से गठबंधन कर रही थी. इस बार बीजेपी बैकफ़ुट पर है.''

अलीगढ़ यूनिवर्सिटी में राजनीतिक विज्ञान के प्रोफ़ेसर असमेर बेग कहते हैं, ''ओबीसी नेताओं की बग़ावत छोटी है लेकिन विधानसभा चुनाव से पहले बहुत अहम है. हिन्दू-मुस्लिम का नैरेटिव कुछ ज़्यादा ही हो गया था और जैसा कि अखिलेश यादव ने कहा था कि समाजवादी और आंबेडकरवादी एक साथ आ जाएं तो चौंकाने वाले नतीजे होंगे.''

बेग कहते हैं, ''बीजेपी अभी सारे तिकड़मों का इस्तेमाल करेगी कि जाति के ऊपर मज़हब हावी हो जाए. अखिलेश यादव के लिए यह आसान नहीं है कि वो बीजेपी से आए नेताओं को संतुष्ट कर दे.'' लेकिन एक चीज़ तो साफ़ हो गई है कि बबुआ (अखिलेश यादव) बाबा (योगी आदित्यानाथ) के लिए एक मज़बूत चुनौती बन गए हैं.

कोरोना

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कोरोना की तीसरी लहर से राहत के संकेत

हिन्दी अख़बार दैनिक जागरण ने पहले पन्ने पर ख़बर लगाई है- कोरोना की तीसरी लहर से राहत के संकेत. अख़बार ने अपनी ख़बर में लिखा है कि कोरोना महामारी से कुछ राहत के संकेत मिल रहे हैं.

सात से 13 जनवरी के बीच आर वैल्यु में गिरावट दर्ज की गई है और यह 2.2 पर आ गई है. आईआईटी मद्रास के प्रारंभिक विश्वलेषण के मुताबिक़ इससे पहले के दो हफ़्तों में यह क्रमशः चार और 2.9 पर थी.

आईआईटी मद्रास के गणित विभाग और सेंटर ऑफ़ एक्सीलेंस फ़ॉर कंप्युटेशनल मैथेमेटिक्स एंड डेटा साइंस के प्रोफ़ेसर एस सुंदर द्वारा किए गए विश्लेषण के मुताबिक़ मुंबई की आर वैल्यु 1.3, दिल्ली की 2.5, चेन्नई की 2.4 और कोलकाता की 1.6 पाई गई है. 25-31 दिसंबर के बीच आर वैल्यु 2.9 और एक से छह जनवरी के बीच आर वैल्यु चार थी.

आर वैल्यु विषाणु के प्रसार की तेज़ी को प्रदर्शित करती है. इससे यह पता चलता है कि एक संक्रमित व्यक्ति कितनों को संक्रमित कर रहा है.

हरक सिंह रावत

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उत्तराखंड: बीजेपी ने हरक सिंह रावत को निकाला

अंग्रेज़ी अख़बार द इंडियन एक्सप्रेस ने उत्तराखंड की बीजेपी सरकार की कैबिनेट से मंत्री हरक सिंह रावत के निकाले जाने की ख़बर को प्रमुखता से जगह दी है.

अख़बार ने लिखा है कि बीजेपी ने हरक सिंह रावत को छह सालों के लिए पार्टी से भी निकाल दिया है. कहा जा रहा है कि हरक सिंह रावत तीन टिकट मांग रहे थे, जिसे पार्टी ने मानने से इनकार कर दिया था. यह भी कहा जा रहा है कि रावत सोमवार को कांग्रेस में शामिल हो सकते हैं. हरक सिंह रावत पिछले कुछ सालों से पार्टी से नाराज़ बताए जा रहे थे.

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