मध्य प्रदेश में चौहान- सिंधिया की खींचतान में होगा मंत्रिमंडल विस्तार

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- Author, शुरैह नियाज़ी
- पदनाम, मध्य प्रदेश से, बीबीसी हिंदी के लिए
मध्यप्रदेश में मंत्रिमंडल विस्तार गुरुवार को होने जा रहा है. भाजपा और सिंधिया समर्थकों को इस विस्तार का इंतेज़ार लंबे समय से था. प्रदेश के प्रभारी विनय सहस्त्रबुद्धे केंद्रीय नेतृत्व की स्वीकृति के बाद सूची लेकर भोपाल आ चुके हैं.
इस मंत्रिमंडल विस्तार में कौन कौन होगा यह तो उन्होंने अभी साफ़ नही किया है लेकिन माना जा रहा है कि सिंधिया समर्थक पूर्व विधायकों को पर्याप्त महत्व दिया जाएगा क्योंकि उन्हें उपचुनाव का सामना करना है. ज्योतिरादित्य सिंधिया भी गुरुवार सुबह भोपाल पहुंच रहे हैं.
वही मुमकिन है कि भाजपा के कई पुराने चेहरे जो बरसों मंत्री रहे हो उन्हें आराम करवाया जाए. यह बात भी उठ रही है कि दो मंत्रियों को उपमुख्यमंत्री बनाया जाए. इनमें एक नाम गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा का है तो दूसरा नाम तुलसी सिलावट का. तुलसी सिलावट, सिंधिया समर्थक हैं.
वही मुख्य मंत्री शिवराज सिंह चौहान के एक बयान के कई मतलब निकाले जा रहे है. उन्होंने कहा, "समुद्र मंथन से निकले जहर को शिव ही पीते हैं." यह मंत्रिमंडल सरकार बनने के लगभग 100 दिन से ज़्यादा के बाद होने जा रहा है. अभी तक शिवराज मंत्रिमंडल में मात्र पांच मंत्री है.
खींचतान की वजह
मध्य प्रदेश में लगभग 15 माह बाद मार्च में सत्ता में लौटी भारतीय जनता पार्टी को दूसरे मंत्रिमंडल विस्तार में अंदरुनी खींचतान का सामना करना पड़ रहा है. कांग्रेस छोड़कर भाजपा का दामन थामने वाले ज़्यादातर पूर्व विधायक शिवराज सिंह चौहान के सत्ता में आने के 100 दिन बाद भी मंत्री नहीं बन पाए हैं.
इससे पहले शिवराज सिंह चौहान इस मंगलवार को दो दिन दिल्ली में रह कर भोपाल लौट आये. वहां पर मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, भाजपा अध्यक्ष जे पी नड्डा और ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसे नेताओं से मुलाक़ात की लेकिन नतीजा कुछ भी नही निकला. अब आलाकमान सब कुछ अपने हाथ में लेकर मंत्रिमंडल विस्तार चाह रहा है ताकि सभी की नाराज़गी दूर की जा सके हालांकि अभी तक किसी बात पर सहमति नही बन पायी है.
पार्टी के अंदर समीकरण बन रहे हैं उससे यह महसूस होता है कि एक तरफ सिंधिया जहां अपने ज़्यादा से ज़्यादा मंत्रियों को शपथ दिलाना चाहते हैं वहीं मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के लिये अपने करीबियों को मंत्रिमंडल में लाने के लिये ऐड़ी चोटी का ज़ोर लगाना पड़ रहा है.
पार्टी संगठन की कोशिश है कि इस मंत्रिमंडल विस्तार में नये चेहरों को मौक दिया जायें. लेकिन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान पिछले सालों में मंत्री रहे उनके ख़ास लोगों को बाहर नहीं रखना चाहते हैं.
वो चाहते हैं कि इस पर फैसला बाद में लिया जाए. वही सिंधिया अपने 12 लोगों को मंत्री देखना चाहते हैं. इनमें 6 वह लोग है जो पिछली कमलनाथ सरकार में भी मंत्री रहे हैं. लेकिन भाजपा नेतृत्व चाह रहा है कि इनमें से कुछ को कम कर दिया जाए और उपचुनाव में जीतने के बाद मंत्री बनाया जाए.

ज्योतिरादित्य सिंधिया भी अपने लोगों को लेने के लिये लगातार दबाव बना रहे हैं. भाजपा सिंधिया के साथ कांग्रेस छोड़कर आए 22 पूर्व विधायकों में से 10 को मंत्री बनाना चाह रही है. दो लोग तुलसी सिलावट और गोविंद सिंह राजपूत पहले ही मंत्री बन चुके है.
अगर केंद्रीय नेतृत्व की मंशा के मुताबिक़ नये चेहरों को मौका दिया जाता है तो भाजपा के कई बड़े नेता मंत्री नहीं बन पायेंगे.
ऐसी स्थिति में गोपाल भार्गव, विजय शाह, सुरेंद्र पटवा, रामपाल सिंह, राजेंद्र शुक्ला, जगदीश देवड़ा, पारस जैन, नागेंद्र सिंह, करण सिंह वर्मा, गौरीशंकर बिसेन, अजय विश्नोई, भूपेंद्र सिंह जैसे नेताओं को बाहर बैठना पड़ सकता है.
पूर्व नेता प्रतिपक्ष और आठ बार के विधायक गोपाल भार्गव ने कहा, "पार्टी को वरिष्ठ नेताओं की मदद लेनी चाहिये. वह ग़लती नही की जानी चाहिये जो काग्रेंस ने की थी."
कांग्रेस की कमलनाथ सरकार ने भी अपने कई वरिष्ठ नेताओं को मंत्रिमंडल में जगह नहीं दी थी जिससे पार्टी के अंदर ही असंतोष उभरा. इसे सरकार गिरने की एक वजह माना जा सकता है.
मध्यप्रदेश में मंत्रिमंडल में इस वक्त सिर्फ पांच ही मंत्री हैं. इन्हें भी मुख्यमंत्री ने सत्ता संभालने के 29 दिन बाद 21 अप्रैल को बनाया था.
ये पांच मंत्री नरोत्तम मिश्रा, गोविंद सिंह राजपूत, मीना सिंह, तुलसीराम सिलावट और कमल पटेल है. इनमें तुलसी सिलावट और गोविंद सिंह राजपूत, सिंधिया ग्रुप से हैं.

ज्योतिरादित्य सिंधिया के दबाव की वजह से भाजपा के अंदर मुश्किलें पैदा हो रही हैं. अगर उनकी इच्छा के अनुसार 12 मंत्री पद दे दिये गये तो भाजपा के पास अपने विधायकों को देने के लिये पद कम पड़ रहे हैं.
भाजपा में वरिष्ठ विधायकों की कमी नहीं है, ऐसे में उन्हें स्थान नहीं दिया जाता तो पार्टी के अंदर असंतोष पनप सकता है.
मध्यप्रदेश में 24 सीटों पर उपचुनाव होने हैं इसलिये इस तरह का असंतोष पार्टी के लिये मुश्किल पैदा कर सकता है. 24 सीटों के परिणाम ही इस सरकार का भविष्य तय करेंगे.
22 सीटें वो हैं जिनपर कांग्रेस विधायक इस्तीफा देकर भाजपा में आये हैं. 2 सीटें विधायकों के देहांत हो जाने की वजह से खाली हुई हैं.
230 सदस्यों वाली विधानसभा में भाजपा के 107 विधायक हैं जबकि काग्रेंस के पास 92 विधायक हैं. 7 विधायक निर्दलीय और अन्य पार्टियों के हैं जो पहले कांग्रेस के साथ थे तो अब भाजपा के साथ हैं.

यही वजह है कि मंत्रिमंडल विस्तार की बातें पिछले महीने से लगातार हो रही हैं और अभी तक किसी अंजाम पर नहीं पहुंच पाई हैं.
भाजपा प्रदेश अध्यक्ष वीडी शर्मा ने कहा, "केंद्रीय नेतृत्व इस मामलें में सही निर्णय लेगा. मंत्रियों का चयन एक प्रक्रिया के तहत किया जाएगा. कुछ समय में फैसला ले लिया जाएगा और फिर मंत्रिमंडल विस्तार हो जाएगा."
वहीं विपक्षी कांग्रेस भी मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और ज्योतिरादित्य सिंधिया पर मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर लगातार तंज कर रही है.
कांग्रेस ने शिवराज सिंह चौहान पर निशाना साधते हुए ट्विटर पर लिखा, "शिवराज ने लूट में सबको शामिल किया, अब हिस्सा बँटवारे में आनाकानी कर रहे हैं."
इस बीच जो स्थिति बन रही है वह चार बार के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को असहज करने वाली है. उन्होंने सत्ता तो पा ली है लेकिन अब आगे का सफर तय करने में भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है.
मध्यप्रदेश में मार्च में कमलनाथ सरकार उस समय गिर गई थी जब ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया था.
उनके समर्थक विधायक बेंगलुरु चले गये थे और वहीं से अपना इस्तीफ़ा सौंप दिया था. इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में मामला चला गया था जिसमें सरकार को 24 घंटे के अंदर बहुमत साबित करने को कहा गया था.
विधानसभा में बहुमत साबित करने से पहले ही कमलनाथ ने पद से इस्तीफा दे दिया था. इसके बाद शिवराज सिंह चौहान ने शपथ ली थी.
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