नरोत्तम मिश्रा: मंगलसूत्र और डाबर के विज्ञापन से 'आहत' होकर क्या शिवराज के लिए परेशानी का सबब बन सकते हैं?

मध्य प्रदेश के गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा
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    • Author, सरोज सिंह
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

कुर्ता पायजामा और माथे पर तिलक - उनकी यही पहचान, मध्य प्रदेश के गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा को प्रदेश के दूसरे नेताओं से बिलकुल अलग करती है.

इसी साल अक्टूबर में उन्हें बीजेपी के राष्ट्रीय कार्यकारिणी में बड़े नेताओं के साथ पहली बार जगह मिली है.

उनके इस प्रमोशन को बीजेपी के कई नेता पार्टी में उनके बढ़ते कद का इसे पैमाना बताते हैं. अब उनके बयान भी सुर्खियों में हैं.

उनका ताज़ा बयान फैशन ब्रांड सब्यसाची के मंगलसूत्र विज्ञापन से जुड़ा है, जिसे चौबीस घंटों के अंदर हटाने की उन्होंने चेतावनी दी थी.

इसके बाद सब्यसाची ने विज्ञापन वापस ले लिया है.

इससे पहले करवाचौथ पर आए डाबर की फेम ब्‍लीच क्रीम के विज्ञापन पर भी उन्होंने कड़ी आपत्ति जाहिर की थी. डाबर ने भी अपना विज्ञापन वापस ले लिया था.

प्रकाश झा की वेब सिरीज़ 'आश्रम-3' की मध्यप्रदेश में शूटिंग के दौरान बजरंग दल कार्यकर्ताओं ने हिंसक प्रदर्शन किया था. जिसके बाद उन्होंने बयान दिया कि प्रदेश में होने वाली शूटिंग से पहले निर्माताओं को प्रशासन को स्क्रिप्ट और दूसरी जानकारी देनी होगी.

नरेंद्र मोदी और शिवराज सिंह के साथ नरोत्तम मिश्रा

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प्रकाश झा की वेब सिरीज़ पर विवाद

पिछले एक सप्ताह से नरोत्तम मिश्रा के दिए मुखर बयान, ना सिर्फ मध्य प्रदेश में बल्कि देश भर में चर्चा का विषय बने हुए हैं.

सोशल मीडिया में ट्रोल हो रहे विज्ञापनों पर किसी और प्रदेश के गृहमंत्री का कोई बयान नहीं उनसे ज़्यादा चर्चित नहीं रहा है. इस वजह से भी उनके बयान पर ध्यान ज़्यादा जाता.

यहाँ ग़ौर करने वाली बात ये भी है कि नरोत्तम मिश्रा की 'आश्रम-3' वेब सिरीज़ पर दी गई चेतावनी के बाद प्रकाश झा ने मध्य प्रदेश में अपनी तय शूटिंग नहीं रोकी.

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इस तथ्य को इस बात से जोड़ा जा रहा है कि नरोत्तम मिश्रा की हर बात से प्रदेश के मुख्यमंत्री सहमत हों, ऐसा भी नहीं है.

एक ओर राष्ट्रीय स्तर पर उनकी मज़बूत होती छवि है तो दूसरी ओर प्रदेश में मुख्यमंत्री से तकरार की खबरें - इस वजह से बहस चल रही है कि नरोत्तम मिश्रा बीते कुछ समय से 'हिंदुत्व' की राजनीति के इतने मुखर वक़्ता क्यों हो गए हैं?

क्या वो पहले से ऐसी राजनीति करते आए हैं? या ये उनका नया अवतार है?

नरोत्तम मिश्रा

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बदले-बदले से क्यों नज़र आ रहे हैं नरोत्तम मिश्रा?

दिनेश गुप्ता, मध्यप्रदेश की राजनीति को दशकों से कवर करते आए हैं.

ग्वालियर से बीबीसी से बात करते हुए वो कहते हैं, "नरोत्तम मिश्रा का ये नया अवतार है, जो ज्योतिरादित्य सिंधिया के कांग्रेस से जाने के बाद, सामने आया है. यानी मार्च 2020 के बाद. इससे पहले उनकी छवि एक 'मैनेजर' की हुआ करती थी, जो 'हिंदूवादी' मुद्दों पर कम और अपने विधानसभा क्षेत्र के मुद्दों पर ज़्यादा बोलते थे."

नरोत्तम मिश्रा छह बार से विधायक हैं और दतिया विधानसभा क्षेत्र से चुनकर आते हैं. वे मध्य प्रदेश की सियासत में बीजेपी का ब्राह्मण चेहरा माने जाते हैं. शिवराज सरकार में नंबर दो की हैसियत रखते हैं. अब बीते कुछ दिनों से 'शिवराज- विरोधी' कैम्प के चेहरे के तौर पर जाने जा रहे हैं.

साल 2013 से पहले वो डबरा विधानसभा सीट से चुनाव लड़ते थे. लेकिन परिसीमन के बाद वो सीट आरक्षित हो गई, इसलिए साल 2013 और साल 2018 में वो दतिया सीट से चुनाव लड़े. पिछले विधानसभा चुनाव में उन्होंने दतिया सीट से 2600 मतों के अंतर से जीत हासिल की थी.

नरोत्तम मिश्रा

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दिनेश गुप्ता कहते हैं, "मध्यप्रदेश बीजेपी में नरोत्तम मिश्रा वैसे तो सर्व स्वीकार्य नेता नहीं माने जाते हैं. उनके साथ पूर्व में कुछ विवाद जुड़े हुए हैं. लेकिन हाल के दिनों में प्रदेश बीजेपी में एक 'फ्यूचर लीडर' की तलाश चल रही है. उस तलाश में ख़ुद को फिट करने के लिए वो ऐसे बयान दे रहे हैं."

"नरोत्तम मिश्रा के बयानों में एक ग़ौर करने वाली बात है. वो ज़्यादा 'प्रो-हिंदू' बात करते हैं, 'एंटी मुस्लिम' बात कम करते हैं. यानी वो आरएसएस का स्टाइल अपना रहे हैं जबकि वो आरएसएस बैकग्राउंड से नहीं आते हैं. इसके पीछे दूसरा कारण है उनकी विधानसभा सीट का समीकरण. उनकी दतिया सीट पर मुसलमान वोटरों की संख्या ठीक-ठीक है, जिन्हें वो नाराज़ भी नहीं करना चाहते."

दिनेश गुप्ता के कथन को नरोत्तम मिश्रा के बयानों के मद्देनज़र भी देखने की ज़रूर है. नबंवर, 2020 में नेटफ़्लिक्स की एक सिरीज़ 'अ सूटेबल बॉय' के मंदिर में चुंबन दृश्य फिल्माने पर उन्होंने जाँच के आदेश दिए थे. उसके बाद वेब सिरीज़ 'तांडव' पर भी उन्होंने हिंदुओं की भावनाएँ आहत करने का आरोप लगाया था.

जबरन धर्म परिवर्तन रोकने के लिए मध्य प्रदेश में बनाए गए क़ानून को भी उन्होंने अपने धर्म के बहू-बेटियों से जोड़ा. इंदौर में चूड़ी बेचने वाले मुसलमान युवक की पिटाई के मामले में उसी शख़्स पर पुलिस ने एफ़आईआर दर्ज़ की, तब भी गृहमंत्री ने उसके 'हिंदू नाम रखने' को ग़लत करार दिया था.

नरोत्तम मिश्रा कॉलेज के दिनों में छात्र से जुड़े. 1990 के दशक में पहली बार चुनाव लड़ा और जीते. 2003 में बाबू लाल गौड़ के मंत्रिमंडल में पहली बार मंत्री बने और फिर 2005 में शिवराज सिंह चौहान मंत्रिमंडल में भी अपने लिए जगह बनाई. लेकिन गृह विभाग जितना महत्वपूर्ण विभाग उन्हें पहली बार मिला है.

उनका विधानसभा क्षेत्र दतिया, ग्वालियर के पास का क्षेत्र है और उत्तर प्रदेश के साथ सीमा पर स्थित है.

शिवराज सिंह चौहान

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मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के लिए चुनौती?

मध्य प्रदेश की राजनीति में ग्वालियर का दबदबा हमेशा से रहा है. पहले माधवराव सिंधिया, फिर ज्योतिरादित्य सिंधिया, अबकी सरकार में नरेंद्र सिंह तोमर ये सब उसी इलाके से ताल्लुक रखते हैं. इन बड़े नेताओं की वजह से नरोत्तम मिश्रा, इससे पहले इतनी चर्चा में नहीं रहे.

मध्य प्रदेश में 2018 में कांग्रेस की जीत के साथ कमलनाथ सत्ता में आए. 15 महीने तक उनकी सरकार रही. उस दौरान जानकार बताते हैं कि नरोत्तम मिश्रा और उनके परिवार निशाने पर रहे. नरोत्तम मिश्रा ख़ुद को शहीद दिखाने की कोशिश करते रहे.

कमलनाथ सरकार के गिरने पर लिखी किताब 'वो सत्रह दिन' के लेखक ब्रजेश राजपूत कहते हैं, "जब 15 महीने की कमलनाथ सरकार मध्य प्रदेश में गिरी और बीजेपी की सरकार बनी, उसमें नरोत्तम मिश्रा का अहम योगदान रहा ऐसा पार्टी के कई नेता मानते हैं."

मध्य प्रदेश में हार के बाद भी सरकार बनाने की पहल करने का क्रेडिट आज भी नरोत्तम मिश्रा को दिया जाता है. इस वजह से वो ख़ुद को मुख्यमंत्री पद का दावेदार समझने लगे थे. लेकिन ग्वालियर के बाक़ी नेताओं (ज्योतिरादित्य सिंधिया, नरेंद्र सिंह तोमर) ने भरोसा शिवराज सिंह चौहान में ही जताया. इसलिए उन्हें सफ़लता नहीं मिली.

माना जाता है कि उसके बाद से वो प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह से नाराज़ चल रहे हैं.

नरोत्तम मिश्रा

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इसी साल जून के महीने में नर्मदा घाटी विकास योजना के कुछ प्रस्ताव पर राज्य की कैबिनेट बैठक हो रही थी. तब नरोत्तम मिश्रा ने खुल कर मुख्यमंत्री के प्रस्ताव का विरोध किया था. उनके विरोध के बाद भी कैबिनेट प्रस्ताव पारित हुए. ये बताता है कि मुख्यमंत्री के कभी करीबी रहे नरोत्तम मिश्रा के उनके साथ पहले जैसे संबंध नहीं रहे हैं.

ऐसे में एक सवाल उठता है कि क्या नरोत्तम मिश्रा, शिवराज सिंह से बैर मोल लेकर क्या हासिल कर सकते हैं?

कुछ जानकारों का मानना है कि बीजेपी ने जैसे महाराष्ट्र में गै़र-मराठा को मुख्यमंत्री बनाया, हरियाणा में ग़ैर-जाट को मुख्यमंत्री बनाया, वैसे ही प्रयोग अगर मध्य प्रदेश में करने का पार्टी सोचती है, तो उनका नंबर मुख्यमंत्री के तौर पर लग सकता है.

लेकिन वरिष्ठ पत्रकार और लेखक रशीद किदवई कहते हैं, "इन दिनों बीजेपी केंद्र में जिस तरह से ओबीसी पॉलिटिक्स कर रही है, उसे देखते हुए इस बात की संभावना कम नज़र आती है."

मध्य प्रदेश में ओबीसी 50 फीसदी से भी ज़्यादा हैं और अब तक बीजेपी के तीनों बड़े चेहरे उमा भारती, बाबूलाल गौड़ और शिवराज सिंह चौहान - ओबीसी से आते हैं. ऐसे में एक ब्राह्मण चेहरे को मुख्यमंत्री के तौर पर केंद्रीय बीजेपी आगे करने का जोखिम उठाएगी, इसकी संभावना कम है.

एक तथ्य ये भी है कि नरोत्तम मिश्रा अब 61 साल के हैं. बीजेपी के रूल बुक के हिसाब से उनके पास 5-10 साल का वक़्त ही बचा है.

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अमित शाह की पसंद

साल 2017 में पार्टी अध्यक्ष बनने के बाद अमित शाह जब भोपाल के दौरे पर थे, तब मीडिया के संपादकों के साथ उनके भोज का आयोजन रखा गया था. नरोत्तम मिश्रा ने ही उस आयोजन का पूरा ज़िम्मा उठाया था. उसके बाद से नरोत्तम मिश्रा ने पीछे मुड़ कर नहीं देखा.

केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने बीजेपी अध्यक्ष रहते हुए इन्हें 2019 के लोकसभा चुनाव में कानपुर लोकसभा सीट का प्रभारी भी नियुक्त किया था. फिर मध्य प्रदेश में गृह मंत्री की कुर्सी, उसके बाद कार्यकारिणी में जगह.

दिनेश गुप्ता कहते हैं, "ताज़ा बयान के ज़रिए वो वैसे ही दिखना चाहते हैं, जैसे गृहमंत्री अमित शाह केंद्र में हैं. लेकिन उनके साथ भ्रष्टाचार के कई आरोप भी जुड़े हैं."

साल 2008 में हुए विधानसभा चुनाव में इनके प्रतिद्वंद्वी ने नरोत्तम मिश्रा पर 'पेड न्यूज़' का आरोप लगाया था, जिसे अपने चुनावी ख़र्चे में नहीं दिखाया था. चुनाव आयोग ने अपनी जाँच में उन आरोपों को सही पाया था. 2017 में चुनाव आयोग ने तीन साल तक चुनाव न लड़ने पर पाबंदी भी लगाई थी. दिल्ली उच्च न्यायालय ने चुनाव आयोग के अयोग्यता आदेश को रद्द कर दिया था, लेकिन मामला अभी भी सुप्रीम कोर्ट में पेंडिंग है.

नरोत्तम मिश्रा

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मध्यप्रदेश में विधानसभा की तीन सीट और लोकसभा की एक सीट के लिए हुए उपचुनाव के नतीजे मंगलवार को आएंगे. दीवाली के बाद वहाँ मंत्रिमंडल विस्तार और बदलाव की चर्चा है.

ताज़ा बयानों के साथ और शिवराज के विरोध के बाद भी नरोत्तम मिश्रा, मंत्रिमंडल में अपनी जगह बनाए रखते हैं या और मज़बूत होते हैं या फिर फेरबदल में गृहमंत्री की कुर्सी जाती है - अब सबकी नज़रे इस पर टिकीं है.

बीजेपी ने साल 2018 के विधानसभा चुनाव शिवराज सिंह चौहान को 'चेहरा' बनाया था. लेकिन पार्टी को उनके नेतृत्व में बहुमत नहीं मिला था.

इस वजह से कयास लगाए जा रहे हैं कि अगले मंत्रिमंडल विस्तार में किसको क्या मिलता है, उस पर बहुत कुछ निर्भर करेगा कि अगला चुनाव, मध्य प्रदेश में बीजेपी किसके नेतृत्व में लड़ेगी.

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