यूपी चुनाव में बीजेपी का चेहरा क्या योगी नहीं मोदी का होगा ?

नरेंद्र मोदी

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    • Author, अनंत झणाणे
    • पदनाम, लखनऊ से, बीबीसी हिंदी के लिए

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मंगलवार को प्रयागराज में थे. जहाँ उन्होंने दीनदयाल अंत्योदय योजना के तहत स्वयं सहायता समूहों को 1000 करोड़ रुपये उनके खतों में सीधे ट्रांसफ़र किए. अनुमान है कि इससे 16 लाख ग्रामीण महिलाओं को फ़ायदा होगा.

माना जा रहा है कि महिला मतदाताओं को लुभाने के लिए पीएम मोदी की ये सभा अहम साबित हो सकती है. यह भी कहा जा रहा है कि यूपी चुनाव में नरेंद्र मोदी ही हर तरफ़ नज़र आएँगे.

इसकी वजह भी है. बीते अक्टूबर से लेकर अब तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यूपी का 13 बार दौरा कर चुके हैं जिसमें उन्होंने कुशीनगर, सिद्धार्थनगर, वाराणसी, सुल्तानपुर, महोबा, नोएडा, गोरखपुर, बलरामपुर, शाहजहांपुर और प्रयागराज में करोड़ों की परियोजनाओं का लोकार्पण और शिलान्यास किया है.

इस दौरान तीन दिन वो अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी में बिता चुके हैं और तीन दिन उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में भी गुज़ारे है.

मोदी

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23 दिसंबर को प्रधानमंत्री फिर अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी लौटेंगे जहाँ पर वो एक डेयरी और बायो गैस प्लांट के अलावा कई सारी छोटी-छोटी परियोजनाओं का शिलान्यास करेंगे. 28 दिसंबर को प्रधानमंत्री कानपुर मेट्रो के पहले चरण को हरी झंडी दिखाएंगे.

जैसे-जैसे चुनाव करीब आ रहे हैं वैसे-वैसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उत्तर प्रदेश में पूरे बन चुके या पूरे होने वाले हर बड़े विकास कार्य का चेहरा बनने पहुँच रहे हैं.

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प्रोटोकॉल के तहत उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी इन कार्यक्रमों में मौजूद रहते हैं और परियोजनाओं से जुड़े भाषण भी देते हैं. लेकिन प्रधानमंत्री के इन 13 कार्यक्रमों के बाद अब सवाल उठने लगा है कि क्या हर कार्यक्रम के बाद 2022 के चुनावी रण में मोदी का क़द ऊंचा हो रहा है और योगी का क़द घटता नज़र आ रहा है?

योगी में है विश्वास, लेकिन?

हालाँकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लखनऊ के राजभवन में टहलते हुए योगी आदित्यनाथ के साथ तस्वीरें खिंचवाईं, उनके कंधे पर हाथ रखा. जनता उस तस्वीर में लोग भरोसे का भाव तलाशने लगी.

इन तस्वीरों को ख़ुद योगी आदित्यनाथ ने ट्वीट कर लिखा, "हम निकल पड़े हैं प्रण करके, अपना तन-मन अर्पण करके, ज़िद है एक सूर्य उगाना है, अम्बर से ऊँचा जाना है, एक भारत नया बनाना है."

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18 दिसंबर को प्रधानमंत्री मोदी ने योगी आदित्यनाथ के नाम का नया नारा दे डाला. उन्होंने योगी आदित्यनाथ का भरपूर समर्थन करते हुए कहा, "आज पूरे यूपी की जनता कह रही है - UP प्लस YOGI, बहुत हैं UPYOGI (उपयोगी)." और इस नारे को दो-तीन बार मंच से दोहराया और समर्थकों की भीड़ से भी बुलवाया.

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तो क्या यह प्रधानमंत्री मोदी की योगी में बढ़ते विश्वास की निशानी है या कुछ और? उत्तर प्रदेश की राजनीति पर लम्बे समय से नज़र बनाये हुए पत्रकार रतन मणि लाल कहते हैं, "योगी के नेतृत्व की स्वीकार्यता स्थिर है. कुछ लोग ऐसा ज़रूर मानते हैं कि चुनाव में अगर ख़राब प्रदर्शन हुआ तो उनको बदला भी जा सकता है. कुछ लोग कहते हैं कि वो काम तो कर रहे हैं लेकिन पार्टी के लोग उनसे इतने संतुष्ट नहीं हैं. मुझे यह लगता है की मोदी यहाँ लगातार बने रहकर, योगी की तारीफ़ करके इस धारणा को दूर करना चाहते हैं कि पार्टी योगी के साथ नहीं है. वो यह दिखाना चाहेंगे कि पार्टी पूरी तरह से योगी के साथ है."

वीडियो कैप्शन, यूपी चुनाव में प्रियंका गांधी की महिलाओं को लुभाने की रणनीति

तो क्या यह प्रधानमंत्री मोदी की योगी आदित्यनाथ के प्रति भरोसे की निशानी है? उत्तर प्रदेश की राजनीति की समझ रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार शरत प्रधान का मानना है कि यह सब दिखावा है.

वो कहते हैं, "यह तो बिकुल तय है कि मोदी योगी से कैंपेन के हर पहलू में आगे रहेंगे. मोदी बहुत आगे-आगे होंगे और योगी पीछे पीछे होंगे. उनके साथ फोटो में दिख जायेंगे. सबको मालूम है कि वोट मोदी के नाम पर मिलता है, और अभी तक मिलता आ रहा है. उनके अलावा कोई और नेता नहीं है. मोदी भी नहीं चाहेंगे कि ऐसी नौबत आ जाए कि योगी के नाम पर वोट मिलने लगे. प्रोजेक्शन सिर्फ़ मोदी का होगा, और योगी रहेंगे एक सो-कॉल्ड स्टार प्रचारक के रूप में. पार्टी ने देखा है कि राज्य के बाहर वे पार्टी को वोट नहीं दिला पाए हैं."

चुनावी लहर पैदा करने में कितने उपयोगी हैं योगी?

मोदी और योगी

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उत्तर प्रदेश में पिछले तीन चुनावों में हम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लगातार लहर देख चुके हैं. 2014 में लोक सभा, 2017 की विधान सभा और 2019 के लोक सभा चुनाव. बीजेपी की हैट्रिक तो हो चुकी है लेकिन क्या बीजेपी चौथी बार जीत की लहर पैदा कर पाएगी?

पत्रकार शरत प्रधान ने हाल ही में योगी आदित्यनाथ पर एक किताब लिखी है जिसका नाम है- "योगी आदित्यनाथ: रीलिजन, पॉलिटिक्स एंड पावर- द अनटोल्ड स्टोरी." उनकी नज़र में योगी आदित्यनाथ में चुनावी लहर पैदा करने की काबिलियत नहीं है.

वो कहते हैं, "चुनाव जीतने के लिए लहर पैदा करनी पड़ती है. मुझे नहीं लगता है कि योगी लहर पैदा कर सकते हैं. वो सिर्फ़ मोदी कर सकते हैं. पार्टी के अंदर भी योगी से आपको अलग-अलग कारणों से मोहभंग मिलेगा. ख़ासतौर से अहंकार की वजह से. पार्टी के कुछ मंत्री बताते हैं कि वो योगी से नहीं मिल सकते हैं."

इस चुनाव में लहर किधर है, किधर जाएगी, इस सवाल पर पत्रकार रतन मणि लाल का कहना है कि प्रदेश का हालिया चुनावी इतिहास बताता है कि उत्तर प्रदेश की जनता एक सरकार को दोबारा नहीं चुनती है.

महिलाएं

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वो बताते हैं कि, "1989 के बाद उत्तर प्रदेश में जो चुनाव हुए हैं, तब से कोई भी सरकार रिपीट नहीं हुई है. उत्तर प्रदेश का इतिहास रहा है कि कोई भी मुख्यमंत्री विधान सभा में अपना दूसरा टर्म नहीं जीत पाया है. यह इस बात का भी संकेत माना जाता है कि यहाँ के लोग किसी भी सरकार से पूरी तरह संतुष्ट नहीं होते हैं. और एक सरकार को फिर से मौका देने के बजाए किसी दूसरे को ही चुन लेते हैं."

"बीजेपी के लिए यह एक बहुत बड़ा चैलेंज है कि वो इस इतिहास को बदलने की कोशिश करे. बीजेपी को यह दिखाना होगा कि योगी इतने अलग और इतने लोकप्रिय किस्म के मुख्यमंत्री हैं की उत्तर प्रदेश में वो दूसरी बार जीतने जा रहे हैं. और अगर ऐसा होता है तो यह बीजेपी के लिए यूपी में बहुत बड़ी उपलब्धि होगी."

तो क्या यूपी-2022 मोदी बनाम अखिलेश होगा?

महज़ तीन महीने पहले अधिकतर विश्लेषक इस मत के साथ थे कि बीजेपी को उत्तर प्रदेश में विपक्ष वॉकओवर देने जा रहा है. लेकिन अखिलेश यादव के रथ यात्रा निकलने के बाद, कृषि क़ानूनों की वापसी, किसानों से मोदी के माफ़ी के बाद हालात कुछ बदले से नज़र आ रहे हैं.

शरत प्रधान कहते हैं, "अखबरों में रोज़ पूरे पन्नों के इश्तेहारों के बाद, तमाम लोकार्पण के बाद भी बीजेपी परेशान लग रही है. जिससे यह लग रहा है कि जो भी उनका ज़मीनी फीडबैक है वो अनुकूल नहीं है. ऐसा नहीं है कि लोग अखिलेश यादव को जिताने के लिए वोट देंगे. मुझे लगता है कि अगर बीजेपी चुनाव में हारती है तो पब्लिक इनको हटाने के लिए वोट देगी."

पत्रकार रतन मणि लाल कहते हैं कि उत्तर प्रदेश में चुनाव का फॉर्मेट भी बदलता नज़र आ रहा है. उनके मुताबिक़, "पहले चुनाव में सपा, बसपा, बीजेपी और कांग्रेस, सभी एक दुसरे से मुकाबला करती थीं. लेकिन धीरे धीरे करके पहले कांग्रेस कमज़ोर हुई और 2017 के चुनाव के बाद बसपा भी कमज़ोर हो गयी है. तो चाहते या न चाहते हुए भी उत्तर प्रदेश का चुनाव बीजेपी बनाम सपा में बदलता जा रहा है."

अखिलेश यादव और योगी आदित्यनाथ

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"ऐसे में बीजेपी अपने और राज्यों के इतिहास याद करती होगी कि जहाँ-जहाँ इन्हे 1:1 मुकाबला करना पड़ा है, वहां बीजेपी की स्थिति उतनी अच्छी नहीं रही है. गुजरात में बड़ी मुश्किल से जीत मिली, राजस्थान हार गए, छत्तीसगढ़ हाथ से निकल गया, मध्य प्रदेश निकल ही गया था लेकिन वहां बाद में सिंधिया ने सरकार बनवाई. और बंगाल इसका एक बहुत बड़ा उदाहरण है. मुझे लगता है कि यहाँ पर भी माहौल बन रहा है कि यह लड़ाई बीजेपी बनाम सपा हो सकती है, तो बीजेपी शायद इसके लिए अपने आप को तैयार कर रही है कि कहीं ऐसा ना हो कि 1:1 लड़ाई में हम कमज़ोर पड़ जाएँ. इसलिए उनकी क़िलेबंदी ज़रूरत से ज़्यादा हो रही है."

मोदी बनाम अखिलेश की सम्भावना के बारे में बीजेपी के प्रदेश प्रवक्ता राकेश त्रिपाठी ने कहा, "यह चुनाव अखिलेश यादव बनाम बीजेपी नहीं है, बल्कि यह बीजेपी बनाम ऑल है. यह चुनाव अखिलेश यादव बनाम एआईएमईएम है, अखिलेश बनाम मायावती है, अखिलेश बनाम कांग्रेस है और यह मायावती बनाम एआईएमआईएम है. यह जो अलग-अलग दल हैं, यह आपस में लड़ रहे हैं. भाजपा तो 300 सीटों से आगे है. और नरेंद्र मोदी जी हमारे अभिमान हैं, हमारे स्वाभिमान हैं."

"बीजेपी छोटा चुनाव हो या बड़ा चुनाव हो, बहुत ऊर्जा के साथ लड़ती है. आज संकट मायावती जी के साथ है कि उनकी पार्टी के तमाम संस्थापक नेता पार्टी छोड़ कर चले गए. यह कांग्रेस के लिए संकट है की राहुल गाँधी पिछले ढाई साल से बड़ी मुश्किल के साथ अमेठी पहुँच पाए हैं. उस अमेठी से जहाँ से वो संसद निर्वाचित होते रहे. यह बाकी लीडरों के लिए वैक्यूम है कि उनके पास लीडर नहीं हैं, उनके पास नेता नहीं हैं, बीजेपी के पास गैलेक्सी ऑफ़ लीडर्स हैं."

योगी

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वहीं समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता अब्दुल हाफ़िज़ गाँधी का कहना है कि, "भारतीय जनता पार्टी की कोशिश तो यही है कि वो इस चुनाव को मोदी बनाम अखिलेश बनाना चाहते हैं, क्योंकि योगी जी की छवि वो पिछले पांच सालों में देख चुके हैं. बीजेपी की आदत भी है और दूसरे प्रदेशों में भी हमने देखा है कि वो मोदी जी के चेहरे का इस्तेमाल करना चाहते हैं, लेकिन यह दोनों ही चेहरे एक तरह से धूमिल हो चुके हैं. इनकी कोई भी ख़ास उपलब्धि नहीं है."

"बिहार में भी पूरा चुनाव मोदी जी के इर्द गिर्द घुमाया गया था, बंगाल में भी इन्हीं के इर्द गिर्द चुनाव हुआ, तो उत्तर प्रदेश में भी इसी तरह की चीज़ें करने की कोशिश हो रही है. इस बार कोई लहर पैदा नहीं होगी. मोदी जी की रैलियों में कभी भीड़ लाने की आवश्यकता नहीं पड़ती थी लेकिन अब पड़ रही है. डीएम कलेक्टर लगा कर, उत्तर प्रदेश परिवहन की बसें लगा कर भीड़ इकठ्ठा कर रहे हैं तो इसी से अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि लोग पहले जैसे आतुर नहीं हैं. मोदी जी का क्रेज़ लोगों में ख़त्म होता नज़र आ रहा है. वरना राज्य सरकार को भीड़ जुटाने की आवश्यकता नहीं पड़ती."

लेकिन एक बात साफ़ है की बीजेपी के लिए 2022 का उत्तर प्रदेश चुनाव में ख़राब प्रदर्शन या हार ख़तरे से खली नहीं होगी. अगर कोई भी पार्टी मोदी-योगी के कॉम्बिनेशन को अच्छा टक्कर देती है और उत्तर प्रदेश में हराने का काम करती है तो ऐसे नकारात्मक नतीजे प्रधानमंत्री की व्यक्तिगत छवि के लिए और योगी आदित्यनाथ के राजनीतिक भविष्य के लिए नुकसानदेह हो सकते हैं. इसलिए नरेंद्र मोदी खुद डबल इंजन की सरकार को सिंगल इंजन होने से रोकने के लिए मैदान में उतरे हैं.

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