यूपी चुनाव और आज का मुसलमान

ज़ुबैर अहमद, विनीत खरे
बीबीसी संवाददाता, उत्तर प्रदेश से लौटकर

भारत में इस समय उत्तर प्रदेश चुनाव की सरगर्मी बहुत ज़्यादा है.

पिछले दो आम चुनावों में केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार बनाने में उत्तर प्रदेश की अहम भूमिका रही. इसी कारण उत्तर प्रदेश चुनाव में पार्टियाँ अपना सब कुछ झोंक रही हैं.

उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ की सरकार पर विपक्षी पार्टियों ने कई गंभीर सवाल उठाए हैं. राज्य में महिलाओं की स्थिति, दलितों के ख़िलाफ़ हिंसा और क़ानून व्यवस्था का मुद्दा विपक्ष ज़ोर-शोर से उठा रहा है. इन सबके बीच एक अहम सवाल वहाँ के अल्पसंख्यकों ख़ासकर मुसलमानों की स्थिति को लेकर भी है.

चुनावी मौसम में उत्तर प्रदेश के कई इलाक़ों का दौरा करते हुए कई सवालों के जवाब मिले. एक अहम सवाल प्रदेश में रह रहे मुसलमानों की बड़ी आबादी की दशा पर भी है, जो चुनाव के पहले ही चर्चा के केंद्र में है.

लखनऊ, हरदोई, आज़मगढ, शामली, मुज़फ़्फ़रनगर, मेरठ और बिजनौर– इन सभी इलाक़ों का दौरा करते हुए ये सवाल था कि प्रदेश की 20 प्रतिशत आबादी जिस कौम की है, वो किस हाल में है.

क्या वो हाशिए पर ही है या कुछ उनकी स्थिति में तब्दीली आई है.

क्या योगी सरकार के दौर में उन्हें राजनैतिक, सामाजिक और आर्थिक ताक़त मिली या उनकी हालत और खराब हुई है.

अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन जैसे ह्यूमन राइट्स वॉच और एमनेस्टी इंटरनेशनल ने राज्य की पुलिस और सरकार पर मुसलमानों को निशाना बनाने का आरोप लगाया है. हमने ज़मीन पर जाकर इस बात की पड़ताल करने की कोशिश की है.

मुसलमान क्या महसूस कर रहे हैं?

बिजनौर के नहटौर क़स्बे के रहने वाले मोहम्मद शोएब की मानें, तो इसमे कोई शक नही है. पिछले साल सीएए और एनआरसी क़ानून के ख़िलाफ़ हो रहे प्रदर्शनों के दौरान इस बात को बल मिला है शोएब ख़ुद को दूसरे दर्जे का शहरी समझते हैं.

महीनों गुज़र गए हैं, लेकिन न्याय पाने की उनकी सभी कोशिशें बेकार साबित हुई हैं, हालाँकि अदालत पर उन्हें अब भी 'पूरा विश्वास' है.

शोएब का आरोप है कि 20 दिसंबर 2019 को जब उनके भाई मोहम्मद सुलेमान जुमे की नमाज़ पढ़कर मस्जिद से निकले, तो उन्हें पुलिस ने पकड़ लिया और मस्जिद से 100 मीटर की दूरी पर घासमंडी नाम की जगह पर ले जाकर गोली मार दी.

शोएब का दावा है कि उनके भाई को मुसलमान होने के कारण निशाना बनाया गया. हालाँकि पुलिस इससे इनकार करती है.

राज्य सरकार ने हिंसा के बाद जाँच के लिए जो एसआईटी गठित की थी, उसकी रिपोर्ट में सलमान को दंगाइयों में शामिल किया गया था. पुलिस का दावा है कि पहले भीड़ की तरफ़ से गोली चली और फिर पुलिस ने अपने बचाव में गोली चलाई, जिसमें सलमान की मौत हो गई.

बेबसी के आलम में अपने घर में बैठे हाथों में केस के काग़ज़ात लिए शोएब कहते हैं:

20 दिसंबर 2019 वो दिन था, जब उत्तर प्रदेश के कई शहरों में नागरिकता (संशोधन) अधिनियम (CAA) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) के विरोध में प्रदर्शन हुए थे.

फ़रवरी 2020 में विधानसभा में पूछे एक सवाल के जवाब में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा था कि गुज़रे छह महीनों में प्रदर्शनों के दौरान 21 लोगों की मौत हुई, हालाँकि ये स्पष्ट नहीं था कि क्या वो सीएए के ख़िलाफ़ प्रदर्शनों का ज़िक्र कर रहे थे.

मुख्यमंत्री ने विधानसभा में दावा किया कि कोई भी शख़्स पुलिस की गोलियों से नहीं मरा, साथ ही उन्होंने कहा था:

रिपोर्टिंग के दौरान कई मुसलमानों ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि सीएए, एनआरसी के ख़िलाफ़ प्रदर्शनों को दबाने के लिए पुलिस की कार्रवाई इतनी सख़्त थी कि लोग डर गए. उनको इस बात का डर था कि कहीं वो कुछ कहें और उनके ख़िलाफ़ ही कोई केस न डाल दिया जाए.

सीएए और एनआरसी के ख़िलाफ़ प्रदर्शन करने वालों के मामलों को देखने वाले वकील मोहम्मद तनवीर के मुताबिक़ पुलिस ने इन मामलों में 15-20 एफ़आईआर दर्ज की, जिनमें 15,000-20,000 लोगों के नाम जोड़े गए.

और क़रीब 95 प्रतिशत अभियुक्त मुसलमान हैं.

वो कहते हैं, "ऐसे बहुत सारे लोग हैं, जिन पर एक से ज़्यादा एफ़आईआर दिखाई गई है. 10-15 लोग ऐसे हैं, जिन्हें शहर से बाहर कर दिया गया है. इसके बाद से मुस्लिम समुदाय में डर है, लोग अपने अधिकार के लिए नहीं लड़ पा रहे हैं. आवाम की बात ऊपर तक नहीं पहुँच पा रही है."

मोहम्मद शोएब कहते हैं कि वो और उनके परिवार वाले दहशत में जी रहे हैं, क्योंकि उन पर केस वापस लेने का दबाव है.

'किस जुर्म की सज़ा?'

साल 2011 के आँकड़ों के मुताबिक़ उत्तर प्रदेश की क़रीब 20 करोड़ आबादी का लगभग 20 प्रतिशत, यानी क़रीब चार करोड़ मुसलमान हैं.

ये वो प्रदेश है, जहाँ के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ 'अब्बाजान', 'मुस्लिम लीग एक वायरस है' जैसे बयानों के कारण विवादों में रहे हैं और उनके कई बयान मुस्लिम विरोधी बताए जाते है, हालाँकि उनका कहना है कि वो मुसलमान विरोधी नहीं, बल्कि वो राष्ट्र विरोधियों के ख़िलाफ़ हैं.

पिछले कई महीनों की ख़बरों को पलटकर देखेंगे, तो लगातार ऐसी कई घटनाएँ मीडिया में दर्ज हुई हैं, जिनसे ये लगता है कि इस समुदाय के लोगों को अलग-अलग तरह से उनके धर्म की पहचान के आधार पर टारगेट किया गया है. ख़ास तौर पर उनकी रोज़ी रोटी कमाने का ज़रिया निशाने पर रहा.

अगस्त में रिपोर्ट छपी कि हिंदूवादी संगठन क्रांति सेना ने मुज़फ़्फ़रनगर में हिंदू महिलाओं से कहा कि वो मुसलमानों से मेहंदी न लगवाएँ.

कानपुर में एक मुस्लिम युवक अफ़सर अहमद को पीटा गया और उन्हें जय श्री राम बोलने के लिए कहा गया. इस घटना के एक वायरल वीडियो में दिख रहा है कि जब अफ़सर को लोग पीट रहे थे तो उनकी सात साल की बेटी उनसे लिपटकर, रोते हुए उन्हें बचाने की कोशिश कर रही थी.

मथुरा में एक मुस्लिम व्यक्ति श्रीनाथ नाम का डोसा स्टैंड चला रहा था. आरोप है कि स्थानीय लोगों ने उनकी ये कहते हुए पिटाई कर दी कि वो हिंदू नाम से दुकान कैसे चला सकते हैं.

'आर्थिक जिहाद', 'लव जिहाद' जैसे शब्द अब आम भाषा का हिस्सा बन गए हैं.

ये वो घटनाएँ हैं, जो उत्तर प्रदेश में मुसलमानों की स्थिति पर एक ख़ास टिप्पणी करती हैं.

आज़मगढ़ के 25 वर्षीय अहमद वक़ार के मुताबिक़, "पिछले सात-आठ सालों में लोगों के दिमाग़ में ये बात डाल दी गई है कि मुस्लिम बहुत बुरी चीज़ होते हैं और लोग हमसे दूरी बनाना चाह रहे हैं."

आज़मगढ़ के ही मशहूर शिबली एकेडमी में सीनियर फ़ेलो प्रोफ़ेसर उमैर सिद्दीक़ी कहते हैं कि पिछले सात-आठ सालों में उत्तर प्रदेश में मुसलमानों को डर या ख़ौफ़ के अलावा अपनी बेइज़्ज़ती का भी अहसास है कि उनको बहुत ही मामूली बातों पर बुरा-भला कह दिया जाता है.

वो कहते हैं, "अगर किसी मजहब के पैगंबर को या उसकी फिलॉसफ़ी को गालियाँ दी जाएँ और दिलवाई जाएँ, बहुत कुछ बुरा-भला कहा जाए तो वो बहुत तकलीफ़देह है."



"यूपी के मुसलमान को समझ नहीं आ रहा है कि उसे सज़ा किस जुर्म की मिल रही है. हमारी ज़बान के मुशायरे हो रहे हैं, सब आ रहे हैं लेकिन उस ज़बान को आतंकवादियों की ज़बान कहा गया. वकील जहाँ मुक़दमा लेने से इनकार कर दे, ऐसी हालत में यहाँ के मुसलमान अपने को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं और उनकी समझ नहीं आ रहा है कि वो करें तो क्या करें."

आँकड़े क्या कहते हैं

साल 2019 में फ़ैक्ट चेक की एक वेबसाइट, फ़ैक्टचेकर के मुताबिक़ गुज़रे 10 सालों में पूरे भारत में रिकॉर्ड किए गए हेट क्राइम के कुल मामलों में से 59 प्रतिशत मामलों में पीड़ित मुसलमान थे.

वर्ष 2019 में हेट क्राइम पर एमनेस्टी की रिपोर्ट में उत्तर प्रदेश पहले नंबर पर था.

भारत में मुसलमानों की तादाद लगभग 14 प्रतिशत है. ये देश का सबसे बड़ा अल्पसंख्यक समुदाय है. उत्तर प्रदेश में ख़ासकर इस समुदाय का राजनैतिक महत्व काफ़ी रहा है. लेकिन विकास के ज़्यादातर पैमाने पर ये कौम पिछड़ी रही है.

साल 2005 में मनमोहन सिंह की सरकार ने मुसलमानों की सामाजिक, आर्थिक और शिक्षा के क्षेत्र में स्थिति की समीक्षा के लिए एक समिति का गठन किया था.

जस्टिस सच्चर की अगुवाई में 2006 में प्रकाशित 'सच्चर कमेटी' की रिपोर्ट में मुसलमानों के हर क्षेत्र में बुरे हाल को दर्ज किया गया.

नेशनल स्टैटिस्टिकल ऑफ़िस (एनएसओ) ने पिछले साल अपनी एक रिपोर्ट में कहा कि मुसलमान कई प्रमुख क्षेत्रों में पहले से भी ज़्यादा पिछड़ गए हैं.

हालाँकि सत्तारूढ पार्टी बीजेपी का कहना है कि उनकी सरकार की देखरेख में उत्तर प्रदेश के मुसलमानों की हालत बेहतर हुई है. उनका आरोप है कि समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने उनका इस्तेमाल केवल वोट के लिए किया है.

साल 2004-05 के एनएसएसओ (नेशनल सैंपल सर्वे ऑफ़िस) के आँकड़ों के मुताबिक़ उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाक़ों में खेती से जुड़े ज़्यादातर लोग उच्च जाति के हिंदू (72.6%) और हिंदू ओबीसी (70.43%) थे.

राज्य के ग्रामीण इलाक़ों में खेती में अनुसूचित जाति (49.91%) के लोगों की हिस्सेदारी मुसलमानों से ज़्यादा थी. ज़्यादातर मुसलमान ग़ैर-कृषि मज़दूरी से जुड़े थे और ये संख्या 2011-12 में और बढ़ गई.

उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाक़ों के क़रीब 20 प्रतिशत मुसलमान मज़दूरी से जुड़े थे, जिससे इशारा मिलता है कि वक़्त के साथ उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति और ख़राब हुई है.



‘मिनी पाकिस्तान'

मेरठ की मुस्लिम बस्ती मछेरान में लोग दयनीय स्थिति में ज़िंदगी बसर कर रहे हैं.

कई स्थानीय निवासी समझते हैं कि वो मुख्यधारा से कटे हुए हैं. वो ग़रीब हैं और ऊपर से मुसलमान, इसलिए उन्हें कोई नहीं पूछता.

इसी बस्ती के आसिफ़ नईम का कहना है कि उनके इलाक़ों को 'मिनी पाकिस्तान' के रूप में देखा जाता है और उनकी बस्ती में टैक्सी वाले या खाना डिलीवर करने वाले नहीं आते.

वो कहते हैं, "प्रशासन हमारे साथ भेदभाव तो करता ही है, प्राइवेट बिज़नेस वाले भी हमें नज़रअंदाज़ करते हैं. हमारे यहाँ मॉल नहीं, सिनेमाघर नहीं, एटीएम नहीं, स्कूल नहीं, हेल्थ सेंटर नहीं, मैकडॉनल्ड्स या बीकानेरवाला नहीं."

आसिफ़ नईम कहते हैं कि न कोई काउंसलर, न विधायक और न ही सांसद उनकी सुध लेने आता है.

उन्होंने अपने इलाक़े के सार्वजनिक शौचालय की तरफ़ ध्यान दिलाया, जो बेहद गंदी हालत में हैं और कई शिकायतों के बावजूद उन्हें साफ़ करने वाला भी कोई नहीं है.

केवल मेरठ शहर में ही मछेरान जैसी कई ग़रीब मुस्लिम बस्तियाँ हैं और ऐसी बस्तियाँ राज्य के लगभग हर बड़े शहर में हैं.

पुराने मेरठ में सोहराब गेट एक मुस्लिम इलाक़ा है, जो चहल-पहल से भरा एक बाज़ार है, जहाँ दुकानें थोड़ी बेहतर हालत में हैं.

अंग्रेज़ों के दौर में ये रौनक़ से भरा एक समृद्ध इलाक़ा था. कुछ पुरानी इमारतें समुदाय के गौरवशाली अतीत का संकेत देती हैं. लेकिन आज यहाँ विकास और बदलाव की सख़्त ज़रूरत है.

यहाँ के मुसलमान मानते हैं कि उन्हें वर्षों से नज़रअंदाज़ किया जा रहा है.

आसिफ़ नईम कहते हैं, "मैं कहूँगा कि हममें से 90 से 95 प्रतिशत से अधिक लोग ऐसा ही जीवन जी रहे हैं, जैसा आप यहाँ देख रहे हैं."

सत्तारूढ़ पार्टी बीजेपी का क्या कहना है

इस पिछड़ेपन पर बीजेपी के अल्पसंख्यक सेल के प्रदेश अध्यक्ष कुंवर बासित अली का कहना है कि उत्तर प्रदेश अगर पिछड़ा है, तो इसकी ज़िम्मेदार कांग्रेस पार्टी है, जिसने 50 साल सत्ता में रहने के बावजूद मुसलमानों को केवल वोट के लिए इस्तेमाल किया.

समाजवादी पार्टी के बारे में भी उनकी राय है कि उस पार्टी को केवल मुसलमानों के वोट चाहिए, उनका विकास नहीं. उनका कहना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में मुसलमान ख़ुद को सुरक्षित और सुखी महसूस करते हैं.

कुंवर बासित अली कहते हैं, “इन सात सालों में (पीएम मोदी के सत्ता में आने के बाद से) 5.5 करोड़ मुस्लिम बच्चों को वज़ीफ़े दिए गए. इनमें तीन करोड़ स्कॉलरशिप मुस्लिम बच्चियों को मिली है. जबकि पिछले 70 सालों में पाँच करोड़ बच्चों तक को स्कॉलरशिप नहीं दी गई थी." 

कुंवर बासित अली के तर्क के बावजूद ज़मीन पर सच्चाई अलग दिखती है.

"प्रधानमंत्री आवास योजना के अंतर्गत 37 प्रतिशत भागीदारी अल्पसंख्यक समाज की है; मुद्रा ऋण में 39 फ़ीसदी हिस्सेदारी अल्पसंख्यक समाज की है. उज्ज्वला योजना में 38 फ़ीसदी हिस्सेदारी मुस्लिम महिलाओं की है. इसके अलावा हमारी सरकार मुस्लिम महिलाओं के लिए तीन तलाक ख़त्म करने का क़ानून लाई."

कुंवर बासित अली के तर्क के बावजूद ज़मीन पर सच्चाई अलग दिखती है.

उत्तर प्रदेश का मुसलमान शिक्षा, नौकरी में भी हाशिए पर

नेशनल सैंपल सर्वे ऑफ़िस यानी एनएसएसओ की रिपोर्ट से पता चलता है कि मुसलमान शिक्षा के क्षेत्र में भी हाशिए पर हैं और उनकी हालत अनुसूचित जाति-जनजाति से भी बदतर है.

एनएसएसओ की रिपोर्टों के मुताबिक़ साल 2004-05 में मुस्लिम ओबीसी में अशिक्षा दर सबसे ज़्यादा 61.12%. थी.

साल 2011-12 में ये दर 10 प्रतिशत घटकर 50.87% पहुँची, लेकिन अनुसूचित जाति और जनजातियों के मुक़ाबले ये दर अब भी ज़्यादा है.



साल 2011-12 में उच्च जाति के हिंदुओं में अशिक्षा दर सबसे कम 21.25% थी. उच्च जाति के मुसलमानों और हिंदू ओबीसी में भी ऐसा ही था. साल 2004-05 से 2011-12 में अनुसूचित जनजातियों में अशिक्षा में सबसे ज़्यादा कमी आई.

एक ट्वीट में एआईएमआईएम के नेता असदउद्दीन ओवैसी ने एनएसओ के आँकड़ों का हवाला देते हुए कहा था कि इस पिछड़ेपन की वजह है कि एक के बाद एक सरकारों ने मुसलमानों की शिक्षा में निवेश नहीं किया, न ही उनके लिए स्कूल बनाए.

सरकारी नौकरियों और प्रतियोगी परीक्षाओं में भी मुसलमानों की भागीदारी कम है और स्कूलों से ड्रॉप आउट रेट ज़्यादा है.

ऑल इंडिया सर्वे ऑन हायर एजुकेशन के मुतबिक़ पिछले तीन सालों में उच्च शिक्षा में मुसलमानों की भागीदारी बढ़ी है, लेकिन पिछले पाँच सालों में बढ़ोत्तरी की दर बेहद धीमी है.

उधर साल 2014-15 में मुसलमानों का स्कूल से ड्रॉपआउट, या स्कूलों में किन्ही कारणों से अपनी पढाई न जारी रख पाने, का रेट बढ़कर 20.83% तक पहुँच गया.

ऑल इंडिया सर्वे ऑन हायर एजुकेशन साल 2019-20 की रिपोर्ट के मुताबिक़ उच्च शिक्षा में मुसलमानों की भागीदारी मात्र 5.5 प्रतिशत है.

कॉमनवेल्थ ह्यूमन राइट्स इनिशिएटिव 2018 की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ दिसंबर 2017 तक जुटाए गए आँकड़ों से पता चला कि कुल पुलिसकर्मियों का मात्र दो प्रतिशत मुसलमान हैं.

उर्दू साप्ताहिक जदीद मरकज़ के हिसाम सिद्दीक़ी का आरोप है कि प्रतियोगी परीक्षाओं में मुसलमानों के न चुने जाने की वजह है कि उनका धर्म के आधार पर चयन ही नहीं किया जाता, हालाँकि इस बारे में कोई सबूत मौजूद नहीं.

आज़मगढ़ में जामिया मिल्लिया इस्लामिया से इलेक्ट्रॉनिक्स में मास्टर्स करने वाले अहमद वक़ार के मुताबिक़ लोगों को लगता है कि सरकारी नौकरियाँ उनके लिए नहीं हैं, इसलिए बहुत सारे लोग मध्य-पूर्व का रुख़ करते हैं.

आज़मगढ़ में ही कुछ लड़कों ने इसके लिए सुविधाओं की कमी, ग़रीबी, कुछ मुसलमान परिवारों का पढ़ाई पर कम ध्यान देने को भी ज़िम्मेदार ठहराया.


बीबीसी से बातचीत में कई मुसलमानों ने नौकरियों में भेदभाव के आरोप लगाए, तो कुछ ने भेदभाव के आरोप को ग़लत भी बताया.

वक़ार आज़मगढ़ के उसी इलाक़े से हैं, जहाँ के दो युवक बाटला हाउस एनकाउंटर में मारे गए थे. इसके फ़र्ज़ी एनकाउंटर होने के भी आरोप लगे. लेकिन अदालत ने इन आरोपों को ख़ारिज कर दिया था.

वक़ार याद करते हैं कि बाटला हाउस की घटना के बाद बच्चों ने बाहर जाना बंद कर दिया, बच्चों की पढ़ाई पर असर पड़ा, लड़कों को बाहर किराए पर कमरे मिलने बंद हो गए.

मुसलमानों की कमज़ोर आर्थिक स्थिति का असर उनकी पढ़ाई या ड्रॉपआउट रेट पर पड़ा है.

45 साल शिबली अकादमी में काम करने वाले सीनियर फ़ेलो प्रोफ़ेसर उमैर सिद्दीक़ी अपना उदाहरण देते हैं.

वो कहते हैं, "मैंने चाहा कि मेरा बेटा कोटा या आकाश कोचिंग में जाकर नीट में कोचिंग कर ले. हमने एक बार बहुत उधार लेकर अपने बच्चे को भेजा. वो नहीं आ पाया. दूसरी बार हमारी हिम्मत नहीं हुई कि सिर्फ़ तीन महीने की कोचिंग के लिए पैसा जमा करें."

प्रोफ़ेसर उमैर सिद्दीक़ी के मुताबिक़, "जब हमारा ये हाल ये है, तो हमारा आम भाई जो ठेला लगाता है, जो छोटी सी दुकान खोलता है, जो खेतों में काम करता है, जो मज़दूरी करता है, जो ऑटो चलाता है, वो कैसे अपना पेट पालेगा या अपने बच्चों की पढ़ाई का ख़्वाब देखेगा."

"अब्दुल कलाम की बातें बहुत हसीन लगती हैं कि ख़्वाब देखो और उड़ान हासिल करो, लेकिन ख़्वाब देखने के लिए आँखें और नींद होनी चाहिए."

एक तरफ आम मुसलमान की शिक्षा के सीमित संसाधनों का सच है, तो दूसरी तरफ इस समुदाय पर आरोप है कि वे अपने बच्चो को आधुनिक शिक्षा के बदले पढने के लिए मदरसे भेजते हैं, जहाँ पढ़ाई का स्तर अच्छा नहीं होता. वहाँ पढ़ने वाले बच्चों को इस्लाम के बारे में तालीम तो मिलती है, लेकिन तेज़ रफ़्तार दुनिया में वो पिछड़ जाते हैं.

मदरसों पर बच्चों को अतिवादी बनाने के भी आरोप लगे हैं.

हाल ही में यूपी के एक मंत्री रघुराज सिंह ने मदरसों को आतंकवादियों का अड्डा बताया, हालाँकि मदरसा चलाने वालों का दावा है कि हाल के सालों में वहाँ आधुनिकीकरण के लिए कई क़दम उठाए गए हैं और मदरसे में पढ़ने वाले बच्चे नई ऊँचाइयों को छू रहे हैं.

आज़मगढ़ में एक मदरसा प्रमुख ओसामा सादी मदरसों पर लगने वाले सभी आरोपों को ग़लत बताते हैं और कहते हैं कि मदरसों की तालीम का बुनियादी मक़सद था मज़हबी किताबों और साहित्य का प्रसार और उसके लिए लोगों को तैयार करना और मदरसों में मात्र चार से छह प्रतिशत मुस्लिम बच्चे पढ़ते हैं.

एक आँकड़े के मुताबिक़ उत्तर प्रदेश में 16,000 से ज़्यादा मदरसे हैं.

उधर हिसाम सिद्दीक़ी के मुताबिक़ हाल के सालों में मुसलमानों में पढ़ाई के प्रति रुझान में तेज़ी से इज़ाफ़ा हुआ है.

वो कहते हैं:

“हमारा गाँव लखनऊ से 15 किलोमीटर दूर महबूबाबाद रोड पर है. उधर ज़्यादातर गाँव मुसलमानों के हैं. सुबह जब स्कूल के वक़्त बसें आती हैं, तो उनमें ज़्यादातर लड़कियाँ दिखाई देती हैं, जो लखनऊ पढ़ने आती हैं."

उनके मुताबिक़ उत्तर प्रदेश में मुसलमानों में पढ़ाई का रुझान 1992 बाबरी मस्जिद को तोड़ने के बाद बढ़ा है. वो कहते हैं, “पढ़ाई ही सब कुछ है. मेजॉरिटेरियनिज़्म का मुक़ाबला पढ़ाई से ही हो सकता है.”

मुसलमान सियासी हाशिए पर

सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति ने मुसलमानों को सियासत, सत्ता और चुनावी प्रतिनिधित्व से काफ़ी हद तक दूर किया है.

पिछले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में केवल 24 मुस्लिम उम्मीदवार जीते, जो 1991 में 23 मुस्लिम उम्मीदवारों की जीत के बाद सबसे कम संख्या थी.

उससे पहले 2012 के चुनाव में 403 सीटों वाले विधानसभा में 69 मुस्लिम उम्मीदवार चुन कर आए थे, जो अब तक का रिकॉर्ड है.

उस चुनाव में 17.1 प्रतिशत मुस्लिम उम्मीदवार चुनाव जीते थे, जो 2017 में घट कर 5.9 प्रतिशत पर आ गिरा.

पिछले विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने एक भी मुस्लिम उम्मीदवार को टिकट नहीं दिया, इसके बावजूद पार्टी को 310 सीटें हासिल हुईं. सभी दलों के 86 फ़ीसदी मुस्लिम उम्मीदवार बीजेपी उम्मीदवारों से हार गए.


देश की राजनीतिक सच्चाई ये है कि दिल्ली में सत्ता की कुंजी उत्तर प्रदेश से होकर गुज़रती है. बीजेपी ने 2014 और 2019 के आम चुनावों में भारी जीत हासिल की.

इन दोनों चुनावों में इसने उत्तर प्रदेश से एक भी मुस्लिम उम्मीदवार मैदान में नहीं उतारा. नतीजा ये निकाला जाने लगा कि बीजेपी को मुस्लिम वोटों की ज़रूरत नहीं है.

पंचायत से लेकर विधानसभा और संसद तक मुस्लिम प्रतिनिधित्व घटा है. एक सोच यह है कि सियासी पार्टियाँ अब मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट देने से संकोच करती हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि इससे उनकी जीत के आसार कम होते हैं.

कुछ मुसलमानों ने आरोप लगाए कि जहाँ समाजवादी पार्टी मुसलमान वोटों की उम्मीद रखती है, अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली पार्टी ने नए मुस्लिम जन-प्रतिनिधियों को खड़ा करने के लिए कोई ख़ास प्रयास नहीं किए.

हालाँकि बसपा ने 2017 के चुनाव में सबसे अधिक मुसलमान उम्मीदवार मैदान में उतारे और उसके बाद समाजवादी पार्टी ने.

कुल विधायकों में से बसपा के मुस्लिम विधायकों की संख्या जहाँ 14% से बढ़कर 31.25% हुई, साल 2007 और 2017 के बीच उत्तर प्रदेश में मुस्लिम विधायकों की संख्या कम हुई है.

साल 2017 में समाजवादी पार्टी के एक-तिहाई से ज़्यादा विधायक मुसलमान थे.

साल 2002 से 2017 के बीच जहाँ निर्दलीय उम्मीदवारों की संख्या में कमी आई, कुल निर्दलीय उम्मीदवारों में से निर्दलीय मुस्लिम उम्मीदवारों का प्रतिशत आठ से बढ़कर 10 हुआ. पिछले दो विधानसभा चुनावों में किसी भी निर्दलीय मुस्लिम उम्मीदवार ने चुनाव नहीं जीता है.

जहाँ तक मुस्लिम पार्टियों की बात है, साल 2012 में पीस पार्टी ने चार सीटें जीती. उससे पहले साल 1996 और 2002 में राष्ट्रीय लोकतांत्रिक (डेमोक्रेटिक) पार्टी ने मुसलमानों का प्रतिनिधित्व करने की कोशिश की, लेकिन उसे कोई सीट नहीं मिली. इस पार्टी की शुरुआत 1995 में अरशद ख़ान ने की थी.

साल 2017 में एआईएमआईएम का प्रवेश हुआ. पार्टी ने स्थानीय निकाय के चुनाव में जिन 38 सीटों पर चुनाव लड़ा, उनमें से वो एक भी सीट नहीं जीत पाई. इस बार पार्टी 100 सीटों पर लड़ने का सोच रही है.

कुछ मुसलमानों से जब एआईएमआईएम के विकल्प पर बात की, तो उनकी फ़िक्र थी कि इससे राज्य में ध्रुवीकरण और बढ़ने का ख़तरा है.

मार्च-अप्रैल में होने वाले विधानसभा चुनाव में क्या बीजेपी मुसलमानों को टिकट देगी?

पार्टी के अल्पसंख्यक मोर्चे के राज्य अध्यक्ष कुंवर बासित अली कहते हैं, "पार्टी जाति (और धर्म) को देख कर टिकट नहीं देती. पार्टी टिकट देती है सर्वे के आधार पर, ज़िले से भेजी रिपोर्ट के आधार पर. और जो लोग क्षमतावान हैं, पार्टी के जीतने वाले चेहरे हैं, पार्टी उन्हें ही टिकट देती है."

उन्हें उम्मीद है कि इस बार पार्टी कुछ मुस्लिम उम्मीदवारों को चुनावी मैदान में उतारेगी. वो कहते हैं, "पार्टी में उत्तर प्रदेश में कई मुस्लिम चेहरे हैं. मुझे लगता है कि 10-12 मुस्लिम चेहरों को टिकट मिल सकता है लेकिन उसका आधार अब भी वही है कि जो जीत सकता है, उसे ही टिकट दिया जाएगा. जाति आधार नहीं है."

कुंवर बासित अली के मुताबिक़ उनकी पार्टी में मंडल और ज़िलों में 44,000 मुस्लिम कार्यकर्ता और पदाधिकारी काम कर रहे हैं, "लेकिन जब हम बूथ तक जाते हैं तो यही संख्या लाखों में पहुँच जाती है. और यही लाखों लोग जब अपने लाखों परिवार वालों के वोट बीजेपी को देंगे, तो अखिलेश यादव और प्रियंका गाँधी के होश उड़ जाएँगे."

बासित अली मुसलमानों को भी नसीहत देते हैं, "मुसलमानों को भी तय करना होगा कि बीजेपी को जिताने में उनकी हिस्सेदारी भी हो. बीजेपी सबको साथ लेकर चल रही है लेकिन अब वक़्त आ गया है कि कांग्रेस के ख़ूनी पंजे और समाजवादी पार्टी के विनाशकारी साइकिल के चंगुल से बाहर निकल कर बीजेपी की विकास वाली सोच के साथ चलें."

इसमें कोई शक नहीं कि मुसलमानों के पिछड़ेपन का इतिहास पुराना है. लखनऊ में राजनीतिक विश्लेषक वीरेंद्र नाथ भट्ट कहते हैं, “मुसलमानों के आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक, मार्जिनलाइज़ेशन का काम पिछले 30 सालों से ज़्यादा से चल रहा है. उनसे कहा जाता है कि उन्हें बस बीजेपी को हराना है. उनका अपना कोई सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, मजहबी मसला नहीं है. वो कोई मुद्दा नहीं है.”  

‘मुसलमान-मुक्त’ गाँव

बेहतर भविष्य की उम्मीद करते मुसलमान पर गुज़रे वक़्त का बोझ भी है.

साल 2013 में मुज़फ़्फ़रनगर सांप्रदायिक दंगों में अपने गाँव लिसाढ़ से जान बचाकर भागे अब्दुल बासित आज तक अपने पुश्तैनी घर वापस नहीं लौट पाए हैं.

इन दंगों में क़रीब 50 लोग मारे गए थे और आज भी दंगों के घाव नहीं भरे हैं.

अब्दुल बासित बीबीसी की टीम के साथ आठ साल में पहली बार गाँव वापस लौटे, तो बेहद डरे हुए थे.

कार में बैठे रहने के बावजूद उन्होंने अपने चेहरे को एक गमछे से ढँक लिया, ताकि उन्हें कोई पहचान न सके.

 डर के मारे वो कार से बाहर नहीं उतरे. दंगों से पहले लिसाढ़ की 6,000 आबादी में से 2,000 मुसलमान थे, लेकिन अब लिसाढ़ एक 'मुसलमान-मुक्त' गाँव है.

ग़ैर-सरकारी संस्थाओं के अनुसार मुज़फ़्फ़रनगर में केवल 20,000 लोग अपने गाँवों को वापस लौटे हैं, अधिकतर आज भी दूसरे गाँवों और कैंपों में रह रहे हैं.

अब्दुल बासित कहते हैं, "उनकी मंशा यही थी कि मुसलमानों को हमेशा के लिए यहाँ से हटा दिया जाए."

अब वो अपने लिसाढ़ से आठ किलोमीटर दूर कांधला बस्ती में आबाद हैं, जहाँ केवल उनके धर्म वाले ही रहते हैं और जहाँ उनके अनुसार वो ख़ुद को अपने लोगों के बीच सुरक्षित महसूस करते हैं.

वो कहते हैं:

"मुसलमान इस वक़्त दबा हुआ है, ख़ामोश है. उसने सिर्फ़ अल्लाह पर भरोसा रखा हुआ है. आज का प्रशासन जो है, वो बिल्कुल मुसलमानों के ख़िलाफ़ है."

दंगा पीड़ित मुसलमानों ने योगी सरकार पर आरोप लगाया था कि वो सिर्फ़ हिंदू पीड़ितों को वापस बसाने के लिए कदम उठा रही है.

अब्दुल बासित और शोएब की तरह उतर प्रदेश के दूसरे कई मुसलमानों के बीच ये सोच है कि प्रशासन उनके ख़िलाफ़ है.

इस वक़्त केवल सुरक्षा, रोटी, कपड़ा और मकान हासिल करना उनकी प्राथमिकता है.

बीबीसी से बातचीत में कई मुसलमानों ने आरोप लगाया कि अगर कोई मुस्लिम पीड़ित शिकायत दर्ज कराने थाने जाता है, तो उसे डर इस बात का होता है कि कहीं उसे ही गिरफ़्तार न कर लिया जाए या उसे झूठे केस में फँसा न दिया जाए.

वो कुछ दक्षिणपंथी हिंदू संस्थाओं से भी भयभीत हैं, जो उनके अनुसार 'घर वापसी' और 'लव जिहाद' की आड़ में मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाते हैं

उदाहरण के तौर पर इस साल जनवरी में, मेरठ में मुस्लिम विरोधी कहे जाने वाले उपदेशक स्वामी आनंद स्वरूप ने एक सामूहिक सभा में कहा कि हिंदुओं को "यह तय करना चाहिए कि वे मुसलमानों से कुछ भी नहीं ख़रीदेंगे."

 उन्होंने कहा:

"यदि आप उन्हें सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक रूप से नष्ट कर देते हैं, तो वे इस्लाम से हिंदू धर्म में परिवर्तित होना शुरू कर देंगे" 

मेरठ के मुस्लिम बुनकरों के इलाक़े दक्षिण इस्लामाबाद के खालिद अंसारी कहते हैं कि इस बयान के बाद बुनकरों में चिंता पैदा हुई, क्योंकि उनका धंधा ऐसा है जो हिंदू और मुस्लिम समुदायों के आपसी सहयोग से चलता है. उन्होंने कहा, "उस बयान को कई महीने हो गए लेकिन वो माहौल ख़राब करने में विफल रहा."

पेशे से वकील शिशिर चतुर्वेदी हिंदू महासभा के राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं और उन पर आरोप है कि अपनी तीखी भाषा से वो मुसलमानों के खिलाफ़ ज़हर फैलाते हैं.

बातचीत के दौरान उन्होंने गर्व से बताया कि 'लव जिहाद' की मारी क़रीब 550 लड़कियों को उन्होंने 'समझा-बुझाकर उनके परिवारों के पास पहुँचाया' और 125 मुस्लिम लड़कियों की हिंदू लड़कों से शादी करवाई.

योगी सरकार के ख़िलाफ़ शिकायत को वो मुसलमानों का 'विक्टिम कार्ड' खेलना बताते हैं.

वो कहते हैं, "दुनिया में जहाँ-जहाँ इस्लाम को मानने वाले लोग हैं या तो वो ग़ैर-धर्म के लोगों को मार रहे हैं, काट रहे हैं या फिर एक दूसरे की गर्दन काट रहे हैं."

"जहाँ मुसलमान हैं, वहाँ उनको तकलीफ़ होती है. इस देश में न ईसाइयों को, न सिखों को, न बौधियों को, न जैनियों को (तकलीफ़ है). वो अल्पसंख्यक के नाम पर ख़ुद को सताने की शिकायत नहीं करते."

"ज़हर खाकर सो जाएँगे क्या करें"

सितंबर में भाजपा-शासित मध्य प्रदेश के इंदौर शहर में एक मुस्लिम चूड़ी-विक्रेता तसलीम अली को पीटे जाने का वीडियो वायरल हुआ.

बाद में पुलिस ने तसलीम पर पॉक्सो सहित कई धाराओं में मामला दर्ज किया था और उन्हें जेल भेज दिया गया था.

तसलीम पर आरोप था कि वो एक हिंदू नाम से एक 'हिंदू इलाक़े' में सामान बेच रहे थे. तसलीम तीन महीने से ज़्यादा जेल में रहे और फिर उन्हें अदालत ने ज़मानत दे दी.

तस्लीम का गाँव बिराइचमऊ उत्तर प्रदेश में है, जहाँ इंदौर की घटना के बाद लोगों में डर बैठा हुआ है.

इन सबके बीच तसलीम की ग़ैर मौजूदगी में उनका परिवार खाने को मोहताज हो गया था.

अपने पति की रिहाई से पहले उनकी पत्नी नीता ने बिलखते हुए बताया था, “मेरे पाँच बच्चे हैं. क्या करके खिलाऊं? कोई दे देता है तो खा लेती हूँ, नहीं देता तो थोड़ा बहुत मेहनत मज़दूरी करती हूँ. कभी-कभी रो-रोकर बच्चे भूखे सो जाते हैं.”

नीता को घटना के बारे में वीडियो देखकर पता चला तो वो दौड़ी इंदौर जेल गईं, जहाँ उनकी तसलीम से बात हुई.

वो कहती हैं, “(उनका) मुंह सूजा था, (वो) ज़ख़्मी थे. कहने लगे कि सब्र कर लेना जैसे भी खिलाना हो, खिलाना. हम तो जेल ही में हैं. ये कहकर वो रोने लगा. मैंने समझाया कि कभी न कभी तो छूटोगे. सब्र करो.”

जयपुर, दिल्ली जैसी जगहों से चूड़ियाँ ख़रीदकर उन्हें गाँवों, शहरों में बेचने का काम गाँव वालों का पुश्तैनी काम है, लेकिन इंदौर में हुई घटना के बाद लोगों ने डर के मारे गाँव से बाहर जाना लगभग छोड़ दिया है.

बेटे का ज़िक्र आते ही तसलीम के पिता मोहर अली की आँखों से आँसू ही नहीं रुकते थे.

वायरल वीडियो के बारे में वो कहते हैं, "तुम देख लोगो फ़ोटो, कैमरे में तो देखा नहीं जाएगा. बस अल्लाह की मर्ज़ी थी कि उसकी जान छोड़ दी."

वो कहते हैं, "धंधा नहीं है, पानी नहीं है, ज़हर खाकर सो जाएँगे. क्या करें?"

आने वाले उत्तर प्रदेश चुनाव को देखते हुए एक बार फिर मुसलमानों की स्थिति चर्चा में हैं. साथ में ये भी चर्चा में है कि मुसलमान इस स्थिति में बदलाव के लिए राजनीतिक रूप से क्या स्टैंड लेता है.

उनका राजनीतिक प्रतिनिधित्व न्यूनतम है, सामाजिक रूप से वो ख़ुद को अलग-थलग पाते हैं और आर्थिक रूप से वे समाज के हाशिए पर हैं.

जैसा कि आँकड़े बताते हैं कि किसी भी पार्टी की सरकार में मुसलमानों की आर्थिक और सामाजिक स्थिति में कुछ बड़ा बदलाव नहीं हुआ. लेकिन उत्तर प्रदेश में बीजेपी के शासनकाल के दौरान मुसलमानों में असुरक्षा बढ़ी है और उनके लिए इन चुनाव में ये बड़ा मुद्दा हो सकता है.


बीबीसी संवाददाता: ज़ुबैर अहमद, विनीत खरे
डेटा विश्लेषण: तज़ीन पठान
शॉर्टहैंड: शादाब नज़्मी
फोटो: गेट्टी, ज़ुबैर अहमद