असम के 'आप्रवासी मुसलमान' क्या हिमंत बिस्वा सरमा के निशाने पर हैं?

इमेज स्रोत, DILIP KUMAR SHARMA/BBC
- Author, दिलीप कुमार शर्मा
- पदनाम, गुवाहाटी से, बीबीसी हिंदी के लिए
असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने अपनी सरकार के 30 दिन पूरे होने के मौक़े पर बीते गुरुवार को राज्य के 'आप्रवासी मुसलमानों' से जनसंख्या नियंत्रण के लिए 'उचित परिवार नियोजन नीति' अपनाने की अपील की थी.
लेकिन मुख्यमंत्री ने राज्य में मुसलमानों के कथित जनसंख्या विस्फोट की बात ऐसे समय की है, जब प्रदेश में उनकी सरकार अतिक्रमण की भूमि को ख़ाली कराने के लिए अभियान चला रही है.
नतीजतन मुख्यमंत्री हिमंत सरमा के इस बयान की न केवल राजनीतिक स्तर पर आलोचना की जा रही है, बल्कि कई लोग पाँचवें राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के आँकड़ों के हवाले से उन पर जनसंख्या नियंत्रण के ज़रिए 'आप्रवासी मुसलमानों' को निशाना बनाने के भी आरोप लगा रहे हैं.
हालाँकि सत्तारूढ़ बीजेपी का कहना है कि उनकी सरकार मुसलमानों के साथ किसी तरह का कोई भेदभाव नहीं कर रही है, बल्कि सरकार चाहती है कि मुसलमानों का विकास हो और उन्हें ग़रीबी से बाहर लाया जाए.
दरअसल, 12 दिसंबर, 2020 को जारी किए गए पाँचवें राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के आँकड़ों के अनुसार असम में साल 2005-06 से लेकर 2019-20 तक पिछले 14 सालों में मुस्लिम समुदाय में जन्म दर बहुत तेज़ी के साथ कम हुई है.

इमेज स्रोत, DILIP KUMAR SHARMA/BBC
क्या है अतिक्रमण हटाओ अभियान
इन ताज़ा आंकड़ों में असम में मुस्लिम समुदाय में प्रजनन दर 2.4 बताई गई है, जबकि साल 2005-06 में ये दर 3.6 थी.
जबकि कुछ लोग कोविड महामारी के ऐसे हालात में असम सरकार की तरफ़ से चलाए जा रहे अतिक्रमण हटाओ अभियान को अल्पसंख्यक उत्पीड़न से जोड़कर देख रहें हैं. क्योंकि गुवाहाटी हाई कोर्ट ने कोविड महामारी के दौरान बेदख़ली अभियान को रोकने का निर्देश दे रखा है.
गुवाहाटी हाई कोर्ट द्वारा 10 मई को पारित किए गए एक आदेश में कहा गया था, "यह भी स्पष्ट किया जाता है कि इस अवधि के दौरान किसी भी न्यायालय, न्यायाधिकरण या प्राधिकरण द्वारा बेदख़ली या विध्वंस करने का कोई फ़रमान अगर पारित किया गया था, तो वो इस विशिष्ट आदेश के अधीन स्थगित रहेगा."
सरकारी क़ब्ज़े वाली भूमि को ख़ाली कराने के लिए जो अभियान चलाया गया उसके बाद लगभग 200 परिवार (क़रीब 500 से अधिक लोग) बेघर हो गए हैं. बेघर हुए सभी परिवार मुस्लिम समुदाय के हैं.
ऐसे में सवाल उठता है कि प्रदेश में लगातार दूसरी बार सत्ता में आई बीजेपी सरकार के नए मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा की इस कार्रवाई से क्या सही में 'आप्रवासी मुस्लिम' निशाने पर आ गए हैं?

इमेज स्रोत, DILIP KUMAR SHARMA/BBC
'उचित परिवार नियोजन नीति'
मुख्यमंत्री के बयान में दो बातें एक साथ सामने आई हैं. पहली वे वनांचल और मठ-मंदिरों की ज़मीन से कथित अवैध क़ब्ज़े को ख़ाली करवाने की कार्रवाई के बारे में जानकारी देते हैं और उसके बाद वे 'अप्रवासी मुस्लिम' से जनसंख्या नियंत्रण के लिए 'उचित परिवार नियोजन नीति' अपनाने की अपील करते हैं.
वरिष्ठ वकील हाफ़िज़ रशीद अहमद चौधरी कहते हैं, "जनसंख्या नियंत्रण को लेकर हिमंत बिस्वा सरमा का जो बयान है वो नेकनीयत से कही गई बात नहीं लगती. क्योंकि बीजेपी में शामिल होने के बाद मुसलमानों को लेकर उन्होंने अब तक जो बयान दिए हैं उससे मन में संदेह आ जाता है. जनसंख्या नियंत्रण एक बड़ा मुद्दा है और हम सभी इसका समाधान भी चाहते हैं."
"लेकिन उनके मक़सद को समझ पाना मुश्किल है. मुख्यमंत्री बनने के बाद उनके कामकाज को देखें तो पहले बेदख़ल अभियान शुरू करने का मामला सामने आया और अब जनसंख्या नियंत्रण की बात कर रहें हैं. इससे साफ़ लग रहा है कि वे ख़ासकर आप्रवासी मुसलमानों को टारगेट कर रहे हैं."

इमेज स्रोत, DILIP KUMAR SHARMA/BBC
कौन हैं ये आप्रवासी मुसलमान
आप्रवासी मुसलमान उन लोगों को कहा जाता है जो देश के विभाजन से पहले उन इलाक़ों से मौजूदा असम में आए थे जो विभाजन के बाद पूर्वी पाकिस्तान का हिस्सा बन गए थे या फिर पाकिस्तान बन जाने के बाद भी पूर्वी पाकिस्तान से असम में आए थे. लेकिन प्रदेश में ख़ासकर निचले और मध्य असम में बसे बंगाली मूल के मुसलमानों को आज भी बांग्लादेश से आए 'आप्रवासी मुसलमान' के तौर पर देखा जाता है.
जानकारों का कहना है कि असम में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति के नाम पर सबसे ज़्यादा ख़मियाज़ा इन्हीं लोगों ने उठाया है.
हाफ़िज़ रशीद अहमद चौधरी आगे कहते हैं, "पहले वे कांग्रेस मुक्त कह रहे थे अब इनको मुसलमान मुक्त असम चाहिए. विधानसभा में मुसलमानों ने इनको वोट नहीं दिया तो अपने अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ को भंग कर दिया और उसके एक महीने के भीतर बेदख़ल अभियान शुरू करवा दिया. यह बारिश का मौसम है और इसके साथ ही कोविड महामारी के कारण एविक्शन को लेकर हाईकोर्ट का स्टैंडिंग ऑर्डर भी है."
"इस बात की जानकारी सरकारी वकीलों को भी है लेकिन उसके बावजूद उन्हीं लोगों को निशाना बनाया जा रहा जिनके पास भारतीय नागरिक होने के 50-60 साल पहले के काग़ज़ात हैं. अगर कोई व्यक्ति संदिग्ध या विदेशी भी है तो भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 में किसी भी व्यक्ति को उसके जीवन का अधिकार दिया गया है."
"अगर कोई भारतीय नागरिक सरकारी ज़मीन पर बैठा हुआ है तो उसके कई कारण हैं. कई लोगों की बाढ़, भूकटाव में ज़मीन चली गई तो अब वे लोग कहां जाएंगे. जनसंख्या नियंत्रण की बात हो या फिर इन बेघर लोगों को बसाने का मसला हो, सरकार को एक ठोस और प्रभावी नीति के साथ इन समस्याओं का हल निकालना होगा."

इमेज स्रोत, DILIP KUMAR SHARMA/BBC
क्या कहा था मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने
अपनी सरकार के 30 दिन पूरे होने के मौक़े पर मुख्यमंत्री हिमंत ने एक संवाददाता सम्मेलन में अतिक्रमण हटाओ अभियान के बारे में पूछे गए एक सवाल के जवाब में कहा था, "अगर जनसंख्या बढ़ती रही तो एक समय रहने की जगह की समस्या पैदा होगी और उससे टकराव शुरू होगा. कुछ लोग कह रहें है कि अवैध क़ब्ज़ा करने वालों को बेदख़ल नहीं किया जाना चाहिए लेकिन वनांचल और मंदिरों में तो हम लोगों को बसने नहीं दे सकते. आज मंदिर में लोग बसेंगे, वनांचल में बसेंगे तो कल नई पीढ़ी को हम किस तरह का असम देकर जाएंगे."
इस लेख में X से मिली सामग्री शामिल है. कुछ भी लोड होने से पहले हम आपकी इजाज़त मांगते हैं क्योंकि उनमें कुकीज़ और दूसरी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया हो सकता है. आप स्वीकार करने से पहले X cookie policy और को पढ़ना चाहेंगे. इस सामग्री को देखने के लिए 'अनुमति देंऔर जारी रखें' को चुनें.
पोस्ट X समाप्त
"मैं दूसरी तरफ़ (मुसलमानों) की समस्याओं को भी समझ रहा हूं जिस क़दर वहाँ जनसंख्या बढ़ रही है, इतने लोगों को कहां रखेंगे. उनको भी रहने की जगह चाहिए. आम्सू-एआईयूडीएफ़ जैसे संगठनों को जनसंख्या नियंत्रण करने को लेकर सोचना होगा. वर्ना एक दिन ऐसा होगा कि कामाख्या मंदिर की ज़मीन पर लोग बसने आ जाएंगे. वरना कहां रहेंगे और ये दूसरी तरफ़ के लोग होने नहीं देंगे."
मुख्यमंत्री ने यह भी कहा था, "अगर कोई ऐसा सोचता है कि एक लोकतांत्रिक सरकार वनांचल, मंदिर और मठ की ज़मीन पर लोगों को बसने देगी तो यह हमसे बहुत ज़्यादा उम्मीद करने वाली बात होगी. इतनी उम्मीद हम मैनेज नहीं कर पाएंगे. मुझे बारपेटा, जनिया, बाघबोर में उनको सरकारी ज़मीन आवंटित करने में कोई आपत्ति नहीं है लेकिन हम कब तक और कितने समय तक ऐसा कर पाएंगे. अगर एक परिवार में 10-12 बच्चे जन्म लेंगे तो फिर हम नहीं कर पाएंगे."
इसके साथ ही मुख्यमंत्री सरमा ने मुस्लिम संगठनों के साथ काम करने की इच्छा व्यक्त करते हुए कहा था कि उनकी सरकार जनसंख्या नियंत्रण की आवश्यकता पर मुस्लिम महिलाओं को शिक्षित करने का काम करेगी ताकि इस समस्या से प्रभावी रूप से निपटा जा सके.

इमेज स्रोत, DILIP KUMAR SHARMA/BBC
'मुसलमानों में जनसंख्या नियंत्रण'
निचले असम के ख़ासकर नदी तटीय चार इलाक़ों में बसे पिछड़े मुसलमानों में शिक्षा और बाल-विवाह जैसी कुप्रथा को रोकने का काम कर रही ऑल असम अल्पसंख्यक छात्र संघ (आम्सू ) की सहायक सचिव हसीना अहमद ने बीबीसी से कहा, "मुसलमानों में जनसंख्या नियंत्रण को लेकर मुख्यमंत्री ने जो मिलकर काम करने की बात कही है, हम उसका स्वागत करते हैं, लेकिन यह बात उन्होंने तब कही जब बेदख़ली पर सवाल पूछा गया था. असल में उन्होंने बंगाली मूल के मुसलमानों को निशाना बनाने के लिए ही ये सारी बातें कहीं हैं."
"हमारे वर्तमान मुख्यमंत्री कांग्रेस सरकार से लेकर अब तक लगातार 19 साल तक मंत्री थे. लंबे समय तक शिक्षा मंत्री भी रहे लेकिन मुसलमान बहुल इलाक़ों में शिक्षा के क्षेत्र में कोई ख़ास सुधार नहीं किया गया. लिहाज़ा अब उन्हें यह कहना पड़ रहा है कि मुस्लिम महिलाओं को शिक्षित करने के लिए वे काम करना चाहते हैं. जिन इलाक़ों में बंगाली मूल के मुसलमान बसे हैं, वहां कई जगह आज भी अच्छे स्कूल-कॉलेज नहीं हैं."
"हेल्थ सेवाओं की समस्याएं हैं. अस्पताल नहीं हैं. इसके अलावा मुसलमानों की एक बड़ी आबादी हर साल बाढ़ के कारण प्रभावित होती है. किसी भी समुदाय के बारे में बयान देना आसान है लेकिन चार इलाक़ों में लोग बहुत बदतर ज़िंदगी जी रहें हैं. अगर सरकार इन लोगों के जीवन स्तर को ठीक नहीं करेगी तो लोग ऐसे बयान को सांप्रदायिक चश्मे से ही देखेंगे."

इमेज स्रोत, DILIP KUMAR SHARMA/BBC
इन मुसलमानों को आप्रवासी कहना सही है?
गुवाहाटी विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान विभाग से रिटायर्ड प्रोफ़ेसर मोनिरुल हुसैन कहते हैं, "इन लोगों के लिए आप्रवासी शब्द का इस्तेमाल करना ही बहुत दुखद है. ये लोग आंतरिक प्रवास के तहत सिलहट ज़िले से ब्रह्मपुत्र वैली में आए थे. उस समय सिलहट असम का हिस्सा था. इसलिए इसे इमीग्रेशन नहीं कह सकते. अगर किसी पर इमीग्रेंट शब्द लगा दिया जाएगा तो वह जीवन भर विदेशी ही बना रहता है."
"इन लोगों के साथ ये काफ़ी ग़लत हुआ है. जब ये लोग वहां से आए थे तो मातृभाषा की दृष्टि से मूल रूप से बंगाली थे. लेकिन आहिस्ता आहिस्ता इन लोगों ने अपनी भाषा को छोड़कर असमिया भाषा को अपना लिया. लेकिन अब भी इनको आप्रवासी बंगाली मुसलमान कहना सही में एक गंभीर समस्या है."
मुख्यमंत्री के बयान के संदर्भ में प्रोफ़ेसर हुसैन कहते हैं, "भारत में साम्प्रदायिकता बहुत बढ़ी है. ख़ासकर बीजेपी के सत्ता में आने के बाद से इसमें काफ़ी इज़ाफ़ा हुआ है. मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि बीजेपी एक सांप्रदायिक पार्टी है. हिंदू-मुसलमान के संबंधों के बीच जितना तीव्र विभाजन किया जा सकता है वो वही करना चाह रही है."
"हिंदू-मुसलमानों के बीच विभाजन कर बीजेपी देश में शासन करना चाहती है. असम में आज़ादी के बाद इतनी सांप्रदायिकता नहीं थी. लेकिन बीजेपी के सत्ता में आने के बाद वे लगातार सांप्रदायिक विभाजन की कोशिश कर रहें है. जनसंख्या नियंत्रण को लेकर दिया गया बयान भी असम को साम्प्रदायिक बनाने के बड़े खेल का एक हिस्सा है."

इमेज स्रोत, DILIP KUMAR SHARMA/BBC
बीजेपी का जवाब
हालांकि सत्तारूढ़ बीजेपी का कहना है कि उनकी सरकार मुसलमानों के साथ किसी तरह का कोई भेदभाव नहीं कर रही है बल्कि सरकार चाहती है कि मुसलमानों का विकास हो और उन्हें ग़रीबी से बाहर लाया जाए.
असम प्रदेश बीजेपी कोर कमेटी के सदस्य तथा वरिष्ठ नेता विजय कुमार गुप्ता कहते हैं, "नदी तटीय चार इलाक़ों में मुसलमान महिलाएं बहुत ग़रीबी की हालत में रहती हैं. उनके पास शिक्षा का अभाव है. एक महिला के 10 से 15 बच्चे होते हैं. अगर महिलाएं शिक्षित होंगी तो स्वभाविक रूप से जनसंख्या कम होगी. उनका जीवन-यापन कैसे हो, उन्हें उचित शिक्षा मिले और आर्थिक तौर पर उनका विकास हो, वो समुदाय भी अब इस बात को महसूस कर रहा है."
"हमारे मुख्यमंत्री ने मुसलमानों को इन समस्याओं से बाहर निकालने के लिए आबादी के बोझ को कम करने वाली बात कही थी. इस तरह हिंदू-मुसलमान की बातें ख़त्म होनी चाहिए. हमारी सरकार पूरी योजना के साथ जनसंख्या नियंत्रण की दिशा में प्रभावी उपाय करेगी."
कोविड महामारी के समय सरकार द्वारा चलाए जा रहे बेदख़ली अभियान के बारे में बीजेपी नेता गुप्ता कहते हैं, "राज्य में बड़ी तादाद में सरकारी ज़मीन पर अवैध क़ब्ज़ा करके लोग बैठे हुए हैं."
"ब्रह्मपुत्र नदी के उस पार 77 हज़ार बीघा (1 बीघा= 14,400 वर्ग फुट) सरकारी ज़मीन अवैध तरीक़े से क़ब्ज़ा किए हुए हैं. ऐसे में कोई भी सरकार शासन में आए उसे कार्रवाई करनी पड़ती है. हमारी यह ज़िम्मेदारी बनती है कि हम सरकारी ज़मीन, वनांचल या फिर मंदिर-मठ की भूमि को अवैध क़ब्ज़े से मुक्त करवाएं."

इमेज स्रोत, ANI
असम सरकार का दावा
असल में हिमंत बिस्वा सरमा की सरकार ने सबसे पहले यह बेदख़ली अभियान दरंग ज़िले में शुरू किया था.
स्थानीय प्रशासन ने अवैध तरीक़े से बसे बड़े पैमाने पर अप्रवासी मुसलमानों को हटाया जिन्होंने कथित तौर पर सिपाझार में धौलपुर शिव मंदिर के आसपास के नदी क्षेत्रों का अतिक्रमण किया हुआ था.
मुख्यमंत्री हिमंत सरमा ने ख़ुद इस बात की जानकारी देते हुए कहा था, "प्रशासन ने सिपाझार में क़रीब 180 बीघा, होजाई में लगभग ढाई हज़ार बीघा तथा सोटीया और करीमगंज में अवैध क़ब्ज़े वाली सरकारी और वनांचल की ज़मीन को बेदख़ल कराया है."
असम सरकार का दावा है कि यह अभियान असम की भूमि, पहचान, संस्कृति, भाषा और विरासत को हमलावरों और अवैध प्रवासियों से बचाने के लिए चलाया गया है.
'अतिक्रमणकारियों' से वनांचल और अन्य सरकारी भूमि को पुनः प्राप्त करना और उस ज़मीन को 'स्वदेशी' भूमिहीन लोगों को आवंटित करना बीजेपी के चुनावी वादों में से एक था.

इमेज स्रोत, Twitter@INCAssam
क्या कहना है कांग्रेस का
राज्य की प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने मुख्यमंत्री हिमंत के इस तरह के बयान को ग़लत और गुमराह करने वाला बताया है.
असम प्रदेश कांग्रेस कमेटी के मीडिया विभाग की अध्यक्ष बबीता शर्मा कहती हैं, "असम में मुसलमानों की जनसंख्या 'विस्फोट' के संदर्भ में मुख्यमंत्री का बयान पूरी तरह ग़लत है. लेकिन अगर मुख्यमंत्री 'जनसंख्या विस्फोट' का ज़िक्र कर रहे हैं जो भविष्य में सीएए के लागू होने के कारण बांग्लादेश और पाकिस्तान के लोगों के आप्रवासन के कारण हो सकता है तो शायद मुख्यमंत्री की चिंता जायज़ है."
मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के सत्ता संभालने के तुरंत बाद उनकी सरकार ने 31 अगस्त, 2019 को प्रकाशित एनआरसी यानी राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर के पुन: सत्यापन की माँग करते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख़ किया है.
राज्य के एनआरसी प्राधिकरण द्वारा पिछले महीने दायर याचिका में दावा किया गया था कि अपडेट रजिस्टर में अयोग्य नामों को शामिल करने और योग्य लोगों को बाहर करने जैसी त्रुटियां हैं.
असम में 2019 में प्रकाशित की गई एनआरसी में 19 लाख से अधिक लोगों का नाम शामिल नहीं किया गया था. ऐसी जानकारी है कि एनआरसी में ज़्यादातर हिंदू बंगाली लोगों के नाम शामिल नहीं हुए हैं.
सरकार चाहती है कि बांग्लादेश की सीमा से सटे ज़िलों में एनआरसी का 20 प्रतिशत और अन्य ज़िलों में 10 प्रतिशत रि-वेरिफ़िकेशन किया जाए. इन तमाम बातों के बीच राज्य में अवैध-प्रवासियों के मुद्दे को लेकर एक बार फिर आया उबाल कई सवाल खड़े कर रहा है.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)














