यूपी चुनाव: योगी, प्रियंका, अखिलेश सब मैदान में, लेकिन मायावती हैं कहां?

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- Author, सुशीला सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
भारत की सबसे अधिक आबादी वाले राज्य उत्तरप्रदेश में अब विधानसभा चुनाव चंद महीने ही दूर हैं.
यहां समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव विजययात्रा रथ निकाल रहे हैं तो कांग्रेस पार्टी की महासचिव प्रियंका गांधी लगातार एक के बाद एक रैलियां कर रही हैं. वे महिलाओं को 40 प्रतिशत टिकट देने और इंटर पास होने वाली लड़कियों को स्मार्टफ़ोन और स्कूटी देने का एलान भी कर चुकी हैं. यानी युवा और महिलाओं को साधने में उनका ख़ासा ज़ोर दिखाई दे रहा है.
चुनाव प्रचार में बीजेपी भी पीछे नहीं है. इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पिछले दो महीनों में छह बार पूर्वांचल का दौरा कर चुके हैं. राज्य के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा भी आए दिन प्रदेश में रैलियां कर रहे हैं.
लेकिन एक चेहरा है जो यूपी के चुनावी मैदान से नदारद दिखता है और वो है बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायवती का.

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कहां हैं मायावती?
साल 2017 में हुए विधानसभा चुनाव में मायावती ने 19 सीटें जीतकर तीसरा स्थान हासिल किया था.
ऐसे में उनके चुनावी मैदान से ग़ायब होने को लेकर चर्चाएं तेज़ हैं और राजनीतिक विश्लेषक हैरानी जता रहे हैं कि चार बार राज्य की मुख्यमंत्री रहीं मायावती आख़िर इस बार चुनाव में सक्रिय क्यों नहीं दिख रही हैं? वो भी ऐसे समय में जब उनके कई विधायक छिटक चुके हैं और उनके पास इक्के-दुक्के विधायक ही रह गए हैं.
उत्तरप्रदेश की राजनीति पर पैनी नज़र रखने वाले जानकार मायावती की अगामी चुनाव में राजनीतिक निष्क्रियता को उन पर चल रहे आय से अधिक संपति मामले से जोड़कर देखते हैं.
वरिष्ठ पत्रकार रामदत्त त्रिपाठी मानते हैं कि ये हैरान करने वाली बात है कि मायावती कहीं दिख क्यों नहीं रही हैं.
उनके अनुसार, "संभवत: ये कहा जा रहा है कि उनपर और उनके परिवार के सदस्यों पर आय से अधिक संपति के मामलों के कारण वे दबाव में हैं. नतीजन उन्होंने बयान दिया था कि विधानसभा या राज्यसभा के चुनाव में मुझे अगर जरूरत पड़ेगी तो मैं बीजेपी की मदद कर दूंगी."
जातिगत वोटबैंक
बीबीसी से बातचीत में रामदत्त त्रिपाठी कहते हैं कि राम मंदिर आंदोलन से ही बीजेपी और संघ की ये रणनीति रही है कि वो दलित वोटरों को अपने खेमे में लाए और ऐसा हुआ भी है. ऐसे में अगर मायावती इस दबाव से निष्क्रिय होती हैं इससे उन्हें मदद ही मिलेगी.
वरिष्ठ पत्रकार शरत प्रधान भी रामदत्त त्रिपाठी की बात से सहमत दिखते हैं. वो कहते हैं कि उन पर सीबीआई और ईडी की जो तलवार लटकी है उसी के डर से उन्होंने चुनाव से दूरी बनाए रखने का फ़ैसला किया है.
साथ ही वे कहते हैं कि मायावती का जातिगत आधार वाला निश्चित वोटबैंक है जो उन्हें मिलता ही है. लेकिन वे इस लड़ाई में अब कहीं दिखाई नहीं देती.

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लेकिन वरिष्ठ पत्रकार सुनीता एरॉन इस बात से सहमत नहीं दिखतीं.
बीबीसी से बातचीत में वो कहती हैं कि मायावती की कार्यशैली देखें तो वे हमेशा से चुनाव से ठीक पहले ही रैलियां करना शुरू करती हैं. हालांकि पिछले चुनावों से तुलना की जाए तो वो इस बार में थोड़ी सुस्त नज़र आ रही हैं.
वो कहती हैं , "मायावती अपने काडर को लामबंद करती हैं. मायावती बूथ लेवल पर तैयारी करवाती हैं और ये देखती हैं कि वो किन विधानसभा सीटों पर फोकस कर रहे हैं."
साथ ही भ्रष्टाचार के मुद्दे पर सुनीता एरॉन कहती हैं कि ये बड़ा मुद्दा हो सकता है लेकिन जनता का मुद्दा नहीं है.
वो कहती हैं, "ये चर्चा चल रही है कि बीजेपी एक हैंडल की तरह इस मुद्दे का उनके ख़िलाफ़ इस्तेमाल कर रही है. ऐसी चर्चाएं तो नेताओं के ख़िलाफ़ चलती रहती हैं लेकिन चुनाव के समय तो नेता मैदान में आते ही हैं."
नेताओं ने छोड़ा मायावती का साथ
माना जाता है कि इंद्रजीत सरोज, लालजी वर्मा और सुखदेव राजभर के बहुजन समाज पार्टी छोड़ने की मुख्य वजह मायावती की राजनीतिक निष्क्रियता ही रही.
सुखदेव राजभर बसपा के विधायक और पूर्व विधानसभा अध्यक्ष भी रह चुके थे. उनका हाल ही में निधन हुआ है. सुखदेव भी अपने बेटे को अखिलेश यादव की पार्टी से जोड़ गए थे वहीं हाल ही में हरीशंकर तिवारी भी अपने बेटों और भांजे को सपा की साइकिल पर सवार कर चुके हैं. ऐसे में पूर्वांचल की राजनीति में ओबीसी और ब्राह्मण इन दो बड़े चेहरों का निकलना भी मायावती के लिए एक बड़े झटके के तौर पर ही माना जा रहा है.
वहीं ब्राह्मणों से जोड़ने के लिए मायावती ने पार्टी के महासचिव सतीश चंद्र मिश्र को ज़िम्मेदारी दी हुई है. इस बीच उनकी पत्नी कल्पना मिश्र का भी ब्राह्मण समाज की महिलाओं को संबोधित करते हुए वीडियो सोशल मीडिया पर डाला गया था.
पार्टी में यंग ब्रिगेड माने जाने वाले आकाश आनंद और कपिल मिश्र पार्टी को युवाओं से जोड़ने का काम कर रहे हैं और सोशल मीडिया पर रणनीति बना रहे हैं.
हालांकि राजनीति विश्लेषक मानते हैं कि हर पार्टी के पास आईटी सेल और सोशल मीडिया है और अगर तुलना की जाए तो बीजेपी और सपा की टीम इस मामले में बसपा से बेहतर और आगे हैं.

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मायावती का ग्राफ़ गिरा
शरत प्रधान कहते हैं, "मायावती मुख्य लड़ाई में कहीं दिखाई नहीं देती. वे केवल अपने कुछ लोगों को भेजकर ब्राह्मण सम्मेलन करा देती हैं, प्रेस नोट जारी करवाती हैं या ट्वीट कर देती हैं, ऐसे में उनका जो वोटर उनके साथ जुड़ता था वो इस सीमित कोशिश से कैसे जुड़ेगा?''
मायावती साल 2017 में हुए विधानसभा चुनाव में 19 सीटें जीतकर तीसरे स्थान पर रही थीं. वो जब सत्ता में आती हैं उनका ग्राफ बढ़ता है और हटती है तो वो गिर जाता है. आंकड़े बताते हैं कि साल 2007 के बाद से साल 2012 और 2017 में उनका जनाधार गिरा है.
हालांकि साल 2007 में सोशल इंजीनियरिंग के ज़रिए उन्होंने ब्राह्मणों को जोड़ने की कोशिश की और दलित-ब्राह्मण एकता के नाम पर सम्मेलन भी करवाए गए. इसका असर दिखाई दिया लेकिन विश्लेषक ये भी मानते हैं कि उस दौरान मुलायम सिंह यादव के विरोध में भी बयार बह रही थी.
क्योंकि उस दौरान क़ानून-व्यवस्था की स्थिति ठीक नहीं थी जिसका फायदा मायावती को मिल पाया था.

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राज्य में तकरीबन 22 फ़ीसद दलित आबादी है और मायावती इस बार आरक्षित सीटों पर अपनी रणनीति केंद्रित करती दिख रही हैं.
लेकिन इस पर रामदत्त त्रिपाठी तर्क देते हुए आरक्षित सीटों का गणित समझाते हैं.
वो कहते हैं, "आरक्षित सीटों पर दलित वोट बंट जाते हैं क्योंकि हर पार्टी का उम्मीवार ही दलित या पिछड़ी जाति से होता है. ऐसी सीटें वही पार्टी जीतती है जिसके साथ बाकी समुदाय भी जुड़े हुए हों. और फिलहाल इस कोशिश में मायावती सफल होती नहीं दिख रही हैं."

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सुनीता एरॉन मानती हैं कि इस बार प्रदेश में बीजेपी काफ़ी मजबूत स्थिति में दिख रही है.
वो बताती है कि हालांकि बीजेपी के सामने एंटी-इनकमबेंसी और अन्य मुद्दे जैसे मुख्यमंत्री से नाराज़गी, कृषि क़ानूनों या गन्ना किसानों को उचित दाम ना मिलना आदि उनके विरोध में काम कर सकते हैं लेकिन वो बूथ से लेकर विधानसभा क्षेत्रों में काम कर रही है. उनका संगठनात्मक ढ़ांचा बड़ा है.
उनके अनुसार जो मज़बूत है वो इतनी मेहनत कर रहा है तो जिनकी कम सीटें हैं उन्हें और ज़्यादा मेहनत करने की ज़रूरत है. वहीं अखिलेश ने भी देर से शुरुआत की है लेकिन उनकी रैली में भीड़ और उत्साह दिखता है. प्रियंका गांधी भी मैदान में मायावती से ज़्यादा ही दिख रही हैं.
ऐसे में ये चुनाव सभी पार्टियों के लिए काफ़ी मुश्किल है. ऐसी उम्मीद की जा रही थी कि वो जल्दी अपनी मुहीम शुरू करेंगी लेकिन इसके विपरित ये देखा जा रहा है कि वे पंजाब की राजनीति पर फोकस कर रही हैं.
वहीं विश्लेषक ये भी मानते हैं कि मायावती कहीं न कहीं AIMIM के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी की तरह भूमिका निभा कर बीजेपी को फायदा और सपा को नुकसान पहुंचाने की कोशिश कर रही हैं. लेकिन उनकी आगे की रणनीति चुनाव के नतीजों के बाद ही पता चल पाएगी.
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