मायावती ने खु़द ही बताई अभी चुनावी रैलियां नहीं करने की वजह

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उत्तर प्रदेश में इस साल की शुरुआत में होने वाले विधानसभा चुनावों में बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती की चुप्पी हैरान करने वाली है.
एक ओर सभी पार्टियों के नेता धुआंधार रैलियां कर रहे हैं तो दूसरी ओर सूबे की चार बार मुख्यमंत्री रहीं मायावती ने अभी तक एक भी रैली नहीं की है.
मायावती के समर्थक, पर्यवेक्षक और उनके राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को भी यह सवाल परेशान कर रहा है. हालांकि, इन सवालों के कुछ जवाब बसपा सुप्रीमो मायावती ने एक बयान जारी करके दिए हैं.
पार्टी प्रमुख मायावती ने नए साल के मौक़े पर शनिवार को एक प्रेस रिलीज़ जारी किया है, जिसमें उन्होंने विधानसभा चुनाव की तैयारियों और रैलियों को लेकर बीजेपी और कांग्रेस पर निशाना साधा है.

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मायावती ने कहा है कि यह उनकी पार्टी की कार्यशैली नहीं है कि वो चुनाव के दो-ढाई महीने पहले से ही धुआंधार रैलियां करे.
उन्होंने कहा कि 'बीजेपी और कांग्रेस केंद्र या राज्य जहां भी सत्ता में होती हैं, वहां पर चुनावों से पहले रैलियां शुरू कर देती हैं क्योंकि वहाँ पर पूंजीपतियों और धन्नासेठों का पैसा लगा हुआ है, अगर बीएसपी ऐसा करेगी तो चुनावों के समय पार्टी जनसभा का आर्थिक बोझ नहीं उठा पाएगी.'
मायावती ने रैलियां न करने पर उठते सवालों का भी जवाब दिया है.

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मायावती का कहना है कि 'जब बीजेपी या कांग्रेस केंद्र या राज्य की सरकारों में होती हैं तो तब यह चुनावों से दो-ढाई महीने पहले ही ताबड़तोड़ रैलियों, शिलान्यास, उद्घाटन और लोकार्पण में लग जाती हैं और सरकारी ख़र्चे पर ख़ूब जनसभाएं करती हैं, जिसमें आधी भीड़ सरकारी अधिकारियों और आधी भीड़ टिकट पाने वालों की होती है.'
"जब ये पार्टियां सत्ता में नहीं होती हैं तो हमारी पार्टी की तरह ही चुनाव घोषित होने के बाद भी ताबड़तोड़ रैलियां नहीं करती हैं क्योंकि तब सरकार का नहीं बल्कि पार्टी का पैसा ख़र्च होता है.
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''हमारी पार्टी दूसरी पार्टियों की नक़ल करने में भरोसा नहीं करती है बल्कि अपनी पार्टी के लोगों की आर्थिक स्थिति को ही ध्यान में रखकर पूरी सूझ बूझ से काम भी करती है. अगर मैं इन पार्टियों की तरह इनकी नक़ल करके आए दिन ख़ूब जनसभाएं करती हूं तो फिर मेरे लोग चुनाव के समय में रैलियों के लिए आर्थिक बोझ नहीं उठा पाएंगे क्योंकि हमारी पार्टी ग़रीबों मज़लूमों की पार्टी है न कि पूंजीपतियों या धन्नासेठों की पार्टी.''
मायावती ने कहा, "अगर हम दूसरों की नक़ल करेंगे तो इससे फिर धन का अभाव होने पर चुनाव में काफ़ी कुछ नुक़सान पहुंच सकता है."
इसके बाद मायावती पर चुनावी रैलियां न करने को लेकर उठ रहे सवालों पर उन्होंने कहा है कि उन्हें इसकी परवाह नहीं है.
उन्होंने कहा, "चाहे विरोधी पार्टियां ख़ूब कटाक्ष करें या मीडिया भी ख़ूब उल्टा-सीधा लिखे. चुनाव की तैयारी को लेकर हमारी अलग कार्यशैली और तौर-तरीक़े हैं जिन्हें हम बदलना नहीं चाहते हैं. हमारी पार्टी की कार्यशैली के लिए दूसरी पार्टियों को हमारी चिंता नहीं करनी चाहिए, हमें ख़ुद अपनी पार्टी की चिंता है."

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मायावती के रैलियां न करने पर उठते सवाल
हाल ही में बीएसपी प्रमुख मायावती के चुनावी रैलियां न करने पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने तंज़ कसा था.
उन्होंने गुरुवार को मुरादाबाद, अलीगढ़ और उन्नाव में की गई 'जन विश्वास यात्रा' के दौरान कहा था कि मायावती 'डरी हुई हैं.'
उन्होंने कहा था, "बहनजी (मायावती) की तो अभी ठंड ही नहीं उड़ी है. ये भयभीत हैं. बहनजी चुनाव आ गया है, थोड़ा बाहर निकलिए. बाद में ये न कहना कि मैंने प्रचार नहीं किया था. बुआ (मायावती), बबुआ (अखिलेश यादव) और बहन (प्रियंका गांधी वाड्रा) तीनों इकट्ठे हो जाएं तो भी मेरे भाजपा के कार्यकर्ताओं के आगे दाल नहीं गलने वाली है."
इससे पहले 23 दिसंबर को कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी वाड्रा ने भी मायावती के ज़मीनी मुद्दों से दूर रहने पर सवाल खड़े किए थे.
पत्रकारों से बातचीत में प्रियंका गांधी ने कहा था कि विपक्षी पार्टियों में सिर्फ़ कांग्रेस ही है जो बीते कई सालों से आगे आकर जनता के मुद्दों को उठा रही है.
उन्होंने कहा था, "अगर आप बीते दो सालों को देखें तो उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को छोड़कर कोई भी पार्टी नहीं है जिसने कोई प्रदर्शन किया हो, धरना दिया हो और लोगों के मुद्दों को लेकर सड़कों पर उतरी हो. इसका कारण मेरी समझ से बाहर है. मैं समझ नहीं पा रही हूं कि मायावती जी इतनी चुप क्यों हैं?"

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अमित शाह के व्यंग्य पर मायावती का जवाब
मायावती ने शनिवार को जारी किए गए अपने बयान में रैली न करने पर अमित शाह के 'ठंड' वाले कटाक्ष का भी जवाब दिया है.
उन्होंने कहा है, "ठंड में जो इनको गर्मी चढ़ी हुई है, यह सरकार में रहकर ग़रीबों के ख़ज़ाने की गर्मी इन्हें चढ़ी हुई है. जब ये पार्टियां सत्ता में नहीं होती हैं तब इन्हें अपने विरोधियों पर ठंडी-गर्मी का कटाक्ष करने की याद नहीं आती है."
बीएसपी के महासचिव और प्रवक्ता सतीश चंद्र मिश्र ने हाल ही में 'टाइम्स ऑफ़ इंडिया' को इंटरव्यू दिया है, जिसमें उनसे पूछा गया था कि मायावती ग्राउंड पर क्यों नहीं दिख रही हैं?
इस सवाल पर मिश्र ने कहा, "बहनजी दिन में 18-18 घंटे काम कर रही हैं और बूथ स्तर से पार्टी की मॉनिटरिंग कर रही हैं. वो पहले ही सात सितंबर और 9 अक्तूबर को दो पार्टी रैलियों को संबोधित कर चुकी हैं. लखनऊ रैली में पांच लाख से अधिक लोग इकट्ठा हुए थे."

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उन्होंने बताया था कि मायावती जल्दी ही पार्टी का प्रचार शुरू करेंगी और वो राज्य के हर ज़िले में जाएंगी.
सतीश चंद्र मिश्र ने कहा कि उनकी पार्टी की तैयारियां बूथ स्तर से शुरू हो रही हैं और उनके कार्यकर्ता न ही सड़कों पर उतरते हैं और न ही तस्वीरें लेते हैं, उनकी पार्टी के काम करने के तरीक़े टीवी और अख़बारों में दिखने वाले लोगों से अलग हैं.
इसके अलावा मिश्र का दावा है कि उनकी पार्टी इस बार 2007 से भी बेहतर प्रदर्शन करेगी और पूर्ण बहुमत लाएगी.
मायावती का नीचे जाता ग्राफ़
बीएसपी के लिए इस चुनाव को सत्ता के क़रीब पहुंचने से अधिक उसके लिए प्रासंगिक बने रहने को माना जा रहा है. साल 2007 में पार्टी ने अपने दम पर पूर्ण ऐतिहासिक बहुमत प्राप्त किया था और मायावती चौथी बार राज्य की मुख्यमंत्री बनी थीं.
2012 में मायावती को हार मिली और उसके बाद से लगातार उनकी पार्टी का ग्राफ़ नीचे जा रहा है.

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साल 2017 में बीजेपी ने पिछड़े वर्ग पर एकछत्र क़ब्ज़ा जमाते हुए उसके एनडीए गठबंधन ने 403 में से 306 विधानसभा सीटें जीती थीं. हालांकि बीएसपी को 22% वोट मिले थे लेकिन सिर्फ़ उसने 19 सीटें जीती थीं.
इसके साथ ही पार्टी के बाग़ी होते नेता और नेताओं को निष्कासित करने की लहर के कारण पार्टी को भी धक्का लगा. मायावती को पार्टी विधायकों के पाला बदलने के बाद विधानसभा में दो बार नेता बदलने पड़े.
2017 में भी पार्टी के बड़े नेता स्वामी प्रसाद मौर्य ने मायावती पर टिकट बेचने का आरोप लगाने के बाद पार्टी छोड़ दी थी. इस बार भी बाग़ी हैं लेकिन वो शांत बताए जा रहे हैं और बीएसपी की दूसरी बड़ी समस्या उसमें दूसरी पंक्ति का नेतृत्व न होना भी है.
लालजी वर्मा और राम अचल राजभर जैसे बीएसपी नेता भी सपा में शामिल हो चुके हैं और बीएसपी में मायावती के अलावा किसी और जाति का कोई करिश्माई नेता नहीं है.
2017 में बीएसपी के जहां विधानसभा में 19 विधायक जीतकर आए थे उनकी संख्या सदन में आज बस तीन रह गई है.
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